बिना विचार की परमाणु नीति

Published at :13 Apr 2014 3:22 AM (IST)
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बिना विचार की परमाणु नीति

।। आकार पटेल।। (वरिष्ठ पत्रकार) सावधान हो जायें! भारतीय जनता पार्टी भारत की परमाणु नीतियों को संशोधित कर रही है. ओपिनियन पोल्स द्वारा पार्टी को अगली सरकार का गठन करने की उम्मीद है. पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया है, ‘भाजपा का मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में परमाणु कार्यक्रम के […]

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।। आकार पटेल।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

सावधान हो जायें! भारतीय जनता पार्टी भारत की परमाणु नीतियों को संशोधित कर रही है. ओपिनियन पोल्स द्वारा पार्टी को अगली सरकार का गठन करने की उम्मीद है. पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया है, ‘भाजपा का मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में परमाणु कार्यक्रम के मोरचे पर भारत द्वारा हासिल किये गये रणनीतिक फायदों को कांग्रेस ने मटियामेट कर दिया है.’ इसलिए अब भारतीय जनता पार्टी भारत में परमाणु नीतियों का व्यापक अध्ययन करेगी और इसे संशोधित व अपडेट करेगी, ताकि मौजूदा चुनौतियों से निबटने में इसे ज्यादा से ज्यादा प्रासंगिक बनाया जा सके.

स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तौर पर यह कहा जा सकता है कि क्या आपको इतने वर्षो से इसका अध्ययन नहीं करना चाहिए था? और जहां तक मैं समझता हूं, दूसरी बात यह कि यदि उन्होंने इसका अध्ययन नहीं किया, तो वे यह कैसे जाने पाये कि इसे संशोधित करने की जरूरत है?

सच्चाई यह है कि किसी चीज को अच्छा, बुरा या संवेदनशील साबित करने से पहले भाजपा उसका अध्ययन करने की जरूरत वाकई में नहीं समझती है. शायद, इसीलिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार स्वयं इन तथ्यों की बारीकियों और व्यापक अज्ञानता पर गर्व महसूस करते हैं. नरेंद्र मोदी ने एक चापलूस साक्षात्कारकर्ता को कहा कि ‘एकेडमिक्स स्टडिज’ के माध्यम से वे सरकार नहीं चला सकते, क्योंकि फाइलों को पढ़ना उनका काम नहीं है. यह निश्चित तौर पर उनकी आध्यात्मिक बौद्धिकता हो सकती है या तथाकथित हिंदुत्ववाद, जिसने उन्हें इस तरह का प्रखर निर्णय लेनेवाला व्यक्तित्व प्रदान किया है.

भाजपा के घोषणापत्र में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गयी है, जिसमें कहा गया है, ‘मौजूदा चुनौतियों के मुताबिक इसे संशोधित और अपडेट करते हुए प्रासंगिक बनाना होगा.’ ‘विश्लेषकों की व्याख्या है कि इसका मतलब भारत की लंबे समय से चली आ रही परमाणु हथियारों का अपनी ओर से पहले इस्तेमाल नहीं करने की घोषित नीति को बदलने से है.’

इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति भारत के मौजूदा परमाणु नीति के खिलाफ होगी, जिसका तात्पर्य है कि भारतीय परमाणु हथियारों का मूलभूत उद्देश्य भारत और उसकी किसी सेना के खिलाफ किसी देश द्वारा परमाणु हथियारों की चुनौती पेश करने पर करना होगा. भारत अपनी ओर से पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा, लेकिन हमले की स्थिति में वह जवाबी कार्रवाई से परहेज नहीं करेगा. भारत उन देशों के लिए अपनी ओर से किसी तरह की परमाणु चुनौती नहीं पेश करेगा, जिनके पास परमाणु हथियार नहीं है, या परमाणु हथियार संपन्न ताकतों से गंठबंधन नहीं है.’

पिछली बार भाजपा ने 1998 में सत्ता में आने के महज सात सप्ताह के भीतर भारतीय परमाणु कार्यक्रम की समीक्षा की थी. उनके इस दुस्साहस का नतीजा यह हुआ था कि पहली बार लंबे समय तक भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नकारात्मक हो गया था. दरअसल, पूंजी एक डरपोक चीज है और इसे जाते देर नहीं लगती. भाजपा ने जैसे ही अपना पटाखा छोड़ा, दुनिया स्तब्ध रह गयी. भाजपा ने खतरनाक तरीके से अपने गुप्त कार्यक्रम से पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया और इस तरह पार्टी ने इसलामाबाद को अपने बचाव का मौका दे दिया. इससे शत्रुओं/ पड़ोसियों में भारत की अपनी पारंपरिक श्रेष्ठता की छवि का नुकसान हुआ. पाकिस्तान की गैर-राजकीय ताकतों की कार्रवाइयों को हम ज्यादा दिनों तक सजा नहीं दे सकते, यहां तक कि चुनौती भी नहीं पेश कर सकते.

दूसरी ओर आडवाणी पाकिस्तान की प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गये थे. शायद भाजपा के कुर्सीधारी नेपोलियन इस फैसले के नतजों के बारे में अधिक नहीं सोच पाये थे. यह कहना मुश्किल है कि अटल बिहारी वाजपेयी के वैश्विक मंच पर छाने के अलावा उस परमाणु परीक्षण का फायदा देश को किस रूप में हुआ था. ऐसे लोग जिन्होंने खुद से अपनी छाती में मुक्का मारा, उन्हें उससे होनेवाले नुकसान का पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाया.

भाजपा के घोषणापत्र में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा किये गये परमाणु समझौते को भी चुनौती दी गयी है. मोदी कहते हैं कि विदेशी दबाव से इतर नागरिक व सैन्य मकसद से वे दो आयामी स्वतंत्र परमाणु कार्यक्रम का अनुसरण करेंगे. यह खतरनाक आधार हो सकता है और इतिहास के साक्ष्य हमें बताते हैं कि भाजपा राष्ट्रीय हित से जुड़े मसलों से संबंधित किसी कार्यक्रम की तैयारी से पहले उस पर विचार करना जरूरी नहीं समझती है.

भाजपा जब इन चीजों पर विचार करती है, तो आम तौर पर इसका अंत शरारती अंदाज में होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वह पड़ोसियों को निरपेक्ष भाव से देखने में अक्षम है. यह एक प्रकार की भावनात्मक प्रवृत्ति है, जिसे हिंदुत्व की धारा के साथ बहते हुए सभी सीमाओं पर शत्रु ही दिखाई देते हैं. यही कारण है कि चीन के साथ हमारे संबंध अच्छे नहीं बन सके हैं, क्योंकि 1962 के युद्ध की वास्तविकता से हम परिचित नहीं हैं.

इस पृष्ठभूमि में भारतीय जनता पार्टी की नयी धमकी बेवकूफी ही कही जा सकती है, यदि यह सिर्फ सत्ता पाने के लिए एक हथकंडा भर नहीं है.

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