पार्टियों के लिए अहम हैं तीसरे दौर के संकेत

Published at :11 Apr 2014 4:04 AM (IST)
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पार्टियों के लिए अहम हैं तीसरे दौर के संकेत

आम चुनाव के तीसरे दौर में 11 राज्यों व तीन केंद्रशासित प्रदेशों की 91 सीटों पर हुए मतदान से पार्टियों को कई संकेत मिले होंगे. ये मतदान के शेष दौर में उनकी रणनीति को दिशा देंगे. मसलन, दिल्ली की सभी सात सीटों पर वोट के साथ बूथों पर तैनात ‘आप’ कार्यकर्ता अच्छी तरह भांप चुके […]

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आम चुनाव के तीसरे दौर में 11 राज्यों व तीन केंद्रशासित प्रदेशों की 91 सीटों पर हुए मतदान से पार्टियों को कई संकेत मिले होंगे. ये मतदान के शेष दौर में उनकी रणनीति को दिशा देंगे. मसलन, दिल्ली की सभी सात सीटों पर वोट के साथ बूथों पर तैनात ‘आप’ कार्यकर्ता अच्छी तरह भांप चुके होंगे कि चुनावी राजनीति के लिए दिल्ली को प्रयोगशाला बनाने और पिछले साल विधानसभा चुनाव में करिश्मा कर दिखाने से उपजा असर बरकरार है, या ‘आप’ के प्रयोग को वोटर अब नकारने के मूड में आ गये हैं.

‘आप’ के शीर्ष नेताओं को यह संदेश भी मिल चुका होगा कि विकल्प की राजनीति की राह देश की राजधानी से निकालने की उनकी रणनीति आगे सफल होने जा रही है या नहीं. उधर, भाजपा ने सबसे अधिक सीटों वाले राज्य यूपी के पश्चिमी हिस्से की 10 सीटों के लिए मुजफ्फरनगर दंगे को प्रमुख मुद्दा बनाया था. पिछली दफे (2009 में) इन 10 सीटों में से बसपा को सर्वाधिक पांच, जबकि भाजपा और आरएलडी को दो-दो, सपा को एक सीट मिली थी.

जाट-वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में मुसलिम वोटरों के ध्रुवीकरण की कोशिश मुजफ्फरनगर दंगे के संदर्भ में तेज हुई. अगर मीडिया की खबरों में जमीनी सच्चाई का कोई अक्स है, तो कहा जा सकता है कि मतदान से पहले इलाके में भाजपा नेता अमित शाह की यात्र और तथाकथित विवादित बयान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने का ही प्रयास है. जाहिर है, बूथों पर तैनात भाजपा कार्यकर्ताओं को संकेत मिला होगा कि ध्रुवीकरण के उनके प्रयास सफल रहे या नहीं.

इस संकेत से यह भी तय होगा कि भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में यूपी उस सीमा तक सहायक होगा या नहीं, जितना कि कुछ सर्वेक्षणों में बताया गया था. भाजपा को कई अहम संकेत बिहार से भी मिले होंगे, जहां जदयू से उसका गंठबंधन टूटने के बाद मुकाबला दिलचस्प हो गया है. अब तीसरे चरण के संकेतों को पढ़ कर पार्टियां शेष दौर के लिए मुहावरे बदलेंगी, माइक्रो मैनेजमेंट के प्रयास करेंगी. अंतिम समय में माइक्रो मैनेजमेंट कितने सफल होंगे, इससे इस पहेली का हल भी मिलेगा कि वोटर किसी पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष-विपक्ष में वोट देने का फैसला चुनाव से बहुत पहले कर लेता है या आखिरी समय के घटनाक्र म उसके मत-व्यवहार पर निर्णायक असर डालते हैं.

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