चाहे किसी को, लेकिन वोट जरूर दें

Published at :09 Apr 2014 4:26 AM (IST)
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चाहे किसी को, लेकिन वोट जरूर दें

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) सुन बे.. घुड़की देकर कयूम मियां गाने में उलझ गये- ‘कोछा भरि छिनले, मउनी भर छिनले, छीने चाहे पीया के खिलौनवा हो रामा. राजा जी के बगिया, फुलवा लोढ़न कैइसे जइबे हो रामा, राजा जी के बगिया..’ कयूम खो गये. गाना बजता रहा. लाल्साहेब ने कयूम को गौर से देखा, जगा […]

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।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

सुन बे.. घुड़की देकर कयूम मियां गाने में उलझ गये- ‘कोछा भरि छिनले, मउनी भर छिनले, छीने चाहे पीया के खिलौनवा हो रामा. राजा जी के बगिया, फुलवा लोढ़न कैइसे जइबे हो रामा, राजा जी के बगिया..’ कयूम खो गये. गाना बजता रहा. लाल्साहेब ने कयूम को गौर से देखा, जगा दिये- का बात है मियां! कहां खो गये? कयूम बुदबुदाये- बनी रहो बिटिया. भारत की शान है. रुला देती है..

चिखुरी भी आ पहुंचे- कौन किसको रुला रहा है भाई? कयूम ने आसमान को जवाब दिया- शारदा सिन्हा है दद्दा! चैती गा रही थी. आवाज में क्या खनक है. सुबह-सुबह शारदा कहां मिल गयी? अशोक सिंह के मोबाइल में ई गाना बा. लखन कहार ने विज्ञान खोला- जमाना कहां आ पहुंचा हम फकीर के फकीरे रही गये. अब तो गाना खपीच में आवै लगा है भाई. उमर की आंख गोल हो गयी- खपीच! ई का है भाई? लखन ने तरेरा- खपीच नहीं जानते? जब कोई चीज ढीली हो जाती है तो उसमें लकड़ी क एक टुकड़ा ठोंक देते हैं उसे खपीच कहते हैं.

नवल उपाधिया ने तस्दीक की- हां, फुतुन्नू लोहार बिहार कमाई के लौटा बा ओसे पूछा जाये. बार बखत खपीच लिये रहत है. बोलावा ऊ खड़ा है सैलून पे. फुतुन्नू बुलाये गये. कान से आला निकाले. उमर दरजी ने फुतुन्नू की जेब में हाथ डाल दिया. फुतुन्नू चौंक के कूदा- ई का है? ऊ जरा खपीच त दिखा जौने में गाना भरे है. फुतुन्नू मुस्कुराया- इसे खपीच नहीं पेनड्राइव बोलते हैं. फुतुन्नू ने जेब से उंगल भर का औजार बाहर निकाला. बारी-बारी सब ने उसे उलट-पुलट कर देखा. लाल्साहेब ने तो सूंघा भी-इसमें से गाना निकलता है? फुतुन्नू ने पूरी जानकारी दी- हां, सो भी एक दो नहीं, सैकड़ों में सुनिये. तसवीर भी देखिये..

नवल उपाधिया ने पूछा- फुतुन्नू! तैं कहां कमाले बचवा? फुतुन्नू ने अकड़ कर जवाब दिया- फुलवारी शरीफ. नवल बोले- ई त पटना में है. काम का है? कारपेंटरी. और इस कारपेंटरी ने फुतुन्नू को उचित जगह दे दिया. अब बात पटना पर चली गयी. चुनाव जेरे बहस हो गया. एक दिन दद्दा एक कमाल का जुलूस निकला. सब औरतें. हर उम्र की औरतें. नारा लगाती रहीं. वोट मागती रहीं. घर-घर, गली-गली, सड़क-सड़क. हम भी जा मिले. और जब चुनाव चिह्न पूछा तो मामला खटाई में. एक लड़की रही, जवाब दिया- वोट दो, किसी को भी दो, लेकिन दो जरूर. यह आपका अधिकार है. इसे खराब मत करो बस यही हमारा नारा है.

हमको बहुत अजीब लगा. ई कौन लोग हैं भाई? हर रोज अखबार में, टीवी पर खबर आती है कि फलाने ने कहा है वोट का वहिष्कार होगा. वोट देनेवालों को धमकी मिलती है, लेकिन वोट देने के लिए बेचारी औरतें सड़क छान रही हैं. दूसरे दिन सारे अखबार छान मारे, पर ई खबर ना मिली. दिन भर डिब्बे के सामने बैठे रहे कि अब खबर मिलेगी. इसलिए दद्दा हम निकल पड़े खबर की असलियत जानने वास्ते. घूमते-टहलते पता करते मिले उस लड़की से, जो इसकी अगुआ थी. वह काम करती है ग्रामीण विकास मंत्रलय के अधीन. सरकार ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बना कर अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए अनेक काम बताये हैं, ये सब औरतें वही हैं.

चिखुरी ने लंबी सांस ली.. हां, सही कह रहे हो. केंद्र की योजना है. हर सूबे को इसका दायित्व मिला है. लेकिन हर सूबा ईमानदारी से इस काम को अंजाम नहीं दे रहा है. बेरोजगारी, तबाही, गैबराबरी के चलते बिहार के लड़के भाग कर बंबई-कलकत्ता जा रहे हैं, नौकरी की खोज में, अगर बिहार सरकार उन्हें अपने घर में ही काम दे रही है, तो इसकी तारीफ होनी चाहिए. देखो न! उसी बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और पता नहीं कहां-कहां जनतंत्र के खिलाफ साजिश रची जा रही है. कोई माओ का नाम ले रहा है, कोइ नक्सलबाड़ी बोल रहा है. सबसे ज्यादा उस तमीज से खतरा है, जो संदूक और बंदूक के सहारे जनतंत्र की कब्र खोद रहा है. एक साहब ऐसे भी हैं, जिन्होंने खुल्लम-खुल्ला जनतंत्र को चुनौती दे डाली है और सीधे प्रधानमंत्री बन रहे हैं. इन सब का ध्येय एक ही है. जनतंत्र को खत्म कर मुल्क में तानाशाही लाओ.

लेकिन ऐसा होगा नहीं. यह गांधी का मुल्क है. लोहिया-जेपी का मुल्क है. जो लोग भी जनतंत्र को चुनौती दे रहे हैं, वे वोट का मतलब ही नहीं जानते. आजादी के बाद इस मुल्क को खुदमुख्तारी का अधिकार घेलुआ में मिल गया है, इसलिए इसकी कद्र नहीं जानते. जिस दिन इस मुल्क से जम्हूरी निजाम खत्म होगा, यह मुल्क डूब जायेगा. फुतुन्नू! जब पटना जाना, तो उस बिटिया को हमारे गांव की ओर से बधाई देना और उससे कहना कि तुम अपना काम करो, अखबार और डिब्बे की परवाह मत करो. बाकी हम बिहार के ग्रामीण मंत्री और मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख रहे हैं. चिखुरी की आंखों में चमक थी. नवल ने उंगली से दीवार को ठोका और खुद से बुदबुदाये- इसका मतलब हुआ वोट देना चाहिए..

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