चुनावों ने बदली नेताओं की दिनचर्या

मीडिया में ये खबरें सुर्खियां बन रही हैं कि पांच वर्षो तक अपने संसदीय क्षेत्र से मोहभंग रखने वाले हमारे निवर्तमान और भावी सांसदों की दिनचर्या अचानक कैसे बदल गयी. उन्हें न खाने की फुरसत मिल रही है और ना ही सोने का वक्त. दिन-रात अपना कीमती समय अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को रिझाने में […]
मीडिया में ये खबरें सुर्खियां बन रही हैं कि पांच वर्षो तक अपने संसदीय क्षेत्र से मोहभंग रखने वाले हमारे निवर्तमान और भावी सांसदों की दिनचर्या अचानक कैसे बदल गयी. उन्हें न खाने की फुरसत मिल रही है और ना ही सोने का वक्त. दिन-रात अपना कीमती समय अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को रिझाने में ही व्यतीत कर रहे हैं.
ऐसा होना भी लाजिमी है क्योंकि चुनाव जब सर पर हो तो फिर नींद किसे और फिर चैन कहां! दिनभर में दर्जनों रैलियों और कार्यकर्ता सम्मेलनों में हिस्सा लेना उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया है. भोली-भोली जनता के पास फिर जाकर उनकी समस्याएं जानना और यथासंभव उनके निदान के आश्वासन देना उनकी सोची-समझी चाल-सी प्रतीत होती है. पांच साल तक जनता पर क्या बीती, इसकी सुधि किसी ने नहीं ली. क्या ऐसे व्यक्ति को आप वोट देंगे?
सुधीर कुमार, राजाभीठा, गोड्डा
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