भारत में समलैंगिकता का औचित्य!

Published at :08 Apr 2014 5:53 AM (IST)
विज्ञापन
भारत में समलैंगिकता का औचित्य!

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री इतिहास साक्षी है कि समलैंगिकता को बढ़ावा देनेवाले समाज विलुप्त हो गये. वर्तमान में अमेरिका और यूरोप में इसको वैधता दी जा रही है, जिससे यहां की आबादी कम होती जा रही है. अत: समाज की दृष्टि से भी समलैंगिकता प्रमाणित नहीं होती है. सन् 2009 में दिल्ली हाइकोर्ट […]

विज्ञापन

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

इतिहास साक्षी है कि समलैंगिकता को बढ़ावा देनेवाले समाज विलुप्त हो गये. वर्तमान में अमेरिका और यूरोप में इसको वैधता दी जा रही है, जिससे यहां की आबादी कम होती जा रही है. अत: समाज की दृष्टि से भी समलैंगिकता प्रमाणित नहीं होती है.

सन् 2009 में दिल्ली हाइकोर्ट ने वयस्कों के बीच समैंगिक संबंधों का अपराध न होने का निर्णय दिया था. हमारे क्रिमिनल कानून की धारा 377 के अनुसार ऐसे संबंध अपराध हैं. हाइकोर्ट ने इस धारा को अवैध ठहराया था. लेकिन पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के निर्णय को पलट दिया और इन संबंधों को अवैध बताया. ऐसे में समलैंगिक संबंधों को पुन: वैध करार देने के लिए हमारे क्रिमिनल कानून में संशोधन करना जरूरी हो गया है. तीन प्रमुख पार्टियों- कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और मार्क्‍सवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में इसे शामिल किया है.

सिर्फ भाजपा ने ऐसे संबंधों का विरोध किया है. देश में इन संबंधों को स्वीकार करने का वातावरण बन रहा है. लेकिन कभी-कभी बहुमत गलत सिद्घ हो जाता है, जैसे हिटलर के समय जर्मनी के मतदाताओं ने यहूदियों को मृत्यु देने का समर्थन किया था. अत: पार्टियों को चाहिए कि जनमत मात्र का अनुसरण न करें.

विषय की तह में जाने के लिए समलैंगिकता के कारणों को समझना होगा. ऋषिकेश के स्वामी शांतिधर्मानंद के अनुसार समलैंगिक प्रवृत्तियों की जड़ें पूर्वजन्म के आकर्षणों में निहित हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार समलैंगिकता एक प्रकार की कुप्रवृत्ति है, जिस पर व्यक्ति को नियंत्रण रखना चाहिए. समाजशास्त्री डेविड हाल्पेरिन तथा जीन फोकाल्ट के अनुसार मनुष्य की समलैंगिक प्रवृत्ति उसके मनोविज्ञान में निहित होती है. बहरहाल भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों की एक धारा में समलैंगिकता को मनोविज्ञान से जोड़ा गया है. पूर्वजन्म की वासना और गहरी मनोवृत्ति एक ही प्रवृत्ति की दो प्रकार की व्याख्या है.

इसके विपरीत दूसरे अध्ययन समलैंगिकता को शारीरिक बनावट के कारण बताते हैं. मनुष्य के मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस का एक हिस्सा सुप्राकियास्मेटिक न्यूक्लियस नाम से जाना जाता है. 1990 में डीएफ श्वाब ने पाया कि समलैंगिक पुरुषों के न्यूक्लियस का आकार सामान्य पुरुषों की तुलना में दोगुना बड़ा होता है. वैज्ञानिक लौरा एलेन ने पाया कि हाइपोथैलेमस के एक और हिस्से एंटिरियर कोमिसूर का आकार भी समलैंगिक पुरुषों में बड़ा होता है. वैज्ञानिक सीमोन लीवे ने पाया कि हाइपोथैलेमस के हिस्से आइएनएच3 का आकार समलैंगिक पुरुषों में छोटा होता है. मस्तिष्क के इस भाग से यौनांगों का संचालन होता है. इन शोधों से पता चलता है कि समलैंगिकता का संबंध शारीरिक ढांचे से है.

हमारे सामने समलैंगिकता के परस्पर दो विरोधी कारण हैं. एक मनोवृत्ति का है जिस पर नियंत्रण किया जा सकता है. दूसरा शारीरिक है जिस पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है. ये दोनों कारण आपस में जुड़े हुए हैं. मनोवृत्तियों के चलते व्यक्ति का दिमाग विशेष प्रकार से कार्य करता है, जिससे मस्तिष्क के विशेष हिस्सों का आकार बड़ा-छोटा हो जाता है. अहम सवाल यह है कि इस मनोवृत्ति की भर्त्सना की जाये, इसे स्वीकार किया जाये या फिर इसे नजरंदाज किया जाये? सर्वविदित है कि समलैंगिकों में एड्स का प्रकोप अधिक होता है. इससे समलैंगिकता के प्रति प्रकृति की अस्वीकृति दिखती है. सृष्टि के विस्तार के लिए सामान्य स्त्री-पुरुष का संबंध बनाना जरूरी है. चूंकि समलैंगिक प्रजनन नहीं करते हैं और इनके जीन समाप्त हो जाते हैं. अत: समलैंगिक युगलों की स्वाभाविक वृद्घि नहीं होती है. यदि प्रकृति को समलैंगिकता प्रिय होती, तो प्रकृति ने इनकी वृद्घि का मार्ग अवश्य दिया होता.

इतिहास साक्षी है कि समलैंगिक संबंधों को बढ़ावा देनेवाले समाज विलुप्त हो गये हैं. बाइबल में आता है कि सोडम शहर में समलैंगिक संबंधों का प्रचलन था. ईश्वर ने इस शहर को नष्ट कर दिया. पुरातन रोम में समलैंगिकता का सम्मान होता था. रोम के नागरिकों के लिए अपने दासों, नर्तकों या नर वेश्याओं के साथ यौन संबंध को बड़प्पन का मानदंड माना जाता था. यह साम्राज्य नष्ट हो गया. वर्तमान में अमेरिका व यूरोप में समलैंगिकता को वैधता दी जा रही है, जिससे यहां की आबादी कम हो रही है. अत: समाज की दृष्टि से भी समलैंगिकता प्रमाणित नहीं होती है. दरअसल, पश्चिमी समाज के स्वार्थी चरित्र के कारण समलैंगिकता बढ़ रही है. इसको अपने भौतिक सुख और इंद्रीय मनोरंजन मात्र से सरोकार है. समाज और सृष्टि से इनको कुछ लेना देना नहीं है.

हमें समलैंगिक व्यक्ति के प्रति सहानुभूति एवं सौहार्द की भावना के साथ इस कुप्रवृत्ति में रत होने को हतोत्साहित करना चाहिए. समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने के प्रावधानों को हटाना उचित दिखता है. सिगरेट पीना गैरकानूनी नहीं है, पर पैकेट पर लिखा रहता है कि सिगरेट पीने से स्वास्थ की हानि होती है. ऐसा ही नुस्खा समलैंगिक संबंधों पर लागू करना चाहिए. अन्यथा मनोरंजन मात्र को प्रधानता देने और प्रकृति का तिरस्कार करनेवाले देशों का पूर्व में जो हस्र हुआ है, वैसा हमारा भी होगा. इसलिए प्रकृति की सीमाओं के बीच रहने का उपाय करना चाहिए.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola