..अपनी मंजिल है कहां?

Published at :06 Apr 2014 5:43 AM (IST)
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..अपनी मंजिल है कहां?

।। राजेंद्र तिवारी।। (कारपोरेट एडिटर, प्रभात खबर) इस बार के आम चुनाव कई मामलों में नयी तरह के हैं. इस समय देश की आधी से ज्यादा आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम की है. 2020 तक 35 वर्ष से कम की आबादी 70 फीसदी तक हो […]

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।। राजेंद्र तिवारी।।

(कारपोरेट एडिटर, प्रभात खबर)

इस बार के आम चुनाव कई मामलों में नयी तरह के हैं. इस समय देश की आधी से ज्यादा आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम की है. 2020 तक 35 वर्ष से कम की आबादी 70 फीसदी तक हो जायेगी. यानी 65 फीसदी आबादी ऐसी है जो 1979 या इसके बाद पैदा हुई है. यानी जो लोग आज 35 साल के हैं, वे 1991 में 12 वर्ष की उम्र के हुए. यही वह साल है जब देश आर्थिक संकट से निकलने के लिए बाजारवाद और खुली अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ा. यानी हमारी 65 फीसदी आबादी के लिए आजादी की लड़ाई, आजादी के बाद देश के विकास का मॉडल, चीन की लड़ाई, पाकिस्तान की लड़ाई, बांग्लादेश की लड़ाई और आपातकाल सिर्फ किताबों की बातें हैं. यह पहला चुनाव है जब आजादी के समय या नेहरू युग से राजनीति कर रहे लोग किसी भी पार्टी में मुख्य भूमिका में नहीं हैं. भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी हाशिए पर गये, तो प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बन कर राजनीति के हाशिए पर चले गये. 2009 में ये दोनों महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे. यह पहला चुनाव है जिसमें भिन्नताओं के लिए कोई स्पेस दिखाई नहीं देता. हर पार्टी की स्थिति यही है कि यदि सबसे बड़े नेता से मतभिन्नता है तो अपनी राह देखिए. कांग्रेस-भाजपा से लेकर सपा-बसपा-ममता-जयललिता आदि की पार्टी तक. यह पहला चुनाव है जिसमें विचार दिखायी नहीं दे रहा है.

65 फीसदी आबादी का 35 फीसदी से कम उम्र का होने का इस चुनाव में मतलब क्या है? यह वह पीढ़ी है जिसने आजादी के आंदोलन को सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा है. यह वह पीढ़ी है जिसे आपातकाल का सिर्फ शाब्दिक अर्थ पता है. यह वह पीढ़ी है जो ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा..अपनी मंजिल है कहां’ के साथ किशोरवय में पहुंची. यह वह पीढ़ी है जो एकध्रुवीय विश्व में जवान हुई और जिसके जीवन में आइडियोलॉजी का मतलब सिर्फ उपभोक्तावाद है. वैचारिकशून्यता से लैस यह पीढ़ी प्रतिभा और मेधा की बात करती है और इसी के आधार पर समानता के मायने अपने लिए गढ़ती है. समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन कहते हैं कि विचारशून्य मानी जानेवाली यह पीढ़ी भले ही राजनीतिक समझ न रखती हो, लेकिन राजनीति को पुनर्परिभाषित करने का काम बखूबी कर रही है. उनका इशारा आम आदमी पार्टी की तरफ है. उनका कहना है कि आम आदमी पार्टी का मजबूत उदय और मोदी का उभार, दोनों ही घटनाक्रम इसी पीढ़ी की देन हैं. कांग्रेस भी इस पीढ़ी की विचारशून्यता का शिकार हुई प्रतीत होती है. देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए जानी जानेवाली यह पार्टी आज शर्मनाक तरीके से वंशवाद की शिकार तो है ही, सोच में अतिसामान्य और इतिहासबोध में लंगड़ी दिखायी दे रही है.

यही वह पार्टी है जिसने युवाओं को राजनीति से अलग रखने के लिए 70 के दशक में साजिशन यह प्रचार किया या करवाया कि राजनीति अच्छे लोगों की चीज नहीं है. हर माता-पिता अपने बच्चों को यही सिखाने लगा कि राजनीति से दूर रहना चाहिए. लेकिन यह व्याकरण बदला 2012 में अरविंद केजरीवाल ने. बाद में चुनावी राजनीति में आकर अरविंद ने नये राजनीतिक तौर-तरीके ईजाद कर इन युवाओं को बड़ी संख्या में राजनीति की ओर आकर्षित किया. वैचारिक रूप से शून्य इस पीढ़ी के उभार का फायदा नरेंद्र मोदी को मिला. इस पीढ़ी ने पार्टी को संस्था के तौर पर कभी नहीं देखा था. क्योंकि जब यह पीढ़ी समझने लायक हुई तब संस्था के तौर पर पार्टियां खत्म हो रही थीं और परिवार-वंश की बपौती के तौर पर उभर रही थीं. आप देखेंगे तो पायेंगे कि मोदी का भी उभार एक वैचारिक और विजनरी संस्था के तौर पर भाजपा का उभार नहीं है, बल्कि पार्टी से इतर एक नेता का उभार है.

90 के दशक में जब आडवाणी की लहर थी, तब वह लहर व्यक्ति केंद्रित न होकर पार्टी केंद्रित थी. शिव विश्वनाथन का कहना है कि इसके चलते पहले जहां पार्टियों के अंदर व बाहर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा होती थी, उसने अब राजनीतिक दुश्मनी का रूप ले लिया है. यह बात देश में भिन्नता के लिए सिकुड़ते स्पेस के रूप में भी दिखायी दे रही है. यही वजह है कि तमाम वो मुद्दे चुनाव में दिखायी ही नहीं दे रहे जिन पर चर्चा किये जाने की जरूरत है. चाहे उद्योगों में लोगों की छंटनी का सवाल हो, रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल से ऊसर होती भूमि का सवाल हो, सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर बढ़ते खर्च के साथ उसकी गुणवत्ता का लगातार कम होते जाने का सवाल हो, चरमराती सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का सवाल हो या गरीबी से लड़ने जैसे सवाल हों, कहीं कोई आवाज नहीं है. क्यों नहीं हैं ये सवाल? क्योंकि 35 वर्ष से कम आयु की इस पीढ़ी का वही हिस्सा बोल रहा है जो मध्यवर्ग या उच्चवर्ग से आता है और बाकी के लोग तो हाशिए पर हैं. उनकी आवाज के लिए स्पेस कहां है? इस चुनाव में जो तस्वीर दिखायी दे रही है, उसमें इनके लिए स्पेस और सिकुड़ जाये तो ताज्जुब की बात न होगी.

उन्हें शाही कहना बंद करिए

शाही इमाम के फतवे को लेकर सोशल साइट पर एक कमेंट-

पहले तो उन्हें शाही कहना बंद कीजिए. 2004 में उनके लाख कहने पर दिल्ली की जामा मस्जिद के कर्मचारियों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया होगा. नमाज पढ़वाते हैं, इस नाते जितने सम्मान के हकदार हैं, उतना सम्मान कीजिए. बस. वे अपने इलाके में एक विधायक तक तो जिता नहीं पाते, देश भर के लोगों को कितना प्रभावित कर पाते होंगे, अंदाजा लगाइए.

और अंत में कविता

इस बार पढ़िए हिब्रू भाषा के कवि येहूदा अमिचाई की कविता. इसका हिंदी अनुवाद किया है फारूक शाह ने.

दर्द की चौकसी

और खुशी की धुंधलाहट के बारे में

सोचता हूं

लोग डाक्टर के अस्पताल में

अपने दर्दो का बयान करते हैं, तब कितने चौकस होते हैं

जिन लोगों को पढ़ना-लिखना नहीं आता

वे भी चौकस होते हैं :

यहां लपलपाता दर्द हो रहा है, और यहां इतना दर्द कि

दुहरे हो जाएं

यहां भयंकर दर्द होता है और यहां पर हल्का सा दर्द

ठीक यहां पर.. बराबर यहीं.. हां, हां..

खुशी सब कुछ धुंधला बना देती है

प्रेम और उत्सव की रातों के बाद भी

मैंने लोगों को कहते सुना है : बहुत मज़ा आया

मैं सातवें आसमान में था

और बाहर के अवकाश में

अवकाशयान के साथ तैरता अवकाशयात्री भी

इतना ही कह पाया : अदभुत ! अपार अचरज !

मेरे पास शब्द नहीं हैं

खुशी की धुंधलाहट और दर्द की चौकसी के बारे में

मैं तेज दर्द की चौकसी से

धुंधली खुशी को बयान करना चाहता हूं

क्योंकि मैं दर्दो के बीच बोलना सीखा हूं

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