वो चुनावी उपमा कहां से लाऊं?

Published at :05 Apr 2014 3:42 AM (IST)
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वो चुनावी उपमा कहां से लाऊं?

।। रजनीश आनंद।। (प्रभात खबर.कॉम) पिछले दिनों टी-20 विश्व कप में पाकिस्तान के सफाये के बाद मैं खबर बनाने में जुटी थी कि मेरा फोन बजा. फोन पर मेरे मित्र शर्माजी थे. उन्होंने न मेरा हाल पूछा, न अपना बताया, सीधे मुद्दे पर आ गये. उनकी बात सुन कर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि शर्माजी […]

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।। रजनीश आनंद।।
(प्रभात खबर.कॉम)
पिछले दिनों टी-20 विश्व कप में पाकिस्तान के सफाये के बाद मैं खबर बनाने में जुटी थी कि मेरा फोन बजा. फोन पर मेरे मित्र शर्माजी थे. उन्होंने न मेरा हाल पूछा, न अपना बताया, सीधे मुद्दे पर आ गये. उनकी बात सुन कर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि शर्माजी याचक के रूप में मेरे सामने हैं. उन्होंने कहा, मोहतरमा आप लिखने-पढ.ने वाली हैं इसलिए मेरी समस्या का समाधान आप ही के पास है.
मैंने पूछा, काम क्या है. उन्होंने कहा, आप मिलिए, मैं बताता हूं. जल्दी-जल्दी काम निबटा कर, मैं मित्रता का फर्ज निभाने शर्माजी के घर पहुंच गयी. मुझे देखते ही उनका चेहरा खिल उठा. उन्होंने बडे सम्मान से मुझे बिठाया और शरबत का गिलास थमा दिया. मैंने पूछा, क्या बात हो गयी शर्माजी? शर्माजी ने बताया, मैं बडी मुसीबत में हूं. मैंने कहा, अब क्या मुसीबत, पार्टी ने आपको टिकट तो दे ही दिया है. शर्माजी ने बताया, एक चुनावी सभा में मेरे प्रतिद्वंद्वी ने मुझे गधे का बडा भाई कह दिया है. अब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि मैं उसे क्या संज्ञा दूं. उसका भाषण सुन कर जी तो किया कि .. का टेंटुआ ही दबा दूं, लेकिन फिर सोचा ऐसा करूंगा, तो जेल जाने का डर और कहीं फिर चुनावी मैदान से तडीपार कर दिया गया, तो परेशानी और बढ. जायेगी.
फिर एक मन हुआ कि मैं भी अपनी सभा में उसे पिल्ले का बडा भाई या गुंडों का बादशाह कह दूं. लेकिन अभी मैं ऐसा करने की सोच ही रहा था कि पता चला कि देश के कुछ बडे नेताओं ने स्वघोषित प्रधानमंत्री को इन विशेषणों से नवाज दिया है. फिर इच्छा हुई कि उसके खानदान की ऐसी की तैसी कर दूं. लेकिन वहां भी मैं मात खा गया. ‘नमो’ पहले ही यहकर चुके हैं. उन्होंने न सिर्फ युवराज के देसी रिश्तेदारों की खिंचाई की, बल्कि ताने मारने के लिए इटली तक हो आये. फिर सोचा कि उसके पुरुषार्थ पर ही सवाल उठा कर थोडा उसकी फजीहत कर दूं, लेकिन मैं यहां भी पीछे रह गया. क्योंकि अपने विदेश मंत्री पहले ही नपुसंकता का प्रमाणपत्र बांट चुके हैं.
अब मैं बडी दुविधा में हूं. ऐसे में आप मुझे संकटमोचक के रूप में नजर आयीं, मैं आपके आगे नतमस्तक हूं. मेरी लाज बचा लें. मेरे दुश्मन प्रत्याशी के लिए कोई ऐसा विशेषण तैयार करें कि उसकी नींद उड. जाये और मैं चैन से सोऊं. शर्माजी का आग्रह न सिर्फ मेरे लिए चौंकाने वाला था, बल्कि मेरी क्षमता पर भी सवाल खडे कर रहा था. कारण यह था कि शर्माजी ने अपने आग्रह के साथ यह बात भी जोड. दी थी कि आप इतने वर्षो से लिखने-पढने का काम कर रही हैं, इसलिए आपके लिए यह काम बहुत सहज होगा. शर्माजी की बातों को सुन कर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर मैं शर्माजी को क्या जवाब दूं. वहीं देश के राजनेताओं की बयानबाजी को सुन कर मेरे जेहन में यह सवाल कौंध रहा था आखिर कितना गिरेंगे हमारे नेता?
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