क्या हमारा वोट देश गढ. पायेगा?

वोट करना हमारा संवैधानिक अधिकार है और फर्ज भी. हर व्यक्ति जानता है कि एक स्थिर सरकार के लिए हमारे वोट से ज्यादा महत्वपूर्ण है वोटों का अंकगणित. चुनाव आयोग की दी हुई एक नयी ताकत ‘नोटा’ के शक्ल में मिली है. वैसे ‘नोटा’ बटन का दबाने और वोट नहीं देने में ज्यादा फर्क नहीं […]
वोट करना हमारा संवैधानिक अधिकार है और फर्ज भी. हर व्यक्ति जानता है कि एक स्थिर सरकार के लिए हमारे वोट से ज्यादा महत्वपूर्ण है वोटों का अंकगणित. चुनाव आयोग की दी हुई एक नयी ताकत ‘नोटा’ के शक्ल में मिली है.
वैसे ‘नोटा’ बटन का दबाने और वोट नहीं देने में ज्यादा फर्क नहीं है. ‘नोटा’ बटन दबाने के पीछे क्या तर्क हो सकता है? क्या यह चुनाव का बहिष्कार है या कोई दिशाहीन मानसिकता की उपज? कुछ चुनावी वादों को छोड. कर उम्मीदवारों का विकल्प भी हमारे पास नहीं है.
वोट करने का मतलब है नीम या करेले में से ही किसी को चुनना. इतिहास गवाह है कि धर्म और कर्तव्य की आड. में लिये गये फैसलों ने हमारी आबरू को सरेआम नोचा-खसोटा है. ऐसे में क्या हमारा वोट सही मायने में देश गढ. पायेगा? हमें चाहिए ‘वोट विद निगेटिव मार्किग’ का हक, जो हमें पछतावे से भी बचायेगा.
एमके मिश्र, ई-मेल से
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