चुनावी जोश में भाषा की मर्यादा न भूलें

Published at :04 Apr 2014 5:19 AM (IST)
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चुनावी जोश में भाषा की मर्यादा न भूलें

चुनावी वेला में वोटरों को लुभाने के लिए विकास का सपना हर पार्टी परोस रही है. यह बात अलग है कि आक्रामक प्रचार-अभियान के बूते भाजपा ने विकास के सपने को मोदी-मय बना दिया है. अविश्वसनीय होते चुनावी सर्वेक्षणों के कारण मतगणना से पहले यह दावा करना मुश्किल है कि सीटों के लिहाज से विकास […]

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चुनावी वेला में वोटरों को लुभाने के लिए विकास का सपना हर पार्टी परोस रही है. यह बात अलग है कि आक्रामक प्रचार-अभियान के बूते भाजपा ने विकास के सपने को मोदी-मय बना दिया है. अविश्वसनीय होते चुनावी सर्वेक्षणों के कारण मतगणना से पहले यह दावा करना मुश्किल है कि सीटों के लिहाज से विकास का मोदी का सपना क्या कमाल दिखायेगा, लेकिन भाजपा मान चुकी है कि विकास के जुमले को मोदी-मय बना देने के बाद उसे इसकी योजना का खुलासा करने की जरूरत नहीं है.

उसे लग रहा है कि मोदी को पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में उतार कर वह साक्षात विकास को ही अपनी रैलियों में साकार कर रही है. तभी तो, पहले चरण के मतदान के तीन दिन पहले तक भी पार्टी का घोषणापत्र नहीं आया है. भाजपा नेता बलवीर पुंज तो यह तक कहते पाये गये कि मोदी जो बोलते हैं, वही घोषणापत्र है! किसी नेता को ‘सर्वशक्तिमान’ प्रतिष्ठित करने की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी! ऐसे में विकास का मोदी-ब्रांड सपना भाजपा प्रत्याशियों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा है. जब कोई चीज सिर चढ़ कर बोले, तो पहली चोट आदमी के होश-ओ-हवाश पर पड़ती है और होश दुरुस्त न हों तो हानि स्थापित मर्यादाओं की होती है.

यह स्थापित राजनीतिक मर्यादाओं की हानि का ही सबूत है कि दक्षिण दिल्ली से भाजपा प्रत्याशी रमेश विधूड़ी अपने पक्ष में वोट डालने के लिए मतदाताओं को अनोखे कारण बता रहे हैं. प्रचार अभियान में वे कहते पाये गये कि ‘नरेंद्र मोदी का पीएम बनके आना बहुत जरूरी है, पीएम बनके वो न सिर्फ पाकिस्तान को, बल्कि अमेरिका को भी ठोकेगा.’ लोकतंत्र की मर्यादा का ख्याल करनेवाले को इस वाक्य पर अफसोस चाहे जितना हो, हैरत नहीं होगी.

कुछ दिनों पहले राजनीतिक शब्दकोश में ‘कुत्ते का पिल्ला’ जैसे मुहावरे का योगदान स्वयं मोदीजी ने किया था! दिलचस्प यह भी है कि जहां भाजपा प्रत्याशी मोदी-नाम की माला जाप के असर में भाषा की मर्यादा लांघ रहे हैं, वहीं इसकी काट में कई अन्य दलों के नेता भी ऐसी हिंसक भाषा के प्रयोग में एक-दूसरे को पीछे छोड़ रहे हैं. भ्रष्ट भाषा, भ्रष्ट राजनीति की पहली सूचना होती है. इसलिए चुनावी वेला में यह याद रखा जाना चाहिए कि हमारे देश में राजनीति का लोकतंत्र है, गालियों का नहीं.

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