चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

Published at :04 Apr 2014 5:16 AM (IST)
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चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

।। लोकनाथ तिवारी।। (प्रभात खबर, रांची) आजकल चुनाव के अलावा कुछ सूझता नहीं. सूझता भी है तो किसी को भाता नहीं. हर तरफ चुनावी रंग सिर चढ़ कर बोल रहा है. चुनाव में किसी की चांदी है, तो किसी का सोना. किसी की पांचों अंगुलियां घी में हैं, तो किसी का सिर कड़ाही में. सभी […]

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।। लोकनाथ तिवारी।।

(प्रभात खबर, रांची)

आजकल चुनाव के अलावा कुछ सूझता नहीं. सूझता भी है तो किसी को भाता नहीं. हर तरफ चुनावी रंग सिर चढ़ कर बोल रहा है. चुनाव में किसी की चांदी है, तो किसी का सोना. किसी की पांचों अंगुलियां घी में हैं, तो किसी का सिर कड़ाही में. सभी चुनाव की बहती गंगा में हाथ धोने में जुट गये हैं. ठलुओं की निकल पड़ी है. सुबह से ही मुंह धो कर देश निर्माण में अपना योगदान करने निकल पड़ते हैं. अपना योगदान करने के लिए ये जनता को जागरूक करते हैं, लोगों को लुभाते हैं. नेताओं की नकल करते हैं. नेताजी के आगे-पीछे, दायें-बायें डोलते हैं. कई बार तो ये नेताओं से भी आगे निकल जाते हैं. नेताजी भी इनको चुनाव भर ङोलने के लिए मजबूर हैं. इनकी ऊल-जुलूल बातें भी ध्यानमग्न होकर सुनते हैं. कई बार तो नेताजी इनके बहकावे में आ भी जाते हैं और इनकी सिखाई-पढ़ाई बातों को मंच से चटपटे लहजे में बोल देते हैं. कई बार इस चक्कर में इनकी भद पिट जाती है. दो दिन पहले ही एक शेर सरीखे नेता ने झुमका गिराने की बात कही है. उनका कहना है कि अब झुमका नहीं गिरेगा, बल्कि सब कुछ गिर जायेगा. गिरने और गिराने में हमारे नेताओं का अनुभव माउंट एवरेस्ट की उम्र को भी मात करता नजर आता है. कहीं खुद गिरते हैं तो कहीं दूसरों को गिराने में असीम आनंद की अनुभूति प्राप्त करते हैं.

एक और खास पार्टी के बुद्धिजीवी ने कहा कि उनको किसी ईरानी या पाकिस्तानी की परवाह नहीं है. यानी इन्होंने अपने विरोधी के नाम का मखौल उड़ाना चाहा है. पता नहीं इन्होंने नाम व चुनाव चिह्न् का मखौल उड़ाने की कला कहां से सीखी है. कहीं हमारे काका ने तो इनको यह गूढ़ ज्ञान नहीं न दे दिया. काका कहते हैं कि बचपन में उनके सखा मजबूत चुनाव चिह्न् का प्रचार करते थे. चुनाव चिह्न् और नेताओं के नाम की पैरोडी बना कर मखौल उड़ाते थे. नेताओं के नाम के साथ तरह-तरह के नारे लगाते थे. खा गयी राशन पी गयी तेल, गली गली में शोर है, जीतेगा भई जीतेगा- के साथ नेताओं का गुणगान करते थे. अब न वह जमाना रहा और न ही उस दौर के बच्चे.

अब तो किशोर उम्र लड़के भी प्रचार करने के एवज में सुबह बीयर, दोपहर में मुरगा और शाम को अंगरेजी मांगते हैं. नेता भी चाल-चरित्र की बातों को ताक पर रख इनकी फरमाइशें पूरी करते हैं. ये भी पैरोडी में लोकप्रिय गानों की नकल करते हुए दिल्ली की कुरसी दिलाने का वादा करते हैं. सरेआम गाते दिखते हैं- रोके किसी के हम तो रुके ना, गाली-गलौज भी करके रहेंगे, विरोधियों से पंगे करेंगे, फेसबुक ट्विटर पे दंगे करेंगे. चुनाव भर इनकी चांदी है. चुनाव के बाद नेताओं की चांदी या यूं कहिए सोना होने वाला है. जनता को तो वैसे भी सोने की आदत है. जागना तो जैसे ये जानती ही नहीं. एक बार जाग जाये फिर चुनावी जंग का सकारात्मक परिणाम आते देर नहीं लगेगी.

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