हम तोहरा पे राजी ना..

Published at :02 Apr 2014 5:46 AM (IST)
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हम तोहरा पे राजी ना..

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) साहेब की अकल सही सलामत रहे, परिंदे उड़ान भरते रहें, चौपाये घास खाएं, ऊंट खीस निपोरे बंदर को चिढ़ाये, कहता चाहे बौर, सुनता चाहे सरेख आज एक किस्सा सुनाता हूं. सुना-सुनाया किस्सा है. किसी नगर में एक सयाना पंसारी रहता था. बे ईमान था. लालची और लंपट था. कायर था और […]

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।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

साहेब की अकल सही सलामत रहे, परिंदे उड़ान भरते रहें, चौपाये घास खाएं, ऊंट खीस निपोरे बंदर को चिढ़ाये, कहता चाहे बौर, सुनता चाहे सरेख आज एक किस्सा सुनाता हूं. सुना-सुनाया किस्सा है. किसी नगर में एक सयाना पंसारी रहता था. बे ईमान था. लालची और लंपट था. कायर था और गपोड़ी था. उसे झक सवार हुई कि किसी और देश में जाकर व्यापार करना चाहिए. अपने तो सब लुट चुके हैं, अब औरों को भी लूटने का धंधा करना चाहिए. सो एक दिन वह एक बैलगाड़ी पर पूरे साजो सामान के साथ पूरे परिवार को भी बैठा लिया और निकल पड़ा लूट यात्र में. झूठ बोलते, फरेब रचते, हवाबाजी करते आगे बढ़ा जा रहा था, कि अचानक एक भेड़िया उसके पीछे लग गया. उस लंपट की अकल देखो कि वह एक-एक करके अपने परिवार के सदस्यों को नीचे फेंकता गया. इससे उसे दो फायदे थे, एक कि भेड़िया उसे खायेगा और हम आगे बढ़ जायंेगे. दूसरा कि जिस देश में हम जायेंगे, वहा कोई हमें रोकने-टोकने वाला नहीं रहेगा और हमारी असलियत छुपी रह जायेगी. इतना ही नहीं, गाड़ी उलार न होने पाये इसके लिए वह नये पर दंतहीन जानवरों को अपनी गाड़ी पर लादता भी रहा. लेकिन होनी का किसको पता. आगे एक खन्धक दिखा. वहां एक शेर मिला..

आगे क्या हुआ दादू? पर कयूम दादू कब रुकनेवाले थे, हबीब की बदमिजाज बकरी उनकी लुंगी मुंह में दबाये भागी जा रही थी. आगे-आगे बकरी पीछे-पीछे कयूम मियां और सबे आगे कयूम की आवाज जो पब्लिक के लिए थी- पकड़ लो भाई, ई ससुरी तो जी का जंजाल बन गयी है. अंतत: बकरी चौराहे पर पकड़ में आ ही गयी. चौराहे पर लुंगी मिली. लुंगी का मुआइना हुआ. लुंगी सही सलामत रही. बकरी वापस पुजारी के खेत में कूदी और कयूम मियां लाल्साहेब की दुकान पर.

चौराहे पर भट्ठी गर्म मिली, उससे ज्यादा गर्म राजनीति रही. मद्दू का कहना चल रहा था- गुब्बारे की हवा निकल गयी है. उसकी असलियत खुल गयी है. चिखुरी ने मूंछों के नीचे से मुस्कुराते हुए जिज्ञासा जाहिर की- किसकी असलियत की बात हो रही है भाई? मद्दू ने जवाब दिया- उसी की बात हो रही है दादा, जो प्रधान मंत्री बना दौड़ रहा था. चिखुरी का जायका बिगड़ गया- कोई पोलेटिकल बात करो भाई! कीं उपाधिया को नागवार लगा- वो राजनीतिक नहीं है का? चिखुरी जोर से चीखे-चोप्प! न वो राजनीतिक है न उसका गिरोह. कीन ने गमछे से पैर झाड़ा और खुंदक में बोले- वह पार्टी है कि गिरोह है? चिखुरी ताव खा गये- तो जे बात तुम उनसे जा कर क्यों नहीं पूछते? वो खुद कहता है कि वह राजनीतिक संगठन नहीं है, बोलता है कि नहीं? जब राजनीतिक नहीं है तो क्या है, यह तो बताये? और सुनो अडवाणी नाराज हुए तो कौन पहुंचा था मनाने?

यह राजनीतिक सवाल नहीं था? सारे राजनीतिक फैसले वो ले और बोले कि राजनीतिक नहीं है. नवल ने आंखें गोल की. -दद्दा हम सुने रहे की आजकल हूआं मान-मनोवल चालत बा? लालमुनी चौबे भी मनाये गये? टंडन मनाये गये. कलराज मनाये गये. सुषमा हत्थे से उखड़ी पडी हैं. नकवी साबिर से भिड़े पड़े हैं? मद्दू ने पत्रकारिता जोड़ी- जापानी भाषा में इसे हाराकीरी बोलते हैं. जैसे अपने यहां आत्महत्या होती है. ठीक वैसे. अपनी नश कर आदमी मारता है. हियां दोनों काम हो रहा है. कुल बड़के फीच के डोरी पे दाल दिये गये हैं सूखने के लिए. और हर घर के बाहर पड़े कबाड़ को कंधे पे लादे उन्हें चमकाया जा रहा है.

दद्दू! उमा भारती को सुना आपने? गुजरात जाकर उनके ही घरे में सच्चाई बोल आयी. बोली यह विकास पुरुष नहीं है विनाश पुरुष है. आज पूरा गुजरात भय में जी रहा है. और भे बहुत कुछ बोला है. ऐसी फजीहत तो कभी इसी की नहीं देखा.

बात जारी थी कि अचानक लाल्साहेब अपनी मादरीजुबान पर उतर आये- चुनाव जाये.. एथी पे. हम तो किसी को भी वोट ना देबे.. चिखुरी मुस्कुराये- कोई वजह? लाल्सहेब और लाल हो गये- इस चुनाव में गांव भी कहीं दिखात बा? किसान मजदूर कहीं चर्चा में बा? कोई मुद्दा बताओ जो इस चुनाव में हो? बस हवा बा, पानी बा, कटहल बा.. बाबा जी का.. बस! चिखुरी ने रोका.

सब रुक गये. चिखुरी ने फैसला सुनाया- लहर किसी की नहीं है, और अगर है भी तो सरकार के खिलाफ है, सो भी ये डिब्बेवालों की तरफ से फैलायी गयी है. लेकिन अब सब ठीक हो रहा है. गुब्बारा पिचक गया है.. नवल ने ठहाका लगाया- पिचका नहीं है दद्दा! पिचका होता तो दुबारा फूल सकता था. यह तो फट गया है. जैसे लोलारक की सायकिल भ्रष्ट हुई रही.. और नवल चलते बने.. हे तू आव अंगना.. लाल्साहेब को याद आया, इमरजेंसी में जब वे बनारस जेल में बंद रहे तो लालमुनी चौबे यही गाना गाते रहे तू आव अंगना..

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