संतुलित हो मौद्रिक नीति की समीक्षा

Published at :31 Mar 2014 3:11 AM (IST)
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संतुलित हो मौद्रिक नीति की समीक्षा

कल (1 अप्रैल) से नया वित्त वर्ष शुरू हो रहा है. लोकसभा चुनाव, शेयर बाजार में तेजी, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में वृद्धि और विदेशी निवेश में सुधार जैसी राजनीतिक एवं आर्थिक हलचलों के बीच कल भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की समीक्षा भी जारी होनेवाली है. अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के […]

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कल (1 अप्रैल) से नया वित्त वर्ष शुरू हो रहा है. लोकसभा चुनाव, शेयर बाजार में तेजी, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में वृद्धि और विदेशी निवेश में सुधार जैसी राजनीतिक एवं आर्थिक हलचलों के बीच कल भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की समीक्षा भी जारी होनेवाली है. अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के संदर्भ में इस समीक्षा का बहुत महत्व है.

रिजर्व बैंक ने 28 जनवरी को मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद महंगाई का हवाला देते हुए मुख्य नीतिगत दरों में 25 आधार अंकों (बेसिक प्वाइंट्स) की बढ़ोतरी की थी. बहुत सी कंपनियां कल से ही बिक्री के सालाना आंकड़े प्रस्तुत करना शुरू कर देंगी. सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां भी कल तेल कीमतों की समीक्षा करेंगी. इस हफ्ते कारोबारी गतिविधि सूचकांक के आंकड़े भी जारी होंगे.

पिछले दिनों बैंकिंग क्षेत्र, सार्वजनिक उपक्रमों, धातु, ऊर्जा, रियल एस्टेट आदि के शेयरों में खासी तेजी देखी गयी है. एक अप्रैल से प्राकृतिक गैस की कीमतें नहीं बढ़ाने के चुनाव आयोग के निर्देश के बावजूद इस व्यवसाय में लगी कंपनियों के शेयरों में भी उछाल देखा गया है. हालांकि बाजार में आमतौर पर जारी सुस्ती और कर्जो की महंगी दरों से उद्योग जगत परेशानी में है, लेकिन मुद्रास्फीति की थोक और खुदरा दरों में मामूली कमी राहत की बात है. ऐसे में उद्योगों और कारोबारियों को उम्मीद है कि रिजर्व बैंक या तो ब्याज यानी रेपो दर में कुछ कटौती करेगा या मौजूदा दर को बरकरार रखेगा.

ब्याज दरों में कमी से बैंकों को रिजर्व बैंक से कम दर पर ऋण मिल सकेगा, जिसका लाभ वे बाजार को भी दे सकेंगे. रिजर्व बैंक ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि मुद्रास्फीति पर लगाम उसकी प्राथमिकता है. उसे रुपये को मजबूत करने और निर्यात पर इसके असर का भी ध्यान रखना है. पिछले कुछ दिनों से विदेशी मुद्रा की आमद से रुपये को मिली मजबूती से निर्यात पर दबाव बढ़ा है. रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए इन तमाम कारकों के मद्देनजर दरों के संबंध में कोई संतुलित निर्णय लेना है. रिजर्व बैंक को दरों में कमी के उद्योग जगत के अनुरोध पर विचार करना चाहिए, लेकिन साथ में उसके निर्णय से आम लोगों की जेब पर पड़नेवाले असर को भी उसे जरूर ध्यान में रखना चाहिए.

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