बीसीसीआइ की अलोकतांत्रिकता

।। धर्मेद्रपाल सिंह।। (वरिष्ठ पत्रकार) जो काम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) को करना चाहिए था, वह काम सुप्रीम कोर्ट ने किया है. एन श्रीनिवासन को हटा कर सुनील गावस्कर को बोर्ड का अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त करने के आदेश से तो यही सिद्घ होता है. इस आदेश से पता चलता है कि देश के सबसे […]
।। धर्मेद्रपाल सिंह।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
जो काम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) को करना चाहिए था, वह काम सुप्रीम कोर्ट ने किया है. एन श्रीनिवासन को हटा कर सुनील गावस्कर को बोर्ड का अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त करने के आदेश से तो यही सिद्घ होता है. इस आदेश से पता चलता है कि देश के सबसे लोकप्रिय खेल के संचालन की जिम्मेदार संस्था में शेष पदों पर बैठे लोग कितने गैर-जिम्मेदार हैं. क्रिकेट में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने में उनकी कोई रुचि नहीं है. पिछले साल मई में आइपीएल में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के आरोप में तीन खिलाड़ियों, बोर्ड अध्यक्ष के दामाद गुरुनाथ मयप्पन तथा कुछ सट्टेबाजों की गिरफ्तारी के बाद से लेकर अभी तक बीसीसीआइ ने न तो मामले में ठीक से जांच की और न संदेह के घेरे में आये किसी टीम या पदाधिकारी को हटाने का साहस दिखाया. बोर्ड अध्यक्ष श्रीनिवासन ने तो अपने दामाद और अपनी टीम चैन्नई सुपर किंग को बेशर्मी से क्लीन चिट दे दी, तिकड़म कर दोबारा अध्यक्ष बन गये तथा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) का अध्यक्ष बनने की जुगत भी लगा ली.
बीते एक दशक में क्रिकेट खेल नहीं, कारोबार बन गया है. आज बीसीसीआइ किसी बड़ी प्राइवेट कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की तरह काम करती है. हमारा बोर्ड दुनिया की सबसे धनी संस्था है, जिसके शीर्ष पदों पर राजनेता, उद्योगपति तथा वरिष्ठ नौकरशाह बैठे हैं. इस प्राइवेट क्लब के लोग जो टीम चुनते हैं, वह भारतीय क्रिकेट टीम कहलाती है, लेकिन देश की जनता और करोड़ों खेल प्रेमियों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती. बोर्ड में पारदर्शिता का कोई स्थान नहीं है. सब कुछ गुपचुप तरीके से होता है. पदों पर बैठे लोग एक-दूसरे के रहस्यों और कमजोरियों पर पर्दा डाले रखते हैं. जानी दुश्मन राजनेता आपसी मतभेद भुला देते हैं. बारी-बारी से पदों का बंटवारा होता रहता है. कोई किसी के खिलाफ नहीं बोलता. तमाम गड़बड़ियों के बावजूद श्रीनिवासन के बोर्ड अध्यक्ष बने रहने की वजह यही है. सुप्रीम कोर्ट ने तो श्रीनिवासन को पद छोड़ने आदेश दे दिया, लेकिन भारतीय राजनीति के चमकते सितारों ने कभी यह बात अपनी जुबान से नहीं निकाली.
बीसीसीआइ और अधिकांश राज्यों के क्रिकेट संगठनों का संविधान अलोकतांत्रिक है. जब आइपीएल का जन्म हुआ तब शरद पवार बोर्ड के अध्यक्ष थे. श्रीनिवासन भी पदाधिकारी थे. उनकी कंपनी इंडिया सीमेंट चैन्नई की टीम को खरीदना चाहती थी, जो बोर्ड के संविधान के मुताबिक मुमकिन नहीं था. इसमें संशोधन कर दिया गया और चेन्नई सुपर किंग्स टीम श्रीनिवासन को मिल गयी. बोर्ड के संविधान में किसी पदाधिकारी के कुछ समय के लिए पद से हटने और फिर पद पर लौट आने का कोई नियम नहीं है. श्रीनिवासन मामले में इसका उलंघन हुआ है. अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनील गावस्कर को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. वह केवल आईपीएल-7 का काम देखेंगे. आंध्र से बोर्ड के उपाध्यक्ष शिवलाल यादव बाकी जिम्मेदारियां निभायेंगे. जांच पूरी होने पर यदि श्रीनिवासन को क्लीन चिट मिल गये, तो वे अध्यक्ष पद पर लौट आयेंगे.
बीसीसीआइ से जुड़ी राज्य इकाइयों का हाल तो और भी बुरा है. मठाधीशों की अनुमति के बिना वहां किसी नये व्यक्ति का घुसना या चुनाव लड़ना असंभव है. राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन पर 52 बरस तक रूंगटा परिवार का कब्जा रहा. गुजरात की इकाई 36 साल से निरंजन शाह के अधीन है. कितने आश्चर्य की बात है, कपिल देव जैसा महान खिलाड़ी अपने गृह राज्य हरियाणा में क्रिकेट एसोसिएशन की सदस्यता नहीं पा सका. दिल्ली में डीडीसीए का हाल तो और भी बुरा है. वहां प्रॉक्सी के बल पर बरसों से चुनाव जीते जा रहे हैं. कई नामी खिलाड़ियों और प्रतिष्ठित लोगों को डीडीसीए की सदस्यता नहीं दी गयी, जबकि पदाधिकारियों ने अपने खानसामों और ड्राइवरों को सदस्य बना दिया है. ऐसे वोटों के बल पर ही वहां चुनाव जीते जाते हैं.
खेल प्रेमियों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए. बोर्ड को पटरी पर लाने के लिए कुछ बड़े फैसले किये जाने जरूरी हैं. बीसीसीआइ और सभी राज्यों की क्रिकेट इकाइयों को लोकतांत्रिक बनाने के लिए उनके संविधान में संशोधन होना समय की मांग है. साथ ही नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल-2013 जल्द ही पारित किया जाना चाहिए. इसमें बीसीसीआइ को आरटीआइ के तहत लाने, आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति के किसी खेल संगठन के चुनाव में खड़े होने पर पाबंदी जैसे नियम हैं. खेल चुनाव आयोग, खेल अपील पंचाट के गठन का प्रावधान है. एक खेल आचार संहिता आयोग के गठन का प्रावधान भी है. यदि यह कानून बन जाये, तो बोर्ड पर नकेल डाली जा सकती है. आशा है सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद उन्हें बेनकाब किया जा सकेगा, जो क्रिकेट में व्याप्त गंदगी के असली सूत्रधार हैं.
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