मैं हूं सबसे बड़ा देशभक्त नेता

Published at :22 Mar 2014 4:52 AM (IST)
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मैं हूं सबसे बड़ा देशभक्त नेता

।। शैलेश कुमार।। (प्रभात खबर, पटना) मैं एक होनहार नेता हूं. मुझ से अच्छी देशसेवा कोई नहीं कर सकता. लेकिन इसके लिए चुनाव जीतना पड़ेगा. और जीतूंगा तब, जब पार्टी मुङो टिकट देगी. इस बार तो हद हो गयी. इतने वर्षो तक पार्टी की सेवा की और जब चुनाव का वक्त आया, तो मुङो अंगूठा […]

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।। शैलेश कुमार।।

(प्रभात खबर, पटना)

मैं एक होनहार नेता हूं. मुझ से अच्छी देशसेवा कोई नहीं कर सकता. लेकिन इसके लिए चुनाव जीतना पड़ेगा. और जीतूंगा तब, जब पार्टी मुङो टिकट देगी. इस बार तो हद हो गयी. इतने वर्षो तक पार्टी की सेवा की और जब चुनाव का वक्त आया, तो मुङो अंगूठा दिखा दिया. काम मैंने किया और टिकट दूसरे को मिल गया. मैंने छोड़ दी पार्टी. गुस्से में नहीं, देशप्रेम के कारण. नयी पार्टी में जाऊंगा.

चुनाव लडूंगा. जीत कर संसद में जाऊंगा. तभी तो देशसेवा करूंगा. पार्टी छोड़ने के बाद गूगल में वैकेंसी चेक की. एक पार्टी को सुयोग्य कैंडिडेट की तलाश थी. अप्लाइ कर दिया. मेरे दलबदल, घोटाले और जेल के अंदर-बाहर के रिकॉर्ड को देखते हुए आंख मूंद मुङो पार्टी में शामिल कर लिया गया. चुनाव लड़ने का टिकट भी मिल गया. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बना दिया. अपने तरीके से पार्टी को चुनाव जिताने की जिम्मेवारी भी मुङो दे दी गयी. पार्टी के मुखिया बोले, ‘हमारी लाज तुम्हारी हाथों में है.’ मैं बोला, ‘लाज क्या चीज है, अब तो पूरा देश ही मेरे हाथों में है.

एक बार जीतने तो दो, फिर देखो मेरा कमाल.’ जीतने के लिए कुछ तो करना था. सोचा कि पहले गंठबंधन की रणनीति बना लूं. घोषणा कर दी कि हम व्यक्तिवाद के खिलाफ हैं. जो मिल-बांट कर खाने को तैयार हैं, गंठबंधन के लिए आगे आयें. दो-टूक कह दिया कि हमें भ्रष्टाचार पसंद नहीं. केवल वही लोग हमसे जुड़ें, जिन्होंने घोटाले के पैसे बांटने में पूरी ईमानदारी बरती हो. सांप्रदायिक ताकतों को भी मैंने चेता दिया. कह दिया कि ऐसी किसी सांप्रदायिक दल से रिश्ता नहीं जोड़ेंगे, जो कम-से-कम हमारी पार्टी को 100 सीटें देने को राजी न हो. मैंने कहा, वादा करनेवालों को हम वरीयता देंगे. जो वादे पूरा न करके भी चुनाव जीतने में सक्षम हैं, उन्हें हम हाथों-हाथ टिकट देने को तैयार हैं.

इसके लिए भी बड़ी काबिलीयत चाहिए. गंठबंधन को ले कर मैं ज्यादा परेशान नहीं हूं. बहुमत नहीं मिला, तो विरोधियों से भी हाथ मिलाने का ऑप्शन खुला रखा है. आखिर देशभक्त जो हूं. जब सरकार बनेगी, तभी तो प्रधानमंत्री बनूंगा. और प्रधानमंत्री नहीं बनूंगा, देश सेवा कैसे करूंगा? वैसे हमारे साथ जो जुड़े हैं, वे कभी भी साथ छोड़ने को स्वतंत्र हैं. बस एक ही शर्त है. या तो वे दो महीने पहले नोटिस दे कर साथ छोड़ें या फिर घोटाले के पैसों में अपने हिस्से का 20 प्रतिशत कटवा लें. सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की चिंता भी मुझ पर छोड़ दीजिए. हर मंत्रलय की बोली लगेगी. जो जितने में खरीद ले. इसलिए टिकट का आवेदन करने वालों से एक और अनुरोध है. आवेदन करने से पहले अपनी हैसियत देख लें. जेब में पैसे रहेंगे, तभी तो देश सेवा कर पायेंगे. एक और चीज. हवाई जहाज में बैठने में डर तो नहीं लगता न? जीतने के बाद पांच साल तक दुनिया की सैर करनी है. हां भाई, हमसे भी बड़े घोटालेबाज बैठे हैं दूसरे देशों में. टिप्स ले कर आयेंगे, तभी तो करेंगे देश सेवा.

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