World Day Against Child Labour: दुनिया भर के 1.5 अरब बच्चों को नहीं मिलता कोई नकद लाभ

World Day Against Child Labour: देश में बाल श्रमिकों की संख्या जानने के लिए 2021 की जनगणना और महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2011 की जनगणना के बाद 2016 में बाल श्रम अधिनियम में संशोधन किया गया. इसके अनुसार, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी तरह के काम में नियोजित करने की मनाही है.
World Day Against Child Labour: आज 12 जून को जब दुनिया बाल श्रम निषेध दिवस (World Anti Child Labor Day) के रूप में मना रही है, भारत में पिछले 10 साल में बाल-श्रमिकों की संख्या के बारे में हुए बदलावों की कोई ठोस जानकारी हमारे पास नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रत्येक 10 वर्ष में होने वाली वर्ष 2021 की जनगणना (Census) अभी तक शुरू भी नहीं हो पायी है. दूसरी बड़ी वजह यह है कि हम कोविड-19 महामारी के व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक दुष्प्रभावों से गुजर रहे हैं, जिसका बाल मजदूरों की संख्या में गिरावट के रुझान को उलट-पलट देने का अनुमान है.
ऐसे में सवाल यह है कि जैसा कि कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कयास लगाये जा रहे हैं कि बाल श्रमिकों के आंकड़ों में क्या वास्तव में बढ़ोतरी हुई है? उसी से जुड़ा दूसरा सवाल ये कि क्या ताजा आंकड़ों के अभाव में भारत बाल श्रम की रोकथाम के लिए कोई समुचित और योजनाबद्ध तरीके से प्रयास कर पायेगा?
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देश में बाल श्रमिकों की संख्या जानने के लिए 2021 की यह जनगणना और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि 2011 की जनगणना के बाद वर्ष 2016 में बाल श्रम अधिनियम में संशोधन किया गया. इसके अनुसार, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी तरह के काम (जोखिम वाला या गैर-जोखिम वाला) में नियोजित करने की मनाही है. साथ में किशोरों को भी बाल श्रमिकों के श्रेणी में रखा गया है, जो जोखिम वाले कामों में नियोजित हैं.
इसके मद्देनजर बाल श्रमिकों की संख्या और उसके रुझान का आकलन करना जरूरी होगा, अगर हमारे देश को इस समस्या से निजात पाना है. इस बात की भी पूरी संभावना है कि जिस तरह तकनीक के इस्तेमाल के फलस्वरूप जरूरतमंद लोगों तक सामजिक सुरक्षा योजनाओं और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की पहुंच बढ़ी है, उससे भी बाल श्रम की गतिविधियों में भी कमी आयी हो. जो भी हो, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए देश में बाल श्रमिकों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना होगा.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labor Organisation) और यूनिसेफ (UNICEF) की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 के बाद से किये गये कई अध्ययनों से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर यह कहा गया है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाएं परिवारों को आर्थिक झटके से निपटने में मदद करती हैं, बाल श्रम को कम करता है और स्कूली शिक्षा जारी रखने की सहूलियत देता है.
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इसी रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 14 वर्ष से कम आयु के 2 अरब बच्चों में से 73.6 प्रतिशत, लगभग 1.5 अरब बच्चों या उनके परिवारों को कोई नकद लाभ नहीं मिलता. यह रिपोर्ट बाल श्रम को समाप्त करने के लिए यूनिवर्सल सामाजिक सुरक्षा की वकालत करता है. इसलिए अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस वर्ष विश्व बाल श्रम निषेध दिवस का थीम ‘यूनिवर्सल सोशल प्रोटेक्शन टू एंड चाइल्ड लेबर’ (Universal Social Protection To End Child Labor) रखा है.
ऐसा भी नहीं है कि सामजिक सुरक्षा योजनाएं पूरी तरह से बाल श्रम को रोकने में समर्थ हैं. यह सही है कि अधिकांश बाल श्रम गतिविधियां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में होती हैं और उन परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान करने से विपत्ति की घड़ी में उनका आर्थिक संबल बना रहेगा. परंतु उसका कितना हिस्सा बच्चों के पास पहुंच पाता है, यह भी देखना जरूरी होगा.
सेव द चिल्ड्रन ने राजस्थान में अनाथ और कुछ अन्य श्रेणी के बच्चों के लिए चलायी जा रही पालनहार योजना तक योग्य लाभार्थियों की पहुंच और मिलने वाले लाभ को बच्चों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है, इस पर पिछले एक दशक में काफी काम किया है. संस्था ने पाया कि बच्चों के लिए चलायी जा रही योजना का लाभ भी बच्चों तक ठीक से पहुंचाने के लिए इन योजनाओं को बाल संवेदनशील बनाये जाने की बहुत जरूरत है.
यकीनन बच्चे हमेशा आने वाले समय में विकास की गति को निर्धारित करते हैं. आज के समय में उनको शिक्षा व विकास के लिए जितने ज्यादा अवसर प्राप्त होंगे, उनका जीवन जितना सुरक्षित और संरक्षित होगा, उतना ही यह देश मजबूत और समृद्ध होगा. यह जानते हुए भी हम बजट आवंटन के समय आज की प्राथमिकताओं में उलझ जाते हैं. यह उसी तरह की बात है, जैसे एक गरीब परिवार यह जानते हुए भी कि परिवार को गरीबी से उबारने के लिए उनके बच्चे की शिक्षा जरूरी है, आज की प्राथमिकताओं को देखते हुए वह बच्चे को आर्थिक गतिविधियों में लगा देता है.
यह भी अजीब है कि एक तरफ देश में भयावह स्तर पर बेरोजगारी है, तो दूसरी तरफ बच्चे श्रम में नियोजित हैं. इसका सीधा अर्थ यह है बाल श्रम को रोकने के लिए उपलब्ध तंत्र जरूरत के मुताबिक सशक्त नहीं है. अगर ऐसा है, तो ऐसा क्यों है कि देश में प्रतिवर्ष औसतन 50-60 हजार बाल श्रमिकों का ही बचाव हो पाता है, जबकि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश भर में एक करोड़ से ज्यादा बाल श्रमिक थे.
नये संशोधित बालक और कुमार श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम में रोकथाम, बचाव, पुनर्वास और कन्वर्जेंस के लिए कई प्रावधान किये गये हैं और जिलाधिकारी को नोडल बनाया गया है, ताकि प्रावधानों की पालना समुचित ढंग से हो सके. एक प्रावधान पुनर्वास निधि के गठन का भी है, जिसमें जिला स्तर पर बाल एवं किशोर श्रम पुनर्वास कोष स्थापित किये जाने की बात की गयी है, ताकि काम से छुड़ाये गये बच्चों के शिक्षा और कल्याण पर राशि को खर्च किया जा सके. पर इसके लिए क्या किया जा रहा है, उसका विवरण नहीं मिलता. हां, बाल मजदूरों को बचाने और पुनर्वास के लिए फंड आवंटन वर्ष 2018-19 में 90 करोड़ रुपये से घटाकर वर्ष 2020-21 में केवल 41 करोड़ रुपये कर दिया गया है.
श्रम एवं नियोजन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013-18 के दौरान इस कानून के तहत केवल 10,000 लोगों के खिलाफ ही मुकदमा किया जा सका और उसमें केवल 4,530 आरोपियों को ही दोषी साबित किया जा सका. कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन ने भारत में सतत विकास लक्ष्य 8.7 को प्राप्त करने के लिए सरकार के प्रयासों का आकलन करते हुए पाया कि देश भर में वर्ष 2016-18 के बीच बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम के तहत केवल 1,130 प्राथमिकी दर्ज किये गये.
इसलिए नये संसोधनों के परिप्रेक्ष्य में बाल श्रम की निगरानी, नियंत्रण और पुनर्वास के लिए उपस्थित तंत्र के सशक्तीकरण की महती आवश्यकता है. एक बार के लिए यह मान भी लें कि बाल श्रम की रोकथाम के लिए तंत्र उपलब्ध हैं, पर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनकी क्रियाशीलता और समन्वय के साथ काम करने के बारे में बहुत कुछ करने की जरूरत है और उसके लिए सरकार को अपनी इच्छाशक्ति दिखानी होगी.
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