जब ब्रिटिश विधवा ने 1868 में आर्थिक मदद के लिए भारतीय कार्यालय में दायर की थीं याचिका, जानें पूरी कहानी

Updated at : 08 Sep 2022 11:24 AM (IST)
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जब ब्रिटिश विधवा ने 1868 में आर्थिक मदद के लिए भारतीय कार्यालय में दायर की थीं याचिका, जानें पूरी कहानी

मार्गरेट मेकपीस ने अपने लेख में लिखा है कि सर्जन विलियम क्रिस्टी लैंग का नवंबर 1861 में निधन हो गया था. इसके बाद उनकी विधवा चार्लोट फ्रांसिस लैंग 10 से 19 साल के सात बच्चों को बंगाल मिलिट्री ऑर्फन की बुक शामिल करने की गुजारिश की, क्योंकि उनके पास गुजारा करने के लिए विधवा पेंशन ही एकमात्र सहारा था.

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नई दिल्ली : अप्रैल 1868 में बैंक ऑफ बॉम्बे फेल हो गया, तब ब्रिटेन की एक विधवा चार्लोट फ्रांसिस लैंग ने वित्तीय सहायता के लिए भारतीय कार्यालय में याचिका दायर की थीं. बैंक ऑफ बॉम्बे के विफल होने के बाद उनके 180 शेयरों पर होल्डिंग लगा देने से उनकी आमदनी खत्म हो गई थी और उनका परिवार गरीबी की मार झेल रहा था. उस समय चार्लोट फ्रांसिस लैंग ने कहा कहा था कि वह प्रशासनिक अधिकारी विलियम जेम्स टरक्वांड की बेटी और सर्जन विलियम क्रिस्टी लैंग की विधवा थीं. विलियम जेम्स टरक्वांड और सर्जन विलियम क्रिस्टी लैंग ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दी थीं. इस दौरान ही, उनके दिवंगत पति सर्जन विलियम क्रिस्टी लैंग ने 23 साल के लिए बंगाल मिलिट्री ऑर्फन सोसायटी की सदस्यता ली थी, लेकिन 1848 में रिटायरमेंट के बाद सोसायटी ने यह मानते हुए पैसा देना बंद कर दिया था कि उनके परिवार के पास भविष्य में जीवन-यापन करने के लिए निजी साधन पर्याप्त है.

मार्गरेट मेकपीस ने अपने एक लेख में लिखा है कि सर्जन विलियम क्रिस्टी लैंग का नवंबर 1861 में निधन हो गया था. इसके बाद उनकी विधवा चार्लोट फ्रांसिस लैंग 10 से 19 साल के सात बच्चों को बंगाल मिलिट्री ऑर्फन की बुक शामिल करने की गुजारिश की, क्योंकि उनके पास गुजारा करने के लिए विधवा पेंशन ही एकमात्र सहारा था. इस उम्मीद में उन्होंने अपने आलीशान घर को छोड़कर एक क्वार्टर में चली गईं, उनके लाभांश का भुगतान कुछ समय के लिए अस्थायी तौर पर निलंबित किया गया है. पति की मौत के बाद आमदनी कम होने के चलते वह आर्थिक तंगी की मार झेल रही थीं. पति के निधन के बाद वह क्रेडिटन के डेवोन में 17 पाउंड सालाना के किराए के मकान में चली गई थीं.

गरीबी में चार्लोट ने बेच दिए कपड़े

मार्गरेट मेकपीस ने आगे लिखा कि एक अंग्रेज संभ्रांत परिवार ऐशो-आराम की जिंदगी जीने का आदी होता है, लेकिन उनके पास एक छोटी बच्ची को छोड़कर अपने नौकर-चाकर समेत किसी का खर्च उठाने की क्षमता नहीं बची थी. इसीलिए उन्होंने अपने खुद के खर्च को भी करते हुए कहा था कि सरकारी नौकरी और कड़ी मेहनत ही मेरी मुख्य पूंजी है. बाद के उनकी आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई कि उनका परिवार दाने-दाने को भी तरसने लगा. पैसों की तंगी के कारण चार्लोट फ्रांसिस लैंग ने धीरे-धीरे अपना सबकुछ बेच दिया. यहां तक कि उन्होंने अपने महंगे कपड़ों को भी बेच दिया. बेटियों को स्कूल जाना बंद करवा दिया और उन्हें जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा से वंचित करना पड़ा.

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चार्लोट फ्रांसिस लैंग को मिली पेंशन

मार्गरेट मेकपीस ने कहा कि जब उनकी याचिका पर एक अधिकारी ने ध्यान दिया, तब चार्लोट फ्रांसिस लैंग को बंगाल मिलिट्री ऑर्फन सोसायटी से सालाना 225 पाउंट पेंशन मिली. लेकिन, याचिका के जवाब में उनके बच्चों को सोसायटी में शामिल करने से इनकार कर दिया गया. सरकार के सचिव ने खेद व्यक्त किया कि चार्लोट फ्रांसिस लैंग भारतीय राजस्व की ओर से किसी प्रकार की अनुदान स्वीकृत नहीं की जा सकती. हालांकि, 10 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों ने सद्भावना के रूप में दान देकर इस तरह की याचिका का जवाब दिया होगा, लेकिन 1868 में चार्लोट फ्रांसिस लैंग को शासन के सख्त नियमों के तहत संचालित सरकार के नए विभाग का सामना करना पड़ा.

1871 बच्चों को मिली नौकरी

मार्गरेट मेकपीस ने लिखा कि तीन साल बाद 1871 की जनगणना के समय चार्लोट फ्रांसिस लैंग अपने चार बच्चों के साथ डेवोन में काउक बार्टन में रह रही थीं. उनके चार बच्चों में विलियम अलेक्जेंडर गॉर्डन (21) एक सर्जन बन गए, 18 साल के गॉर्डन हैमिक, 16 साल की एलेन सिडनी और 12 साल की केट मैरी क्रिस्टी और 20 साल की चार्लोट मारिया कैम्बरवेल गवर्नेस के रूप में काम कर रहे थे. कॉर्डेलिया मार्गरेट फ्रांसेस पूर्वी लंदन के हैकनी में विल्टन हाउस में एक लेक्चरर थीं. वह और केट भी शिक्षक बन गए. 14 वर्षीय एडवर्ड टरक्वांड गॉर्डन मर्चेंट नेवी में एक प्रशिक्षु के रूप में कार्यरत थे. 1878 में वह रॉयल आर्टिलरी में एक गनर के रूप में भर्ती हुए और 10 वर्षों के लिए भारत में तैनात रहे.

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