‘...तो महिलाओं कोई नौकरी नहीं देगा’, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स लीव पर खारिज की याचिका 

Updated at : 14 Mar 2026 1:59 PM (IST)
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Supreme Court Rejcts Period leave Petition will end women's careers noone will employ.

सुप्रीम कोर्ट.

Women Periods Leave: सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए अनिवार्य ‘पीरियड लीव’ की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है. अदालत ने कहा कि अगर इस तरह का कानून बनाया जाता है, तो इससे महिलाओं की नौकरियों और उनके करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. इस याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने की.

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Women Periods Leave: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश भर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान अनिवार्य छुट्टी की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मुद्दे पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की छुट्टी महिलाओं के लिए ‘नुकसानदेह’ साबित हो सकती है.

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने चिंता जतायी कि यदि महिलाओं के लिए पीरियड्स लीव को अनिवार्य कर दिया गया, तो कंपनियां उन्हें नौकरी देने में हिचकिचा सकती हैं. उन्होंने कहा, ‘मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से महिलाओं का करियर प्रभावित हो सकता है. यदि ऐसी छुट्टी अनिवार्य कर दी गई, तो कंपनियां महिलाओं को काम पर रखने से बचने लगेंगे.’ इससे महिलाओं के प्रति जेंडर इनइक्वालिटी को और बढ़ावा मिलेगा. 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है और इसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप उचित नहीं है. पीठ ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इस मुद्दे को केंद्र सरकार और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष उठाएं.

अदालत ने कहा कि सरकार को ही यह तय करना चाहिए कि क्या इस संबंध में कोई राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता है या नहीं. साथ ही कोर्ट ने यह भी दोहराया कि ऐसे फैसलों के दूरगामी सामाजिक और आर्थिक प्रभाव होते हैं. यदि कानून के तहत पीरियड्स लीव अनिवार्य कर दी जाती है, तो इससे निजी क्षेत्र में महिलाओं के प्रति भेदभाव बढ़ सकता है, जो उनके पेशेवर विकास में बाधा बन सकता है.

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‘सोचिए जिसे पेड लीव देना होगा’

सुप्रीम कोर्ट में पीरियड्स लीव को लेकर यह याचिका, शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी. त्रिपाठी की ओर से वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में बहस की. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस दिशा में कुछ राज्यों और कंपनियों ने सकारात्मक कदम उठाए हैं. उन्होंने बताया कि केरल में छात्राओं को छूट दी गई है. इस पर सीजेआई ने कहा कि ऐसी नीतियां बनाना स्वागत योग्य है, लेकिन जैसे ही इसे कानून बनाया जाएगा, तो कोई उन्हें नौकरी नहीं देगा. उस नियोक्ता के बारे में भी सोचिए जिसे इसके लिए पेड लीव देना होगा.

अदालत ने कहा कि ऐसी नीति महिलाओं को समान अवसर देने और श्रम बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ाने के बजाय उल्टा असर डाल सकती है. इससे निजी क्षेत्र में महिलाओं के प्रति भेदभाव बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ में चीफ जस्टिस के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी थीं. पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं महिलाओं को कम आंकती हैं. इससे उन्हें यह जताया जाता है कि जैसे पीरियड्स उनके साथ होने वाली कोई बुरी घटना है. सीजेआई ने मासिक धर्म को अनिवार्य बनाने के पॉसिबल सोशल रिजल्ट के बारे में चिंता जाहिर करते हुए याचिका खारिज कर दी.

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नीति बनाने के लिए संबंधित हितधारकों से चर्चा कर सकते हैं

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित विभाग के अधिकारी इस आवेदन पर विचार कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि सभी पक्षों व हितधारकों से चर्चा करने के बाद मासिक धर्म अवकाश को लेकर किसी नीति बनाने की संभावनाओं का आकलन कर सकते हैं. अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि याचिकाकर्ता पहले ही इस विषय में संबंधित अधिकारियों को अपना प्रतिवेदन (ज्ञापन) सौंप चुके हैं. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बार-बार परमादेश (मैंडमस) की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता नहीं है.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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