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अमेरिका में शोषित और वंचितों की आवाज बनीं भारत की बेटी 'क्षमा सावंत', कभी काम वाली बाई के लिए दादा से भिड़ी थी

Updated at : 27 Feb 2023 2:17 PM (IST)
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अमेरिका में शोषित और वंचितों की आवाज बनीं भारत की बेटी 'क्षमा सावंत', कभी काम वाली बाई के लिए दादा से भिड़ी थी

पहली बार है कि जब अमेरिका के किसी शहर ने जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के खिलाफ कानून बनाया है. जिस क्षमा सावंत ने इस ऐतिहासिक कानून को पारित करवाने में अगुवाई की है, वे खुद एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती हैं.

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अपने ही घर में काम करने वाली एक महिला के साथ हो रहे भेदभाव और जातिसूचक संबोधन की घटना ने एक छह साल की बच्ची के मन पर ऐसा असर डाला कि वह इस अन्याय के खिलाफ अपने दादा तक से भिड़ गयी. हालांकि, उस वक्त घरवालों ने उसे चुप करा दिया. मगर, यह बात उसके जेहन में हमेशा के लिए जज्ब हो गयी और उसने वंचितों के हक की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया. यह कहानी है भारत की बेटी क्षमा सावंत की, जिनकी पहल से अमेरिका का सिएटल शहर जाति और नस्ल आधारित भेदभाव पर रोक लगाने वाला पहला शहर बन गया है.

यह पहली बार है कि जब अमेरिका के किसी शहर ने जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के खिलाफ कानून बनाया है. विगत माह सिएटल सिटी काउंसिल की सदस्य और समाजवादी विचारधारा की नेता व अर्थशास्त्री क्षमा सावंत ने इसको लेकर सदन के समक्ष एक प्रस्ताव रखा, जो बीते दिनों एक के मुकाबले छह वोटों से पारित हो गया. आश्चर्य की बात यह है कि जिस क्षमा सावंत ने इस ऐतिहासिक कानून को पारित करवाने में अगुवाई की है, वे खुद एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. जातिगत भेदभाव को रोकने की दिशा में यह ऐतिहासिक कदम है. क्षमा ने इस जीत को पूरे अमेरिका में फैलाने के लिए एक मुहिम चलाने का भी आह्वान किया है. उनकी मानें, तो जातिगत भेदभाव अभी भी भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका सहित सभी दक्षिण एशियाई समाज झेल रहा है. भले ही अमेरिका में वंिचतों के खिलाफ भेदभाव उस तरह नहीं दिखता है, जैसा कि दक्षिण एशिया में हर जगह दिखता है, लेकिन यहां भी भेदभाव एक सच्चाई है.

छह वर्ष की उम्र में अन्याय के खिलाफ लड़ी पहली लड़ाई

अमेरिका के सिएटल में रहने वाली भारतीय मूल की क्षमा सावंत का जन्म 17 अक्तूबर 1973 को पुणे शहर में एक मध्यवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था. हालांकि, उनका पूरा बचपन मुंंबई में बीता. उनकी माता वसुंधरा रामानुजम इतिहास व भूगोल की शिक्षिका थीं, जबकि उनके पिता एचटी पेशे से एक सिविल इंजीनियर थे. लिहाजा घर में पढ़ाई-लिखाई का पूरा माहौल था. परिवार के दूसरे लोग भी डॉक्टर, इंजीनियर और गणितज्ञ जैसे पेशे से जुड़े हुए थे. इसलिए परिवार में किसी विशेष विचारधारा का प्रभाव नहीं था. बावजूद इसके सामाजिक भेदभाव को उन्हें बेहद करीब से महसूस किया और उसके खिलाफ लड़ाई भी लड़ी.

क्षमा की बचपन की यादों में से एक बात आज भी उनकी जहन में रची-बसी हुई है. दरअसल, ब्राह्मण परिवार में जन्मीं और पली-बढ़ीं सावंत के दादा घर में काम करने वाली महिला को अक्सर एक शब्द से बुलाते थे, जो जातिसूचक और काफी अपमानजनक था. सावंत कहती हैं कि वैसे तो उस महिला का काफी ख्याल रखा जाता था, लेकिन बुलाने में जातिसूचक शब्द का प्रयोग आम था. जब वह छह साल की थीं, तो वह अपने दादा के साथ उस जातिसूचक संबोधन पर भिड़ गयीं. अब 50 साल की हो चुकीं क्षमा भारत से हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका में उसी जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं, जो उन्होंने बचपन से देखा था.

अमेरिका में कई आंदोलनों का हिस्सा रहीं क्षमा सांवत

क्षमा सावंत ने मंुबई से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1994 में मुंबई विश्वविद्यालय से कंप्यूटर सांइस में स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद मुंबई में ही उन्होंने करीब डेढ़ साल तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया. इसी बीच घरवालों ने उनकी शादी करा दी. शादी के बाद क्षमा अपने पति विवेक सावंत, जो माइक्रोसॉफ्ट में इंजीनियर थे, के साथ अमेरिका चली गयीं. कंप्यूटर सांइस में ग्रेजुएट होने के बावजूद गरीबी और सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया और साल 2003 में नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी से पीएचडी प्राप्त की. पीएचडी की पढ़ाई के बाद साल 2006 में वह सिएटल शिफ्ट हो गयीं और उसी साल सोशलिस्ट अल्टरनेटिव पार्टी से जुड़ गयीं.

इस दौरान उन्होंने सिएटल सेंट्रल कम्युनिटी कॉलेज, सिएटल यूनिवर्सिटी और वाशिंगटन टैकोमा विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया. सोशलिस्ट अल्टरनेटिव पार्टी से जुड़कर उन्होंने अमेरिका में कई आंदोलनों का हिस्सा रहीं. उन्होंने महिला समानता, मजदूरों, इराक और अफगानिस्तान में युद्धों को खत्म करने के लिए कई आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. वह अमेरिकन फेडरेशन ऑफ टीचर्स लोकल 1789 में एक कार्यकर्ता भी रही हैं, जो कि बजट में कटौती और ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी के खिलाफ लड़ रहा है. 

2012 में 16 साल से काबिज डेमोक्रेट को हराकर पहुंचीं विधानमंडल 

साल 2012 में क्षमा ने राज्य विधानमंडल के लिए सोशलिस्ट वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, जिसमें 29 फीसदी वोट लाकर सभी को चौंका दिया. वह 16 साल से डेमोक्रेट को हराकर किसी प्रमुख शहर में निर्वाचित होने वाली पहली सोशलिस्ट बनीं. अभी वह 20,000 से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं.

ऑक्युपाइ मूवमेंट में भी दिखा चुकी हैं सक्रियता

साल 2011 में सितंबर-नवंबर महीने में ‘ ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट’ आंदोलन न्यूयॉर्क शहर के जुकोटी पार्क से शुरू हुआ. बाद में यह आंदोलन अमेरिका के दूसरे शहरों में भी फैल गया. सिएटल सिटी में क्षमा सावंत ने इस आंदोलन की अगुवाई की. उन्होंने वेस्टलेक पार्क में सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ डेरा जमाए रखा. वहीं, साल 2020 में अमेरिका में जॉर्ज फ्लायड की हिरासत में मौत के बाद पूरे देश में नस्लभेद के खिलाफ आंदोलन हुए. ब्लैक लाइव्स मैटर नाम से शुरू हुए इस आंदोलन में भारत की बेटी क्षमा सावंत ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. वह आंदोलन के मुख्य चेहरों में से शुमार थीं. इसके अलावा वह एलजीबीटी कम्युनिटी, महिलाओं की समस्याओं और रंगभेद के मुद्दों की भी वकालत कर चुकी हैं. साथ ही शिक्षा और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में कटौती को लेकर भी आंदोलन चला चुकी हैं.

अमेरिका में सामाजिक न्याय आंदोलन के लिए दान कर देती हैं अपना वेतन

मुंबई में बचपन बिताने के दौरान क्षमा सावंत ने अपने आसपास हमेशा गरीबी और असमानता को करीब से देखा और महसूस किया. कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में काम करने के बाद वह उत्पीड़न और गरीबी के मूल कारणों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के लिए अमेरिका पहुंच गयीं. मगर, दुनिया के सबसे अमीर देश में मौजूद असमानता और गरीबी को देखकर वह हैरान रह गयीं. लिहाजा, क्षमा सावंत एक शिक्षक और अर्थशास्त्री के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम करने लगीं. सिएटल नगर परिषद की सदस्य के रूप में उन्होंने श्रमिकों, युवाओं, दबे-कुचले और बेजुबानों की आवाज बनने का संकल्प लिया. हैरानी की बात है कि सिएटल काउंसिल से वह सिर्फ औसत वेतन ही लेती हैं. बाकी का वेतन वह सामाजिक न्याय आंदोलन के लिए दान कर देती हैं.

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