Haryana Violence: नूंह छोड़कर भाग रहे प्रवासी मजदूर, हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में खौफ का माहौल

Published by : ArbindKumar Mishra Updated At : 04 Aug 2023 6:44 AM

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Imphal: Locals gather near Kuki-Zo community's houses which were burnt down by miscreants in the violence-hit Manipur, in imphal, Tuesday, Aug 1, 2023. The fire also engulfed more than a dozen houses of migrants from Bihar, Haryana, and Naga people. (PTI Photo/Rishikesh Kumar) (PTI08_01_2023_000097B)

सरताज ने कहा, मेरे पास एक ठेला था जिस पर मैं खाने-पीने की चीजें बेचता था. यह गाड़ी औरैया में आई बाढ़ में बह गई थी. मैं नूंह चला आया और यहां एक गाड़ी लगाई और जब चीजें पटरी पर लौट रही थीं तभी हिंसा हो गई. अब मैं फिर से उसी हालत में पहुंच गया हूं. उन्होंने नम आंखों के साथ कहा, मैं घर जाना चाहता हूं.

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हरियाणा के नूंह में सांप्रदायिक हिंसा के मद्देनजर बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार या तो डर से अपने गृहनगर जा रहे हैं या काम की तलाश में पड़ोसी राज्य राजस्थान और उत्तर प्रदेश की ओर पलायन कर रहे हैं. इस सांप्रदायिक हिंसा में अब तक छह लोगों की जान चली गई है.

हिंसा की वजह से खाने के मोहताज हो रहे लोग

मौजूदा स्थिति और कर्फ्यू के कारण पिछले कुछ दिनों से घर के अंदर रहने को मजबूर श्रमिकों और बच्चों सहित उनके परिवारों ने कहा कि वे खाने को मोहताज हैं. उत्तर प्रदेश के औरैया में अपने गृह नगर में बाढ़ के कारण लगभग एक महीने पहले नूंह आए प्रवासी श्रमिक सरताज ने कहा कि वह भी घर वापस जाना चाहते हैं, लेकिन उनके पास वापस जाने या अपने परिवार के लिए भोजन उपलब्ध कराने के पैसे नहीं हैं.

ठेला चलाने वाले सरताज का छलका दर्द

सरताज ने कहा, मेरे पास एक ठेला था जिस पर मैं खाने-पीने की चीजें बेचता था. यह गाड़ी औरैया में आई बाढ़ में बह गई थी. मैं नूंह चला आया और यहां एक गाड़ी लगाई और जब चीजें पटरी पर लौट रही थीं तभी हिंसा हो गई. अब मैं फिर से उसी हालत में पहुंच गया हूं. उन्होंने नम आंखों के साथ कहा, मैं घर वापस जाना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास यात्रा करने के लिए पैसे नहीं हैं. चार बच्चों के पिता सरताज ने कहा कि उनका परिवार मंगलवार से भूखा है क्योंकि झड़प के बाद पूरा शहर बंद है. सरताज ने कहा, मैं और मेरी पत्नी अब भी गुजारा कर सकते हैं लेकिन अपने बच्चों को भूख से मरते हुए देखकर मुझे दुख होता है. अमीर और मध्यम वर्ग कहीं और चला जाएगा और अपना जीवन फिर से शुरू कर लेगा लेकिन हमारे जैसे गरीब मजदूरों का क्या होगा? हमें कहां जाएं?

सड़कों पर पसरा सन्नाटा

भले ही गुरुवार को कर्फ्यू में ढील दी गई और लोगों को सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक आवश्यक सामान खरीदने की अनुमति दी गई हो लेकिन नूंह में कई घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के गेटों पर ताले लगे होने के कारण सन्नाटा पसरा रहा.

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1992 के बाद से ऐसी हिंसा कभी नहीं देखी : साइमा

पिछले 30 वर्षों से नूंह में रहने वाली एक मजदूर साइमा के पति बच्चों के साथ मंगलवार को राजस्थान चले गए और उसके बाद से साइमा घर में अकेली रह रही हैं. साइमा ने कहा, इस पूरी घटना ने हमारे बीच डर की भावना पैदा कर दी है. हमने इस शहर में झड़पें देखी हैं लेकिन 1992 (बाबरी मस्जिद विध्वंस) के बाद से इस तरह की हिंसा कभी नहीं देखी. उन्होंने कहा, मेरे पति दो दिन पहले पांच बच्चों के साथ चले गए. मेरा गृहनगर पलवल में है जो नूंह के पास ही है लेकिन मेरे पास वहां जाने के लिए एक पैसा भी नहीं है.

भगवान का आभारी हूं कि जीवित बच गया : श्रीकिशन

विहिप का जलाभिषेक यात्रा शुरू होने वाली जगह से 200 मीटर दूर फर्नीचर की दुकान चलाने वाले नूंह के एक अन्य निवासी श्रीकिशन (65) ने कहा कि वह हिंसा से हिल गए हैं और भाग्यशाली हैं कि वे जीवित हैं. उन्होंने कहा, मैं भगवान का आभारी हूं कि जीवित बच गया. वित्तीय नुकसान से निपटा जा सकता है और शायद हमें कुछ महीनों के लिए अपनी खाने पीने की आदतों से समझौता करना पड़े. मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मेरे परिवार के सदस्य सुरक्षित हैं. झड़प वाले दिन को याद करते हुए श्रीकिशन ने कहा कि उन्होंने लगभग 20 लोगों को आश्रय दिया था जिन पर भीड़ द्वारा पथराव किया जा रहा था. श्रीकिशन ने कहा, जब झड़पें शुरू हुईं तो मैं केवल धुएं की मोटी चादर और अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे लोगों को देख सका. मैंने कम से कम 20 लोगों को अपनी दुकान के अंदर आने दिया ताकि वे अपनी जान बचा सकें और मुझे इसकी परवाह नहीं थी कि वे हिंदू थे या मुस्लिम. हमने यहां झड़पें देखी हैं लेकिन 1992 के बाद इस पैमाने पर हिंसा कभी नहीं हुई. नूंह में रहने वाले अधिकांश लोगों ने अधिकारियों से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्र में स्थायी रूप से सुरक्षा बढ़ाने का आग्रह किया है.

कोविड-19 लॉकडाउन की याद ताजा

किराना दुकान चलाने वाले राम सिंह ने कहा, कर्फ्यू है, हर जगह पुलिसकर्मी हैं, हमें दुकानें खोलने के लिए दो घंटे का समय दिया गया है, प्रवासी श्रमिक अपने गृह नगरों में वापस जा रहे हैं – स्थिति मुझे 2020 के कोविड-19 लॉकडाउन की याद दिलाती है. इससे उबरने में निश्चित रूप से एक या दो महीने लगेंगे.

क्या है मामला

गौरतबल है कि विश्व हिंदू परिषद जलाभिषेक यात्रा को रोकने की कोशिश को लेकर नूंह में हिंसा भड़की थी. नूंह में भड़की हिंसा पिछले कुछ दिनों में गुरुग्राम तक फैल गई. इस हिंसा में दो होम गार्ड और एक मौलवी समेत छह लोगों की मौत हो गई है.

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लेखक के बारे में

By ArbindKumar Mishra

अरबिंद कुमार मिश्रा वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में एक अनुभवी पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. अप्रैल 2011 से संस्थान का हिस्सा रहे अरबिंद के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर और डेस्क एडिटर 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह नेशनल और इंटरनेशनल डेस्क की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ एक पूरी शिफ्ट का नेतृत्व (Shift Lead) भी कर रहे हैं. विशेषज्ञता और अनुभव अरबिंद की लेखनी में खबरों की गहराई और स्पष्टता है. उनकी मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामले: वैश्विक राजनीति और देश की बड़ी घटनाओं पर पैनी नजर. खेल पत्रकारिता: झारखंड में आयोजित 34वें नेशनल गेम्स से लेकर JSCA स्टेडियम में हुए कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव. झारखंड की संस्कृति: राज्य की कला, संस्कृति और जनजातीय समुदायों की समस्याओं और उनकी जीवनशैली पर विशेष स्टोरीज. पंचायतनामा: ग्रामीण विकास और जमीनी मुद्दों पर 'पंचायतनामा' के लिए विशेष ग्राउंड रिपोर्टिंग. करियर का सफर प्रभात खबर डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अरबिंद ने पत्रकारिता के हर आयाम को बखूबी जिया है. डिजिटल मीडिया की बारीकियों को समझने से पहले उन्होंने आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एंकरिंग के जरिए अपनी आवाज और व्यक्तित्व की छाप छोड़ी है. शिक्षा और योग्यता UGC NET: अरबिंद मिश्रा ने यूजीसी नेट (UGC NET) उत्तीर्ण की है. मास्टर्स (MA): रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से एमए की डिग्री. ग्रेजुएशन: रांची यूनिवर्सिटी से ही मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में स्नातक.

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