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सॉर्क व क्षेत्रीय शांति की मजबूरी भारत पाक को ले आयी वार्ता के मंच तक

Updated at : 14 Dec 2015 6:06 PM (IST)
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सॉर्क व क्षेत्रीय शांति की मजबूरी भारत पाक को ले आयी वार्ता के मंच तक

नयीदिल्ली : भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों की नयी शुरुआत पर आज विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया. विदेश मंत्री ने एक अहम बात कही कि दोनों देशों में बीच बेहतर रिश्ते क्षेत्रीय शांति के लिए जरूरी है. विदेश मंत्री ने अफसोस जताया कि दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय […]

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नयीदिल्ली : भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों की नयी शुरुआत पर आज विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया. विदेश मंत्री ने एक अहम बात कही कि दोनों देशों में बीच बेहतर रिश्ते क्षेत्रीय शांति के लिए जरूरी है. विदेश मंत्री ने अफसोस जताया कि दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय सहयाेग संगठन दक्षेस उस तरह से आगे नहीं बढ़ पा रहा है, जैसे विश्व के दूसरे क्षेत्रीय सहयोग संगठन आगे बढ़ रहे हैं.यहसर्वज्ञात है कि इस पर हमेशा भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की कड़वाहट की छाया रही है. यानी बदलते हालात में शांति और क्षेत्रीय सहयोग संगठन के लाभ को जमी पर उतारने की मजबूरी में दोनों देश एक दूसरे से वार्ता को राजी हुए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वप्न

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सार्क देशों के बीच आपसी सहयोग को अधिक से अधिक बढ़ाना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि सार्क देश निर्बाध रोड मार्ग से जुड़ें और उनके बीच वाणिज्य व्यापार में काफी अधिक वृद्धि हो. उन्होंने पिछले साल काठमांडो के सार्क संबोधन में कहा था कि पूरी दुनिया के व्यापार में सॉर्क देश का योगदान पांच प्रतिशत है और उसमें भी मात्र दस प्रतिशत सॉर्क देशों के बीच वाणिज्य व्यापार होता है. वे सार्क देशों के बीच शिक्षा, टेलीमेडिसिन, आपदा प्रबंधन, संसाधन प्रबंधन, मौसम और संचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना चाहते हैं.

नवाज शरीफ का रुख

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का कूटनीतिक रुख हमेशा भारत से अच्छे संबंध रखने का रहा है. पर, पाकिस्तान की जटिल राजनीति व सत्ता के एक सेअधिक केंद्र वहां की लोकतांत्रिक सरकार की राह में हमेशा रोड़े अटकाते रही है. समझा जाता है कि सरताज अजीज से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेवारीलेकरजनरलनसीर खान जंजुआ को इस साल के अक्तूबार माह में सौंपने के पीछे पाक सेना कीहीभूमिका है. जनरल जंजुआ फौजी हैं और वे एक तरहसेकूटनीतिक वार्ता में सेना के प्रतिनिधि हैं. जाहिरहै,वहांकी लोकतांत्रिक सरकार शरीफ अकेले कोई फैसला लेने कीस्थिति में नहीं हैं. पर, बदलते हालात में दुनिया के दूसरे क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य एक दूसरे का हाथ पकड़ कर आगे बढ़ रहे हैं, यह बात पाकिस्तानी सेना व वहां के अतिवादी धड़े को समझ में आये बिना हालात कितना बदलेगा, यह सवाल भविष्य के गर्भ में है.

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