सियासत में बढ़ी साधु संन्यासियों की दखल
Updated at : 21 Apr 2019 6:15 AM (IST)
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पिछले कुछ सालों से सियासत में साधु-संन्यासियों का दखल काफी बढ़ा है. अध्यात्म से जुड़े तमाम संतों ने या तो सीधे राजनीति में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की है या फिर परोक्ष रूप से चुनावी राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं. आइए जानते हैं ऐसे कुछ साधु संन्यासियों के बारे में कांग्रेस ने की शुरुआत साधु-संतों […]
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पिछले कुछ सालों से सियासत में साधु-संन्यासियों का दखल काफी बढ़ा है. अध्यात्म से जुड़े तमाम संतों ने या तो सीधे राजनीति में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की है या फिर परोक्ष रूप से चुनावी राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं. आइए जानते हैं ऐसे कुछ साधु संन्यासियों के बारे में कांग्रेस ने की शुरुआत साधु-संतों को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारने की शुरुआत कांग्रेस ने 1971 में की. उसने उस चुनाव में महाराष्ट्र में पैदा हुए स्वामी रामानन्द शास्त्री को बिजनौर और स्वामी ब्रह्मानंद को हमीरपुर से मैदान में उतारा. दोनों स्वामी चुनाव जीत गये.
स्वामी चिन्मयानंद : स्वामी जी 1991 में राजनीति में आये. पहले ही लोकसभा चुनाव में स्वामी चिन्मयानंद ने शरद यादव को 15 हजार वोट से हराया. अटल सरकार में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भी रहे. फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर हैं.
स्वामी अग्निवेश : 1970 में आर्यसभा नाम से राजनीतिक दल बनाया. स्वामी अग्निवेश आर्य समाज से ताल्लुक रखते हैं. 1979 में हरियाणा की विधानसभा में चुन कर पहुंचे. वे सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे.
सतपाल महाराज : सतपाल महाराज का वास्तविक नाम सतपाल सिंह रावत है. वह भाजपा से जुड़े हैं और वह राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं. मौजूदा समय में वह उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री हैं.
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