पारदर्शिता से डर रहीं राजनीतिक पार्टियां

Updated at : 19 Mar 2019 6:40 AM (IST)
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पारदर्शिता से डर रहीं राजनीतिक पार्टियां

राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर छह राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने को कोर्ट का नोटिस राजनीतिक पार्टियां पारदर्शिता से डर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एशोसिएशन फॉर डेमोक्रेटीक रिफॉर्म्स की याचिका पर छह राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाये जाने की नोटिस जारी की […]

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राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर
छह राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने को कोर्ट का नोटिस
राजनीतिक पार्टियां पारदर्शिता से डर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एशोसिएशन फॉर डेमोक्रेटीक रिफॉर्म्स की याचिका पर छह राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाये जाने की नोटिस जारी की है.
03 जून, 2013 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू, जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा व जस्टिस अमिताभ राय की पीठ ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को नोटिस जारी किया था. फिलहाल यह मामला सुनवाई के लिए कोर्ट में लंबित है. अगली सुनवाई 26 मार्च को है, जिसमें उम्मीद है अधिकतम चर्चा इलेक्टोरल बांड पर ही होगी.
इस दिशा में केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने ऐतिहासिक फैसले में राजनीति में पारदर्शिता की नयी परिभाषा गढ़ने का प्रयास किया था.
इस फैसले ने व्यापक राजनीतिक सुधार के संकेत दिये थे. आयोग ने छह राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के तहत लोक संस्थाएं घोषित किया था. आयोग ने छह सप्ताह के भीतर केंद्रीय सूचना अधिकारी नियुक्त करने साथ ही पार्टी के चंदे के बारे में मांगी गयी सूचना भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था. फैसलों में चार सप्ताह के भीतर आवेदनों को निबटाने को भी कहा था.
मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा था कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 2 (एच) के तहत आते हैं. राजनीतिक दलों को सरकार की ओर से कई प्रकार की रियायतें मिलती हैं. इसमें जनता का भी धन लगा होता है.
बीते दिनों में देश में खर्चीले चुनाव और राजनीतिक पार्टियों के चंदों के घालमेल ने चुनावों पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिये हैं. राजनीतिक दलों के अंदर वित्तीय पारदर्शिता, जबावदेही एवं आंतरिक लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं. सीआइसी के फैसले के खिलाफ भारत की राजनीतिक पार्टियों में गजब की एकजुटता देखने को मिली. संसद द्वारा गठित समिति ने कोई तर्कसंगत विचार प्रस्तुत नहीं किया.
सरकार ने तर्क दिया था कि दल न तो संविधान द्वारा स्थापित होते हैं और न ही संसद द्वारा बनाये जाते हैं. सरकार ने यह भी कहा कि लोक प्रतिनिधित्व की धारा 1951 के साथ आयकर की धारा 1961 में पहले से ही ऐसे प्रावधान हैं जो दलों और प्रत्याशियों की वित्तीय पारदर्शिता निर्धारित करते हैं.
जबकि, सच्चाई यह है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने बाले चंदे में मात्र 20 प्रतिशत राशि का ही लेखा–जोखा होता है. बाकी 80 प्रतिशत राशि अज्ञात श्रोत से होते हैं.
दलों के अंदर आंतरिक कार्यप्रणाली भी लोकतांत्रिक नहीं होती है. एेसे में यह जरूरी है कि दलों के अंदर वित्तीय पादर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस निर्णय लिये जाएं. सीआइसी ने राजनीतिक पार्टियों को कई नोटिस दिये. बावजूद राजनीतिक पार्टियों ने कोई भी सूचना मुहैया नहीं करायी और आवेदन लेने से भी इन्कार कर दिया. इस संबंध में कई लोगों ने अपनी ओर से शिकायतें दर्ज की हैं.
हद तो तब हो गया जब केंद्रीय सूचना आयोग ने 16 मार्च, 2015 को यह कह दिया कि आयोग राजनीतिक पार्टियों के मामले में कार्रवाई के लिए सक्षम नहीं है. 16 मार्च का फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकार को खत्म करने वाला था. नाउम्मीदी में एडीआर एवं सहयोगी संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. वर्तमान में यह सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है.
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