क्या, सचमुच बीजेपी को हराना मुश्किल हो गया है ?

Updated at : 15 May 2018 6:18 PM (IST)
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क्या, सचमुच बीजेपी को हराना मुश्किल हो गया है ?

नयी दिल्ली : कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने पार्टियों को फिलहाल बीच चौराहे में लाकर छोड़ दिया है. सत्ता की गणित अब जोड़ – तोड़ पर टिकी हुई है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस पार्टी के लिए जो उम्मीद जगी थी, अब कर्नाटक विधानसभा के नतीजों ने धाराशायी कर दिया. कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी की अच्छी […]

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नयी दिल्ली : कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने पार्टियों को फिलहाल बीच चौराहे में लाकर छोड़ दिया है. सत्ता की गणित अब जोड़ – तोड़ पर टिकी हुई है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस पार्टी के लिए जो उम्मीद जगी थी, अब कर्नाटक विधानसभा के नतीजों ने धाराशायी कर दिया. कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी की अच्छी जीत की उम्मीद इसलिए भी की जा रही थी, क्योंकि सिद्धारमैया मजबूत और लोकप्रिय नेता माने जाते थे. उन्होंने चुनाव से पहले लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देना का नया दावं भी चला. तमाम कोशिशों के बाद भी कर्नाटक की हार क्या कहती है.

मध्यम वर्ग का उदय

लंबे समय तक चुनावों में जातीय समीकरणों का बोलबाला रहा है. बिहार और यूपी में इस तरह के राजनीतिक समीकरण अभी भी मजबूत है, लेकिन धीरे – धीरे मध्यम वर्ग के उदय ने इस समीकरण को खारिज करना शुरू कर दिया है. खासतौर से पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए महानगरों में पहुंचे लोगों में जातीय चेतना वैसी नहीं रही, जो किसी जमाने में हुआ करती थी. हालांकि वोटिंग के दौरान कई तरह के फैक्टर काम करते हैं. बीजेपी हर जगह जीत रही है, ऐसे हालत में जो नयी पीढ़ी राजनीति में करियर बनना चाहती है. वह बीजेपी को उम्मीद भरी नजरों से देख रही है.

बीजेपी की मजबूती, नरेंद्र मोदी की मेहनत

बीजेपी मजबूत पार्टी बनकर उभरी है. एक ऐसी पार्टी जो कभी नहीं थकती है . इसके कार्यकर्ता 24X7 मैदान में होते हैं. इसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह हैं. दोनों की सक्रियता बीजेपी को सक्रिय रख रही है. आमतौर पर एक राज्य में चुनाव के बाद कोई भी पार्टी थक जाती है लेकिन फिलहाल बीजेपी एक ऐसी पार्टी दिख रही है, जहां सभी को पता है, किसकी क्या भूमिका है. विपक्षी पार्टियों के पास संस्थागत ढंग से काम करने वाली मशीनरी का आभाव दिखता है.

कांग्रेस के पास क्या विकल्प बचता है

कांग्रेस के कार्यकर्ता हताश और निराश है. इस माहौल में अगर वह 2019 का चुनाव लड़ती हैं तो क्या जीत हासिल कर पायेगी. अगर नहीं जीतती है तो क्या पार्टी के कार्यकर्ता का मनोबल टक्कर देने लायक है. संभव है पार्टी की मौजूदा स्थिति से कुछ नेता नाराज होकर अलग हो जाये और नयी पार्टी का निर्माण करे. अमूमन ऐसी स्थिति तब बनती है जब युवा नेताओं को अपना भविष्य के प्रति निराशा हो. अनुभवी नेताओं ने तो अपना राजनीतिक जीवन जी लिया लेकिन उनका क्या, जिनके राजनीतिक करियर की शुरुआत अभी हुई है.

विपक्ष में क्षत्रपों की क्या होगी भूमिका

भाजपा से राज्यों में क्षत्रपों की क्या भूमिका होगी. बीजेपी को बिहार में राजद ने कड़ी टक्कर दी थी. लालू यादव तो फिलहाल चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं लेकिन तेजस्वी यादव में कई लोगों को भविष्य नजर आ रहा है. राहुल के उलट तेजस्वी यादव में एक स्पार्क है. वह अपने समर्थकों को लामबंद कर सकते हैं लेकिन कभी – कभी उनपर लालू यादव की छवि हावी हो जाती है.
बीजेपी पार्टी के रूप में ज्यादा मजबूत हुई
भारतीय समाज बदलाव के दौर से गुजर रही है. सिनेमा से लेकर बिजनेस तक हर जगह इस परिवर्तन को महसूस किया गया है. परिवारिक करिश्मा वह जादू दिखा नहीं पा रही है, जो कभी पहले हुआ करती थी. कारोबार की बात करें तो भारत की सबसे बड़ी समूह का कमान एक ऐसे शख्स को दिया गया, जिनका उस व्यापारिक घराने से कोई संबंध नहीं था. फिल्मों में नये सितारे आ रहे हैं, जिनकी परिवारिक पृष्ठभूमि सिनेमा की नहीं रही है. नवाजुद्दीन सिद्दकी और पंकज त्रिपाठी जैसे एक्टरों का उभरना बड़ा संकेत है. भले ही राजनीति, फिल्म और कारोबार में कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन सामाजिक परिवर्तन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
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