अवैध संबंधों का दोषी केवल पुरुष ही क्यों ? सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Dec 2017 8:46 AM
नयी दिल्ली : शादी के बाद अवैध संबंध से जुड़े कानूनी प्रावधान को गैर संवैधानिक करार दिये जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है. याचिका में कहा गया है कि आईपीसी […]
नयी दिल्ली : शादी के बाद अवैध संबंध से जुड़े कानूनी प्रावधान को गैर संवैधानिक करार दिये जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है. याचिका में कहा गया है कि आईपीसी की धारा-497 के तहत जो कानूनी प्रावधान है वह पुरुषों के साथ भेदभाव करने वाला प्रतीत होता है. यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाता है तो ऐसे संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ उस महिला का पति व्यभिचार का केस दर्ज करने में सक्षम है लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं है जो भेदभाव दर्शाता है. अत: इस प्रावधान को गैर संवैधानिक घोषित किया जाए.
याचिकाकर्ता के वकील की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के गृह मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया गया है. याचिकाकर्ता ने कहा है कि पहली नजर में धारा-497 संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता प्रतीत होता है. यदि दोनों आपसी रजामंदी से संबंध बनाते हैं तो ऐसे में महिला को उस दायित्व से कैसे छूट प्रदान की जा सकती है.
याचिका में कहा गया है कि ये धारा पुरुष के खिलाफ भेदभाव वाला है. यह संविधान की धारा-14 (समानता), 15 और 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन है. याचिकाकर्ता ने कहा कि एक तरह से देखा जाए तो यह महिला के खिलाफ भी कानून है, क्योंकि महिला को इस मामले में पति की संपत्ति समझता है. यदि पति भी सहमत हो तो फिर मामला नहीं बनता है. याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान भेदभाव दर्शाता है और जेंडर जस्टिस के खिलाफ है. इससे समानता के अधिकार पर उल्टा प्रभाव पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि इस आईपीसी के प्रावधान को अवैध, मनमाना और गैर संवैधानिक घोषित कर दिया जाना चाहिए.
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