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‘आधार’ की वैधता पर बार-बार उठे हैं सवाल, निजता के अधिकार पर संविधान पीठ का फैसला आना अभी बाकी

Updated at : 10 Jun 2017 10:06 AM (IST)
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‘आधार’ की वैधता पर बार-बार उठे हैं सवाल, निजता के अधिकार पर संविधान पीठ का फैसला आना अभी बाकी

नयी दिल्ली : संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन (यूपीए) सरकार की महत्वाकांक्षी ‘आधार’ योजना पर अब तक कई बार सवाल उठे हैं. सरकार इसे समाज कल्याण योजनाअों से जोड़ने की कोशिश करती है और हर बार कोई न कोई कानूनी अड़चन आ जाती है. ताजा मामला सरकार द्वारा पैन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य किया […]

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नयी दिल्ली : संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन (यूपीए) सरकार की महत्वाकांक्षी ‘आधार’ योजना पर अब तक कई बार सवाल उठे हैं. सरकार इसे समाज कल्याण योजनाअों से जोड़ने की कोशिश करती है और हर बार कोई न कोई कानूनी अड़चन आ जाती है.

ताजा मामला सरकार द्वारा पैन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य किया जाना है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस फैसले पर आंशिक रोक लगा दी है. ‘आधार’ योजना पर वर्ष 2012 में पहली बार ग्रहण लगा. इसके बाद भी ‘आधार’ पर सवाल उठते रहे. आइए, देखते हैं कि ‘आधार’ को अब तक किस-किस आधार पर चुनौती दी गयी और उस पर क्या-क्या सवाल उठाये गये. कब-कब किस-किस कोर्ट ने क्या फैसले दिये.

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वर्ष 2012 में कर्नाटक हाइकोर्ट के पूर्व जज ने एक पीआइएल फाइल की. इसमें उन्होंने यूआइडीएआइ द्वारा ‘आधार’ कार्ड जारी करने पर रोक लगाने की मांग की. उन्होंने कहा कि ‘आधार’ व्यक्तियों की निजता के अधिकारों का हनन करता है.

सितंबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आवश्यक सेवाअों के लिए ‘आधार’ को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता.

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अगस्त, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी सरकारी योजनाअों का लाभ लेने के लिए ‘आधार’ को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने जनवितरण प्रणाली और घरेलू रसोई गैस योजना में सब्सिडी के लिए ‘आधार’ के इस्तेमाल की अनुमति दे दी. इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को यह कहते हुए संविधान पीठ को सौंप दिया कि वही तय करे कि ‘आधार’ निजता के अधिकारों का उल्लंघन करता है या नहीं.

अक्तूबर, 2015 में पांच जजों की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई की और ‘आधार’ कार्ड को महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), जन धन योजना, पेंशन और इपीएफ स्कीम तक सीमित कर दिया.

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मार्च, 2017 में ‘आधार’ को मान्यता दिलाने के लिए सरकार ने संसद में वित्त बिल, 2017 पेश किया. इसमें आयकर कानून में एक सेक्शन 139एए को जोड़ा गया. इसमें 1 जुलाई, 2017 और उसके बाद आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए पैन कार्ड को ‘आधार’ कार्ड से जोड़ना अनिवार्य कर दिया गया.

मार्च, 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया, जिसमें कहा कि समाज कल्याण योजनाअों में ‘आधार’ को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. हां, अन्य सेवाअों के लिए इसे अनिवार्य कर सकते हैं.

अप्रैल, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब ‘आधार’ को ‘वैकल्पिक’ बताया गया है, तो इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने के लिए पैन को ‘आधार’ से जोड़ना अनिवार्य कैसे किया जा सकता है.

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9 जून, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आयकर कानून की धारा 139एए को वैध माना, लेकिन इस पर अमल करने पर आंशिक रोक लगा दी. यह रोक तब तक जारी रहेगी, जब तक संविधान पीठ यह फैसला नहीं दे देती कि ‘आधार’ व्यक्ति की निजता का हनन करता है या नहीं.

ज्ञात हो कि देश के नागरिकों का डाटाबेस तैयार करने के लिए सरकार ने वर्ष 2009 में ‘आधार’ योजना की शुरुअात की थी. इसका उद्देश्य सब्सिडी में लीकेज को रोकना और एक ही व्यक्ति द्वारा गलत तरीके से कई योजनाअों का लाभ लेने से रोकना था. ‘आधार’ के कारण सरकार को हजारों करोड़ रुपये की बचत हो रही है.

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