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Buxar News: प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेने में इंद्र पुत्र जयंत ने गंवा दी अपनी एक आंख

Updated at : 26 Sep 2025 7:15 PM (IST)
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Buxar News: प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेने में इंद्र पुत्र जयंत ने गंवा दी अपनी एक आंख

इंद्र पुत्र जयंत का श्रीराम ने फोड़ा आंख रामलीला में दिखाया जाता है कि प्रभु श्री राम, सीता जी का सुंदर शृंगार करते हैं.

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बक्सर. किला मैदान में रामलीला समिति के तत्वावधान में चल रहे 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के 13 वें दिन शुक्रवार की रात रामलीला में “जयंत पर कृपा व अनुसुइया जी से भेंट ” का मंचन किया गया, जबकि दिन में श्रीकृष्ण लीला में “गोवर्धन डाकू ” प्रसंग को जीवंत किया गया. इंद्र पुत्र जयंत का श्रीराम ने फोड़ा आंख रामलीला में दिखाया जाता है कि प्रभु श्री राम, सीता जी का सुंदर शृंगार करते हैं. उसी वक्त जयंत की पत्नी वहां पहुंचती है और भगवान श्री राम का दर्शन कर उनके चरणों की भक्ति मांगती है. भगवान की कृपा से वह स्वर्ग पहुंचती है. वहां जयंत के पूछने पर उनकी पत्नी सारा वृतांत बताती है. जयंत कौवे का वेश बनाकर प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेने उनके पास पहुंच जाता है और सीता जी के पैर में चोट मारता है. उसकी इस धृष्टता से क्रोधित श्री राम जयंत के लिए अग्निबाण छोड़ देते हैं. वह उससे बचने के लिए अपने पिता इंद्र के अलावे भागते हुए बाबा भोलेनाथ और ब्रह्मा जी के पास जाता है. परंतु उसकी रक्षा कोई नहीं करता. अंत में नारद जी की सलाह पर वह श्री राम की शरण में जाता है. लिहाजा श्रीराम उस पर कृपा करते हैं, लेकिन दंड स्वरूप उसकी एक आंख फोड़ देते हैं. इस घटना के बाद श्री राम आगे बढ़ते हुए अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं, जहां उनका भव्य स्वागत किया जाता है. सीता जी को प्रभु श्रीराम माता अनसुइया के पास शिक्षा लेने के लिए भेजते हैं. जहां अनसुइया माता सीता को स्त्री धर्म का उपदेश देती है. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से डाकू गोवर्धन बन गया भक्त श्री कृष्णलीला के “गोवर्धन डाकू व भक्त करमेती बाई ” प्रसंग में दिखाया गया कि डाकू गोवर्धन एक बहुत बड़ा लुटेरा है. वह एक दिन अपने आप को बचाने के लिए भाग रहा था. रास्ते में परशुराम जी, भगवान श्रीकृष्ण की कथा सुना रहे थे. उसी भीड़ में वह छुपने के इरादे से बैठ गया. उस वक्त कथा में भगवान श्री कृष्ण के शृंगार का वर्णन चल रहा था, जिसमें कथावाचक ठाकुर जी के सिर पर हीरे और माणिक्य, मोती लगे हुए सोने के मुकुट, कमर पर सोने की काथली, हाथ में सोने की छड़ी, पैरों में सोने के नूपुर का वर्णन कर रहे थे. डाकू गोवर्धन ने सोचा कि जो व्यक्ति ऊपर से नीचे तक सोना पहनता है उसे लूटने से कितना फायदा होगा. वह श्रीकृष्ण को लुटने वृंदावन की ओर चल पड़ता है. रास्ते में उसे श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त करमेती बाई मिलती है, जो श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए वृंदावन जा रही है. गोवर्धन डाकू भी उनके साथ होकर चल पड़ता है. रास्ते में दोनों ही ठाकुर जी का नाम रटते जा रहे हैं. परन्तु डाकू गोवर्धन लूटने के उद्देश्य से नाम रट रहा था और करमेती बाई भक्ति भावना से याद कर रही थी. जब वे दोनों वृंदावन पहुंचते हैं तो कई दिन तक कृष्ण को ढूंढते रहते हैं. अंत में भगवान श्रीकृष्ण दोनों को दर्शन देते हैं. करमेती बाई प्रभु के दर्शन मात्र से धन्य हो जाती है और श्रीकृष्ण उसे अपनी रास सखियों में शामिल होने का वरदान देते हैं. वहीं जब डाकू गोवर्धन कृष्ण का सोना लूटने के उद्देश्य से कृष्ण को छूता है तो उसका भाव बदल जाता है और वो लूटने का भाव छोड़कर सेवा भाव में परिवर्तित हो जाता है. भगवान श्रीकृष्ण उसे ये कहकर वरदान देते हैं कि मेरा नाम चाहे तुमने बुरे भाव से ही लिया हो, लेकिन उसमें तुम्हारा पूरा समर्पण था और तुम्हारी हर सांस से मेरा नाम सुनाई दे रहा है, इसके लिए मैं तुम्हे अपना सखा होने का वरदान देता हूं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAVIRANJAN KUMAR SINGH

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