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Giridih News :सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है डुमरी का सार्वजनिक दुर्गा मंदिर

Updated at : 24 Sep 2025 11:21 PM (IST)
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Giridih News :सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है डुमरी का सार्वजनिक दुर्गा मंदिर

Giridih News :डुमरी थाना के समीप स्थित सार्वजनिक दुर्गा मंदिर की दीवारों के बीच पिछले 224 वर्षों से मंदिर की घंटियां और मस्जिद की अजान एक साथ गूंज रही है. यह मंदिर गंगा-जमुनी तहज़ीब, सांप्रदायिक सौहार्द और गांधीवादी विचारधारा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है.

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यहां की सार्वजनिक दुर्गापूजा, केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव, साझी विरासत और मानवता के मूल्यों का उत्सव है. यहां पूजा की शुरुआत जमींदार ने की. निर्माण कार्य में दारोगा ने योगदान दिया और पूजा पद्धति महात्मा गांधी के विचारों से बदली.

1801 में जमींनदार ने खपरैल मकान में शुरू करायी थी पूजा

इस ऐतिहासिक मंदिर में वर्ष 1801 में पहली बार दुर्गा पूजा की गई थी. तत्कालीन जमींदार डिहू भगत ने अपनी जमीन पर खपरैल मकान में पूजा की शुरुआत की थी. उस समय आसपास के इलाके बगोदर, तोपचांची और नावाडीह में दुर्गापूजा नहीं होती थी. इसलिए श्रद्धालु पैदल या बैलगाड़ियों से डुमरी के सार्वजनिक दुर्गा मंदिर में पूजा करने आते थे. यहां एक ओर मंदिर है तो दूसरी ओर सिर्फ एक घर की दूरी पर मस्जिद है. 1867 में डुमरी के तत्कालीन दारोगा निसार हुसैन ने जनता के सहयोग से यहां पक्का मंदिर का निर्माण कराया. तत्कालीन दरोगा ने स्थानीय लोगों को सहयोग कर मंदिर के बगल में मस्जिद भी बनवायी. मस्जिद के लिए जमीन की व्यवस्था जमींदार परिवार ने की थी. दोनों धार्मिक स्थल आज भी सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बने हुए हैं. प्रारंभ में दुर्गा मंदिर में बलिप्रथा थी.

महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रेरित होकर बदली पूजा पद्धति

पहले भैंसे की और बाद में बकरे की बलि दी जाती थी, लेकिन जब महात्मा गांधी का अहिंसा आंदोलन पूरे देश में फैला, तब डुमरी में भी वैष्णवी पद्धति से पूजा की मांग उठी. मान्यता है कि जमींदार परिवार की एक महिला को मां दुर्गा ने बलिहीन पूजा करने का सपना दिया. इसके बाद स्थानीय पंडितों ने पूजा कराने से मना कर दिया तो चंदनकियारी से पंडित बुलाकर वैष्णवी पद्धति से पूजा शुरू की गयी. यह परंपरा आज भी चल रही है.

बरगंडा गांव में मिलकर करते हैं पूजा, प्रतिमा उठाते हैं दोनों समुदाय के लोग

डुमरी प्रखंड के बरगंडा गांव में भी करीब चार दशक पहले सुखदेव जायसवाल और परमेश्वर जायसवाल ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. तभी से यहां की पूजा में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों की सक्रिय भागीदारी होती है. दुर्गा मां की प्रतिमा को दोनों समुदाय के लोग मिलकर कांधे पर उठा कर विसर्जन के लिए ले जाते हैं. यह पूजा आज पूरे इलाके में सांप्रदायिक एकता और श्रद्धा का केंद्र बन चुकी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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PRADEEP KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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