परेशानियां कई, फिर भी ठसक के साथ रांची की सड़कों पर ‘पिंक अॅाटो’ दौड़ाती हैं महिलाएं

Updated at : 25 May 2017 4:40 PM (IST)
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परेशानियां कई, फिर भी ठसक के साथ रांची की सड़कों पर ‘पिंक अॅाटो’ दौड़ाती हैं महिलाएं

-रजनीश आनंद के साथ बुधमनी- रांची : अगर आप आप रांची की सड़कों पर किसी महिला को पूरे आत्मविश्वास के साथ अॅाटो दौड़ाते देखें तो हैरान ना हों, क्योंकि यह किसी फिल्म की शूटिंग नहीं हो रही है, बल्कि यह सच है. रांची शहर में कडरू मोड़ से अरगोड़ा चौक तक पिंक अॅाटो का परिचालन […]

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-रजनीश आनंद के साथ बुधमनी-

रांची : अगर आप आप रांची की सड़कों पर किसी महिला को पूरे आत्मविश्वास के साथ अॅाटो दौड़ाते देखें तो हैरान ना हों, क्योंकि यह किसी फिल्म की शूटिंग नहीं हो रही है, बल्कि यह सच है. रांची शहर में कडरू मोड़ से अरगोड़ा चौक तक पिंक अॅाटो का परिचालन होता है, जिसकी चालक महिलाएं हैं. पिछले चार साल से शहर में पिंक अॅाटो का परिचालन किया जा रहा है. महिलाओं को सुविधा और सुरक्षा मुहैया कराने के नाम पर इनका परिचालन शुरू हुआ. अभी कुल 40 महिलाएं इस रूट पर अॅाटो चला रही हैं.

लेकिन इन महिलाओं का जीवन सहज नहीं है. इन महिलाओं का अपना परिवार है, जिनकी पूरी जिम्मेदारी उन पर है. ऐसे में अहले सुबह घर के काम निपटाकर ये महिलाएं 8-9 नौ बजे तक सड़कों पर उतर जाती हैं. फिर शुरू हो जाती है इनकी दिनचर्या एक अॅाटो चालक के रूप में. ये पैसेंजर को अपने अॅाटो में बैठाती हैं और उन्हें अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचाती हैं. लेकिन यह सहज काम नहीं हैं. उन्हें काफी जद्दोजहद करनी होती है.
चूंकि पुरुष अॅाटो चालकों से उनकी प्रतिस्पर्धा है. पिंक अॅाटो में सिर्फ महिलाएं सफर करती हैं या फिर परिवार. ऐसे में महिलाओं को सवारी के लिए काफी इंतजार करना पड़ता है. पुरुष चालक उन्हें सवारी बैठाने नहीं देते और कई बार तो बात बहस और गाली-गलौच तक भी पहुंच जाती है. कई बार इन महिलाओं के चरित्र पर भी बात उठ जाती है, क्योंकि वे सड़क पर उतरी हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि अॅाटो चलाने वाली ये महिलाएं पेट की जरूरत और परिवार को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए सड़क पर उतरी हैं. जब वे शान से सड़क पर गाड़ी दौड़ाती हैं, तो वे पुरूषों को अखर जाती हैं और उन्हें लगता है कि महिलाओं ने उनके क्षेत्र में दखल दी है.
आज हमने कुछ महिलाओं से बात की. इन महिलाओं का कहना है कि हम रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद करते हैं. लेकिन पुरुष अॅाटो चालक उन्हें सवारी उठाने नहीं देते. उन्हें सही जगह पर अॅाटो लगाने नहीं दिया जाता है. जिसके कारण सवारी मिलने में परेशानी होती है. सड़क पर छेड़खानी जैसी घटनाएं तो आजतक नहीं हुईं हैं हां अॅाटो वाले ही कुछ परेशान करते हैं. एक महिला ने कहा कि हम दिनभर सड़क पर रहते हैं, लेकिन हमारे लिए शौचालय की भी सुविधा नहीं है जिसके कारण हमें खुले में जाना पड़ता है.

जहां तक बात परेशानियों की है, तो सड़क पर निकले हैं तो इतनी परेशानी तो होगी ही. गुमला की रहने वाली एक अॅाटो चालक ने बताया कि मेरे पति घर पर सिलाई का काम करते हैं, ऐसे तो कुछ कहते नहीं लेकिन कभी-कभी उनके मन भी बात आ जाती है कि मैं अॅाटो चलाती हूं दिनभर घर से बाहर रहती है.

वहीं एक दूसरी अॅाटो चालक सुमन देवी ने बताया कि पेट के लिए वे इस काम में आयी हैं. लेकिन उन्हें लोग भद्दी बातें बोलते हैं, उस वक्त बहुत दुख होता है. लेकिन क्या किया जाये सब सुनना पड़ता है. लेकिन अब हम भी विरोध कर रहे हैं. हम किसी से डरने वाले नहीं हैं अगर पुरुष अॅाटो चला रहे हैं, तो हम भी चला रहे हैं हम किसी से कम नहीं. फिर दबकर क्यों रहेंगे.
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