पैरेंट्स को भी रखना चाहिए बच्चों की खुशियों का ध्यान

Updated at : 21 Apr 2016 8:27 AM (IST)
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पैरेंट्स को भी रखना चाहिए बच्चों की खुशियों का ध्यान

वीना श्रीवास्तव साहित्यकार व स्तंभकार, इ-मेल : veena.rajshiv@gmail.com, फॉलो करें – फेसबुक : facebook.com/veenaparenting ट्विटर : @14veena आइटीआइ कर चुके एक युवक ने लिखा है, वह एक लड़की से प्यार करता है जो अभी पढ़ रही है. वह भी उसे चाहती है. यहां समस्या घरवालों की है कि वे तैयार नहीं हैं. कारण- लड़के का […]

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वीना श्रीवास्तव
साहित्यकार व स्तंभकार, इ-मेल : veena.rajshiv@gmail.com, फॉलो करें –
फेसबुक : facebook.com/veenaparenting
ट्विटर : @14veena
आइटीआइ कर चुके एक युवक ने लिखा है, वह एक लड़की से प्यार करता है जो अभी पढ़ रही है. वह भी उसे चाहती है. यहां समस्या घरवालों की है कि वे तैयार नहीं हैं. कारण- लड़के का गरीब और पिछड़ी जाति से होना और लड़की का सवर्ण होना है. यही नहीं, लड़की सुंदर और लम्बी है और लड़का उसके विपरीत. लड़का 25 वर्ष का है. दोनों की लम्बाई व रंग और जाति के अंतर ने दोनों के बीच दूरी खड़ी कर दी है. आजकल यह आम बात है कि लड़के-लड़की की लंबाई बराबर होना या लड़की का थोड़ा लंबा होना. पहले भी ऐसे विवाह होते थे मगर अमूमन यही देखा जाता है कि लड़के की लम्बाई लड़की से ज्यादा हो.
माता-पिता भी उपयुक्त वर की तलाश करते हैं. जहां तक गोरे-काले का प्रश्न है, पहले भी यह धारणा थी और आज भी है कि लड़के की पोस्ट, योग्यता या धन-दौलत देखी जाती है और लड़की की सुंदरता. हमारे परिचितों में कई घर ऐसे हैं जहां आंटी बेहद सुंदर हैं और अंकल उनके बिलकुल विपरीत. अब उनके नाती-पोते हैं. उन्होंने पूरा जीवन खुशी-खुशी निभा दिया, लेकिन आज की लड़कियां पहले की तरह चुप रह कर हर फैसला माननेवाली नहीं हैं और वे खुद भी यही चाहती हैं कि जिससे उनका विवाह हो वह अच्छा तो कमा ही रहा हो, साथ ही हैंडसम हो. यहां तक कि लड़कियां लड़कों को रिजेक्ट कर देती हैं. इसमें कोई बुराई नहीं. जब यह हक लड़कों को है तो लड़कियों को भी होना चाहिए. नहीं पसंद तो जीवन भर केवल बात रखने के लिए घुटकर जीने से तो बेहतर है कि मना कर दिया जाये.
हमारा समाज आज भी बेमेल जोड़ों को देख कर कुछ-न-कुछ कहता जरूर है. मैं जब उन दोनों आंटी से पहली बार मिली थी तो यह सवाल मन में आया था कि यह विवाह हुआ कैसे ? मैं पढ़ रही थी. इसलिए सोच परिपक्व नहीं थी. वे बहुत फ्रैंडली थीं. इसलिए मैंने ही पूछ लिया. तो दोनों से एक ही जवाब मिला, वे बहुत गरीब परिवार से हैं. अंकल बहुत अमीर हैं.
आंटी के पैरेंट्स ने सोचा कि लड़की राज करेगी. नौकर-चाकर होंगे तो बेटी सुखी रहेगी. हुआ भी यही. दोनों अपने घरों में बेहद खुश थीं. फिर भी मन में था कि उनकी गरीबी खरीदी गयी. अगर वे भी सम्पन्न परिवार से होतीं तो उन्होंने जिस राजकुमार के सपने देखे थे, वैसा कोई मिलता. यह कसक कहीं थी आंटी के मन में. एक आंटी ने बताया कि जयमाला के वक्त वह अंकल को देखकर बेहोश हो गयी थीं और वरमाला डालने से मना कर दिया था.
बाद में समझाकर विवाह करया गया. उस वक्त उन्हें राह में ऐसे कमेंट मिले जिससे दोनों कई बार अपसेट हुए. घर आकर अंकल बहुत झुंझलाये. एक बार वह इतना गुस्सा हुए कि काफी समय तक आंटी के साथ कहीं नहीं गये. मगर आज की लड़कियों के लिए निभाना मुश्किल है. इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले जरूर सोचें कि अगर कोई कटाक्ष करेगा तो क्या दोनों सह पायेंगे? लम्बा-छोटा होना अपने बस में नहीं और योग्यता लम्बाई देखकर नहीं आती. कम हाइटवाले भी बहुत योग्य होते हैं. इसलिए घरवालों का केवल इस आधार पर राजी न होना कि लड़के की हाइट कम है, कोई ठोस कारण नहीं.
हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की भी हाइट कम थी. एक रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेकर उन्होंने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दिया था और उस पर बहस के दौरान उन्होंने कहा था- “शायद मेरे लम्बाई में छोटे और नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं दृढ़ नहीं हूं. यद्यपि मैं शारीरिक रूप से मजबूत नहीं, लेकिन अंदर से इतना कमजोर भी नहीं”. यह केवल एक बानगी भर थी. बापू महात्मा गांधी की हाइट भी ज्यादा नहीं थी. चार्ली चैप्लिन और न जाने कितने विद्वान, कितने कामयाब लोग मिलेंगे जिनकी लम्बाई कम थी.
आज भी ऐसे महान लोग हैं, जो ऊंचाइयों पर हैं. उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वह अपनी मेहनत व लगन से किया. कम हाइट को वह कमजोरी नहीं, ताकत बनाकर आगे बढ़े और कामयाब हुए. मेरा एक कलीग था जिसकी हाइट काफी कम थी. आज वह एक चैनल का डायरेक्टर है. काबिलीयत के आगे हाइट गौड़ हो जाती है. हाइट नहीं, बल्कि काबिलीयत मायने रखती है. इसलिए यह मानदंड उचित नहीं. सबको कुछ समय संघर्ष करना पड़ता है. संघर्ष के बाद ही जीवन खिलता और फलता-फूलता है. जिनको जीवन साथ गुजारना है अगर वे खुश हैं तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. पैरेंट्स को भी नहीं.
आज इक्कीसवीं सदी में भी अगड़े-पिछड़े का भेदभाव दुख देता है. पढ़-लिख कर इनसान ज्ञान अर्जित करता है. ज्ञान हासिल करके भी हम अनपढ़ों-सी बातें करें, तो पढ़ाई का कोई मतलब नहीं. आज झूठी शान के लिए अगड़े-पिछड़े की बात करनेवालों के घर अगर कोई बीमार पड़े, किसी को खून की जरूरत हो तो उस समय कोई अगड़ा-पिछड़ा या एससी-एसटी नहीं देखता, किसी का भी खून मिले, लोग पैर छूकर भी खून के लिए भीख मांगते हैं जिससे अपनों की जान बच जाये.
मगर शादी-विवाह की बात आते ही सारे बंधन उन्हें जकड़ लेते हैं. ईश्वर ने हम सबका शरीर एक जैसी हड्डी, मांस, खून से बनाया. ऐसा तो नहीं कि अगड़ों के शरीर में सोने-चांदी की हड्डी लगायी हो और पिछड़ों के शरीर में लोहे की और यह भेदभाव हम इनसान द्वारा किया गया है. कार्य के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनी. ईश्वर ने तो हमें इनसान ही बनाकर भेजा था. जाति-वर्ण व्यवस्था हमारी ही बनायी हुई है. इसलिए पैरेंट्स को बच्चों की खुशियों पर ध्यान देना चाहिए न कि आडंबर में पड़ कर उनकी खुशियों का गला घोंटना चाहिए.
क्रमश:
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