पेट के विकारों को दूर रखता है कपालभाति

Updated at : 12 Jul 2017 12:51 PM (IST)
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पेट के विकारों को दूर रखता है कपालभाति

कपालभाति प्राणायाम की एक विधि है. ‘कपाल’ का अर्थ है ललाट. भांति का अर्थ लोहार द्वारा उपयोग में लानेवाला धौंकनी है. अत: यह अभ्यास कपाल को शुद्ध करने, पेट के अंगों की मजबूती, श्वसन क्रिया में सुधार, मन को शांत तथा जागरूक बनाने में भी लाभकारी है. जमीन पर किसी भी आरामदायक आसन में बैठ […]

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कपालभाति प्राणायाम की एक विधि है. ‘कपाल’ का अर्थ है ललाट. भांति का अर्थ लोहार द्वारा उपयोग में लानेवाला धौंकनी है. अत: यह अभ्यास कपाल को शुद्ध करने, पेट के अंगों की मजबूती, श्वसन क्रिया में सुधार, मन को शांत तथा जागरूक बनाने में भी लाभकारी है.
जमीन पर किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं, रीढ़ की हड्डी सीधी, गर्दन और सिर सीधा दोनों हाथ घुटनों के ऊपर ज्ञान अथवा चिन मुद्रा में रहेंगी. आंखें बंद कर लें. नासिका से गहरी सांस अंदर लेते हुए पेट को फैलाएं तथा बलपूर्वक छोड़ते हुए पेट की पेशियों को पूर्णत: संकुचित करें. किंतु अधिक जोर नहीं लगाएं. इसी तरह अगली सांस उदर की पेशियों को बिना प्रयास फैलाते हुए लें और थोड़ा जोर लगाते हुए सांस को बाहर छोड़ें. इस प्रक्रिया को कम-से-कम 10 बार करें और इस तरह 10-10 चक्र तक अभ्यास करें. आगे चल कर आप चक्रों की संख्या बढ़ा सकते हैं. शुरुआत के दिनों में पांच चक्र के अभ्यास में 10 बार कपालभाति करें. आप पांच चक्र के अभ्यास में धीरे-धीरे कपालभाति की संख्या बढ़ाएं, जो अपनी क्षमता के अनुसार 20 से 50 या उससे अधिक भी किया जा सकता है.
श्वसन : इस अभ्यास में यह जरूरी है कि तीव्र श्वसन उदर से हो, वक्ष से नहीं. आगे चल कर जब पेट की पेशियों में ताकत आ जायेगी, तो आप अपनी अभ्यास में सांस की संख्या को 10 से बढ़ा कर 20 या 30 तक ले जा सकते हैं.
अवधि : आप 10 से 20 श्वसन-प्रश्वसन के साथ पांच चक्र तक इसका अभ्यास कर सकते हैं. आगे उच्च अभ्यास की 10 चक्र तक इसका अभ्यास कर सकते हैं और इससे अधिक अभ्यास करना हो, तो बिना किसी विशेषज्ञ के अभ्यास नहीं करना चाहिए.
सजगता : अपना ध्यान चिदाकाश, बंद आंखों के सामने अंधकार की जगह पर केंद्रित करें. फेफड़ों की धौंकनी के चलने से उत्पन्न प्राणिक तरंगों को चिदाकाश में अनुभव करें. इसके साथ-साथ यह भी अनुभव करें कि मस्तिष्क के सामनेवाला भाग शुद्ध हो रहा है. इसके अलावा सजगता लयपूर्ण श्वसन और श्वसन-प्रश्वसन की गिनती पर होनी चाहिए.
क्रम : अभ्यास को नेति के बाद एवं आसन के बाद तथा ध्यान के अभ्यास के पूर्व कभी भी किया जा सकता है. खाना खाने के बाद 3-4 घंटे के बाद इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए.
सावधानी : यदि अभ्यास के दौरान दर्द हो, चक्कर आये या जी मिचलाये तो थोड़े देर के लिए अभ्यास को बंद कर दें. जिन्हें उच्च रक्तचाप, हर्निया, बेचैनी, मिर्गी, गैस्ट्रिक, अल्सर या हृदय रोग की समस्या हो उन्हें यह अभ्यास नहीं करना चाहिए. नये अभ्यासी किसी कुशल योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही आसन शुरू करें.
ऊर्जा देने का स्रोत
यह अभ्यास उडा और पिंगली नाड़ियाें को शुद्ध करता है तथा मानसिक कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करता है. निद्रा को दूर भगाता है तथा मन को ध्यान के अभ्यास के लिए तैयार करता है. पाचन अंगों की मालिश कर उन्हें शक्तिशाली बनाता है. इससे पेट की समस्याएं दूर रहती हैं. यह अभ्यास फेफड़ा को मजबूत बनाता है. अत: दमा, वातंस्फीति, ब्रोन्काइटिस और यक्ष्मा से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह अत्यंत उत्तम अभ्यास है. यदि कोई महिला उचित देखरेख में प्रसव से पूर्व इसका अभ्यास करती है, तो उन्हें उचित लाभ मिलता है. यह तंत्रिका तंत्र को मजबूत करता है और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है.
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