पति का साथ छूटा, मगर जीत का हौसला नहीं टूटा

Updated at : 09 Jul 2017 1:04 PM (IST)
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पति का साथ छूटा, मगर जीत का हौसला नहीं टूटा

यकीन हो खुद पर, तो हर काम आसान और असफलता होती है दूर. एक सफल इनसान बनने के लिए खुद पर विश्वास होना चाहिए. कठिनाई तो हर किसी की जिंदगी में है, बस उस कठिनाई का सामना करें और आगे बढ़ते जाएं, सफलता जरूर मिलेगी. कुछ इसी हौसले से अपनी जिंदगी को पटरी पर लेकर […]

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यकीन हो खुद पर, तो हर काम आसान और असफलता होती है दूर. एक सफल इनसान बनने के लिए खुद पर विश्वास होना चाहिए. कठिनाई तो हर किसी की जिंदगी में है, बस उस कठिनाई का सामना करें और आगे बढ़ते जाएं, सफलता जरूर मिलेगी. कुछ इसी हौसले से अपनी जिंदगी को पटरी पर लेकर आयी हैं पूर्वी सिंहभूम की रहनेवाली सीमा पांडेय.

उनकी पढ़ाई इंटर तक ही हो पायी, क्योंकि पढ़ाई के बीच में ही सीमा की शादी कर दी गयी थी. प्रतापगंढ़, उत्तर प्रदेश की रहनेवाली सीमा शादी के बाद झारखंड आ गयी और पढ़ाई बीच में ही छूट गयी. लेकिन जिंदगी का एक ऐसा दौर भी आया जब सीमा के सामने पैसे की तंगी हो गयी और कमाने की जरूरत महसूस हुई. तब सीमा जी ने अपने योग के शौक को माध्यम बनाया. पहले खुद योगा कोर्स किया. उसके बाद घर पर ही योगा क्लास की शुरुआत की.

बचपन से भाता रहा है योग
सीमा पांडेय को बचपन से ही अायुर्वेद और योग काफी आकर्षित करते रहे हैं, लेकिन कभी भी इस ओर कुछ करने का मौका नहीं मिला. अकसर जानकार लोगों से आयु्र्वेद और योग की जानकारी लेती रहती थीं. इससे आयुर्वेद के बारे में काफी कुछ जानने लगीं. सीमा ने बताया कि पति की अचानक मौत के बाद मैंने आयुर्वेद और योग को ही रोजगार बनाने का सोचा. योगा कोर्स किया और फिर घर पर ही योगा क्लास की शुरुआत कर दी.
पति की मौत से सब िबखर गया
सीमा पांडेय की शादी 2001 में हुई. कुछ सालों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन 2008 में पति का निधन एक रोड एक्सीडेंट में हो गया. दो बच्चे और अागे की जिंदगी का इतना लंबा सफर तय करना सीमा के लिए पहाड़-सा हाे गया. लेकिन सीमा ने अपना हौसला बनाये रखा. दो छोटे-छोटे बच्चे थे, इसलिए घर छोड़ कर नौकरी नहीं कर सकती थीं. ऐसे में आयुर्वेद और योग काे अपनी जीविका का सहारा बनाया. सीमा बताती हैं कि पति की मौत के बाद समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं. अधिक पढ़ी थी नहीं और बच्चे बहुत छोटे थे, इसलिए उन्हें छोड़ कर नौकरी नहीं कर सकती थी.
नौ वर्षों का संघर्ष ला रहा रंग
पति के निधन के बाद सीमा पांडेय के लिए बहुत ही मुश्किल हो गयी थी. एक-एक पैसे की मोहताज हो गयी थी. लेकिन अपने शौक को जब से रोजगार बनाया है, तो हालात सुधरने लगे हैं. सीमा बताती हैं कि पिछले नौ सालों से संघर्ष कर रही हूं. पहले तो लोग आते ही नहीं थे. उन्हें मेरे काम पर विश्वास नहीं था. अब लोग हमारे पास आने लगे हैं. महीने में 10-15 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है.
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