Doctor''s Day Special : लाजवंती से दूर होगी टांसिल व मधुमेह की समस्या
Updated at : 01 Jul 2017 12:20 PM (IST)
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नीलम कुमारी टेक्निकल ऑफिसर झाम्कोफेड यह पौधा किसी के भी स्पर्श मात्र से ही सिकुड़ जाता है़ इसलिए इसे लाजवंती, छुईमुई, शर्मीली आदि नामों से जाना जाता है़ सिकुड़ने के बाद पूर्व अवस्था में आने में इसे लगभग 10 मिनट लगता है़ इसका वानस्पतिक नाम मिमोसा प्युडिका है़ यह मिमोसेसी परिवार का पौधा है़ इसका […]
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नीलम कुमारी
टेक्निकल ऑफिसर झाम्कोफेड
यह पौधा किसी के भी स्पर्श मात्र से ही सिकुड़ जाता है़ इसलिए इसे लाजवंती, छुईमुई, शर्मीली आदि नामों से जाना जाता है़ सिकुड़ने के बाद पूर्व अवस्था में आने में इसे लगभग 10 मिनट लगता है़
इसका वानस्पतिक नाम मिमोसा प्युडिका है़ यह मिमोसेसी परिवार का पौधा है़ इसका उपयोगी भाग जड़ व पंचांग है़ अलग-अलग भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है़
संस्कृत : लज्जालु, शमीपत्रा, रक्तापादी
हिंदी: छुईमुई, लाजवंती
बंगला : लाजक
तेलगु : मुनगुदा
अंगरेजी : सेंसिटिव प्लांट
तीन प्रकार के होते हैं लाजवंती
यह लगभग एक-डेढ़ फीट लंबा होता है़. पता बबूल के पत्ते के समान व कांटेदार होते है़. पुष्प लाल रंग के होते है़.इसके पौधे छोटे व जमीन पर फैलते है़. यह नमी वाली जगहों पर पाया जाता है़ इसका पुष्प पीला रंग का होता है़ बीज बहुत छोटे-छोटे, हल्के और महीन होते है़ं
स्वरूप और पहचान
इसका पौधा लगभग एक से तीन फीट ऊंचा होता है़ नमी वाली जगहों पर पाया जाता है़ पत्ते दिखने में खैर के पत्ते के समान होते है़. स्पर्श करने पर सिकुड़ जाते है़. फूल गुलाबी रंग के होते हैं, जो शीतकाल में लगते है़. फल लगभग आधा एक इंच लंबा, धूसरवर्ण के रोयेदार होते है़. प्रत्येक फली में तीन चार बीज होते है़.
औषधीय उपयोग
यह पौधा कफपित जन्य विकारों में उपयोगी है़ स्वाद कड़वी व कसैली है़ यह अतिसार, घाव, श्वास रोग, कुष्ठ रोग, कब्ज, खांसी, बवासीर, टांसिल, डायबिटिज आदि रोगों में उपयोगी है़ इसकी जड़ का छाल पेट की वायु, पथरी, संग्रहणी, प्रमेह, वमन आदि रोगों को दूर करता है़ इसके पत्तों का प्रयोग जख्म में किया जाता है़
काली खांसी : इसकी जड़ का चूर्ण शहद या शक्कर के साथ दिन में तीन-चार बार बच्चों को देने से काली खांसी दूर हाेती है़ इसकी जड़ को गले में बांधने से भी खांसी ठीक होती है़ यह अचूक दवा है़
पथरी : इसकी जड़ को पानी के साथ पीस कर घाव पर लेप किया जाता है़ इसकी जड़ के चूर्ण (दो ग्राम) का दिन में तीन बार पानी के साथ प्रयोग किया जाता है.
टांसिल : इसके पत्तों का रस 10-20 एमएल दिन में दो से तीन बार पीने से टांसिल में लाभ पहुंचता है़
मधुमेह: इसकी पत्तियों का काढ़ा प्रयोग करने से आराम मिलता है़ 100 ग्राम पत्तियों को 300 एमएल पानी में उबालना है़
शक्ति वर्द्धक : इसके बीज का चूर्ण दूध के साथ प्रयाेग किया जाता है़
जांडिस : इसके पत्ते के रस का प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिए़
बवासीर : इसकी जड़ या पत्तों का पाउउर दूध में मिला कर प्रयोग किया जाता है़
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