महीने भर मिलने वाले झारखंड की इस सब्जी आगे चिकन-मटन भी फेल, फायदा इतना कि लोग कहते हैं सफेद सोना

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Monsoon Seasonal Vegetables: झारखंड की मिट्टी से उपजी खुखड़ी यानी देसी मशरूम, न सिर्फ स्वाद में लाजवाब है बल्कि सेहत के लिए भी वरदान है. मानसून में सिर्फ 1 महीने तक मिलने वाली यह सब्जी पूरी तरह ऑर्गेनिक, प्रोटीन युक्त और इम्युनिटी बूस्टर होती है. जानिए इसके जबरदस्त फायदे और खास रेसिपी.
Monsoon Seasonal Vegetables: बारिश के मौसम हो झारखंड के पारंपरिक खानपान की बात न हो तो कहानी अधूरी है. क्यों कि यहां की मिट्टी और हरी भरी वादियों में ऐसी ऐसी सब्जियां पायी जाती है जो बेहद फायदेमंद होता है. ऐसी ही एक सब्जी है जो मानसून के सीजन में मात्र 1 से डेढ़ महीना मिलता है. जिसे स्थानीय लोग “खुखड़ी” (Khukdi) या जंगली मशरूम के नाम से जानते हैं. यह आदिवासी संस्कृति के खानपान का अहम हिस्सा है. खुखड़ी न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि इसमें छिपे हैं सेहत के कई राज. इसके स्वाद और प्रोटीन के आगे तो चिकन मटन भी फेल है.
प्रोटीन का शुद्ध स्रोत
खुखड़ी में भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो शरीर की मरम्मत करने के साथ साथ और मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है. यह उन शाकाहारियों के लिए बेहद फायदेमंद है, जो कोई भी डेयरी प्रोडक्ट या अंडे नहीं खाते हैं.
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला है यह फूड
यह देसी मशरूम (Desi Mushroom) इम्युनिटी बूस्टर के रूप में भी काम करता है. इसमें मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर को वायरल, फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाने में मदद करते हैं. बरसात के मौसम में इसका सेवन बहुत फायदेमंद माना जाता है.
डायबिटीज और हार्ट पेशेंट्स के लिए वरदान
खुखड़ी में लो फैट और नो कोलेस्ट्रॉल होता है, जिससे यह दिल के मरीजों और डायबिटिक लोगों के लिए भी शानदार विकल्प है. यह ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में भी मदद करता है.
पाचन में मददगार
देसी मशरूम फाइबर से भरपूर होता है, जो पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है. इसे खाने से पेट साफ रहता है और गैस, अपच या एसिडिटी जैसी समस्याएं दूर होती हैं.
पूरी तरह से ऑर्गेनिक और केमिकल-फ्री
खुखड़ी जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती है, उस पर किसी प्रकार का खाद या कीटनाशक नहीं डाला जाता हैं. यानी यह पूरी तरह ऑर्गेनिक और हर्बल फूड है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता है.
खुखड़ी की सब्जी कैसे बनाई जाती है?
इसे अन्य सब्जियों की तरह ही लहसून, प्याज और सरसों के तेल में भूनकर बनाया जाता है. कई जगहों पर इसमें आलू या अरबी भी मिलाई जाती है. स्वाद में यह मांस जैसी होती है, इसलिए शाकाहारी लोग इसे “देसी मीट” भी कहते हैं. खास बात ये है कि यह किसी होटल या रेस्टोरेंट में भी नहीं मिलता है. जब इसे बनाया जाता है तो इसकी खुशबू इतनी लाजवाब होती है पड़ोसी वाले भी आपके पास खीचें चले आए. इसमें मिलने वाले पोषक तत्वों के कारण भी कई लोग इसे सफेद सोना भी कहते हैं.
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लेखक के बारे में
By Sameer Oraon
इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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