आखिर बिहार की शादियों में क्यों बनाया जाता है कोहबर? जानिए इसकी खास वजह

कोहबर पेंटिंग (Image: instagram )
Bihar Wedding Kohbar Tradition: इंस्टाग्राम पर मौसम सिंह ने बिहार की शादियों की एक खास परंपरा के बारे में बताया है. उन्होंने समझाया कि शादी के समय घर की दीवारों पर कोहबर क्यों बनाया जाता है. यह पेंटिंग दूल्हा-दुल्हन के सुखी वैवाहिक जीवन, प्रेम, समृद्धि और शुभ शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है.
Bihar Wedding Kohbar Tradition: सोशल मीडिया पर अक्सर हमें हमारी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ी रोचक जानकारियां देखने को मिलती हैं. हाल ही में मौसम सिंह ने अपने इंस्टाग्राम पर बिहार की शादियों से जुड़ी एक खास परंपरा के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि शादी के समय घर की दीवारों पर कोहबर क्यों बनाया जाता है और इसका क्या महत्व होता है. दरअसल, कोहबर सिर्फ एक पेंटिंग या सजावट नहीं होती, बल्कि यह दूल्हा-दुल्हन के नए जीवन की शुरुआत, प्रेम, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. बिहार और खासकर मिथिला क्षेत्र में यह परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है और आज भी शादियों में इसे बड़े सम्मान और खुशी के साथ निभाया जाता है.
बिहार की शादियों में क्यों बनाया जाता है कोहबर?
बिहार की पारंपरिक शादियों में कोहबर का बहुत खास महत्व होता है. यह एक तरह की पारंपरिक पेंटिंग या चित्र होता है, जिसे शादी के समय घर की दीवारों पर बनाया जाता है. आमतौर पर इसे उस कमरे में बनाया जाता है जहां शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन को बैठाया जाता है.
कोहबर का असली मतलब
“कोहबर” शब्द का मतलब होता है विवाह कक्ष. पुराने समय में दूल्हा-दुल्हन के कमरे को सुंदर बनाने और उसे शुभ बनाने के लिए दीवारों पर खास चित्र बनाए जाते थे. यही चित्र कोहबर कहलाते हैं.
कोहबर में क्या-क्या बनाया जाता है
कोहबर पेंटिंग में कई तरह के प्रतीक बनाए जाते हैं, जिनका अलग-अलग मतलब होता है. जैसे—
- कमल का फूल – पवित्रता और प्रेम का प्रतीक
- बांस का पेड़ – वंश वृद्धि और समृद्धि का संकेत
- मछली – सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक
- सूर्य और चंद्रमा – जीवन में संतुलन और ऊर्जा का प्रतीक
इन सभी चित्रों का उद्देश्य दूल्हा-दुल्हन के सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करना होता है.
मिथिला कला से जुड़ी परंपरा
कोहबर की पेंटिंग दरअसल मिथिला पेंटिंग का ही एक हिस्सा है. इसे पहले प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता था, जैसे हल्दी, फूल, पत्तियां, चावल और काजल से बने रंग. इस वजह से यह कला बिहार की पारंपरिक संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है.
परंपरा और आशीर्वाद का प्रतीक
कोहबर को सिर्फ एक कला नहीं बल्कि परिवार की शुभकामनाओं और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है. इसलिए आज भी बिहार और मिथिला क्षेत्र की कई शादियों में यह परंपरा बड़े प्रेम से निभाई जाती है.
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By Prerna
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