जी 20 : कोयले के उपयोग को लेकर सिर्फ भारत की तरफ अंगुली उठाने की जरूरत नहीं

हाल ही में जी 20 देशों की कमान संभालने के बाद से सारी दुनिया की नजरें कोयले के उपयोग को लेकर भारत पर टिकी हैं. कुछ समय पहले, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के आंकड़ों के हवाले से यह बात कही गयी कि जी 20 देशों में ऊर्जा के पब्लिक फायनेंस अभी भी जीवाश्म ईंधन उद्योग की ओर झुके हुए हैं.
वैसे तो कोयला के उपयोग को धीरे- धीरे हमारे ऊर्जा ढाँचे से हटाने और उसकी जगह रिन्यूएबल ऊर्जा के उपयोग की बात अब बात नहीं बल्कि जमीनी हकीकत में बदलती नज़र आ रही हैं . पर हाल ही में जी 20 देशों की कमान संभलने के बाद से सारी दुनिया की नजरें कोयले के उपयोग को लेकर भारत पर टिकी हैं.
हाल ही में जी 20 देशों की कमान संभालने के बाद से सारी दुनिया की नजरें कोयले के उपयोग को लेकर भारत पर टिकी हैं. कुछ समय पहले, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के आंकड़ों के हवाले से यह बात कही गयी कि जी 20 देशों में ऊर्जा के पब्लिक फायनेंस अभी भी जीवाश्म ईंधन उद्योग की ओर झुके हुए हैं.. कुल मिलकर जी20 देशों ने मायूस किया है.
हालांकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में जहां G20 देशों में जीवाश्म ईंधन सब्सिडी 147bn USD तक गिर गई थी, वहीं 2021 में वो फिर से 29% बढ़कर 190bn हो गई.2022 में सब्सिडी में वृद्धि जारी है.ऐसा यूक्रेन युद्ध की वजह से है.
दरअसल के बाद से कोयले के लिए भारत को निशाना बनाया जाना अन्यायपूर्ण है. ज्ञात हो कि पश्चिमी विकसित समृद्ध राष्ट्र सभी इस बात से सहमत हैं कि उत्सर्जन को कम करने के लिए कोयले की चरणबद्ध समाप्ति एक अपेक्षाकृत सस्ता और आसान विकल्प है. दरअसल ये सभी देश कोयले से दूर हट रहे हैं क्योंकि उनके पास प्राकृतिक गैस की आपूर्ति है. हालांकि कोयले की तरह प्राकृतिक गैस और तेल दोनों ही ग्रीन हाउस गैसों – जीएचजी उत्सर्जन में योगदान करते हैं.
लेकिन फिर भी जीवाश्म ईंधन पर एक अधिक मजबूत कार्रवाई की भारत द्वारा पेशकश किए जाने पर जलवायु वार्ता सम्मेलन COP27 में कई बड़े उत्सर्जकों और तेल उत्पादकों ने अड़ंगा लगाया. वही विकसित और अमीर देश भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी कोयले पर निर्भरता के लिए निशाना साध रहे है जो पाखंडी और अन्यायपूर्ण है.
अगर विकसित देशों की और अधिक मिटिगेशन महत्वाकांक्षा और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों की सूची का विस्तार एक पलड़े में है तो दूसरे पलड़े में विकासशील देशों का बढ़ते जलवायु प्रभावों का सामना और उनसे निपटने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता की मांग है . क्योंकि एतिहासिक जिम्मेदारी भी इन्हीं विकसित अमीर देशों की है. अपनी विकास की अंधी दौड़ में औद्यौगिक काल में इन देशों ने बेहिसाब कोयला जलाकर और उत्सर्जन करके जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को जन्म दिया.
ग्लासगो में हुए समझौते में केवल कोयले को लक्षित किया गया था जबकि प्राकृतिक गैस और तेल जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों का उल्लेख करने से परहेज किया गया था, जिनका उपयोग अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा बहुतायत में किया जाता है. हालांकि हानिकारक जीएचजी उत्सर्जन को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका सभी जीवाश्म ईंधन को पूरी तरह से समाप्त करना है.
अमेरिका दुनिया की एलएनजी क्षमता का 41% हिस्सा है जो वर्तमान में विकास के अधीन है. अमेरिकी गैस उत्पादन 2021-2030 के बीच 9% की वृद्धि के रास्ते पर है, फिर भी इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के नेट जीरो उत्सर्जन परिदृश्य के साथ संरेखित करने के लिए इस अवधि में गैस उत्पादन में 25% की गिरावट की आवश्यकता है.
कोयले से अमेरिका का दूर जानाअसलियत में प्राकृतिक गैस के उपयोग में तेजी से मेल खाता है, जो उनके देश में एक सस्ता घरेलू रूप से उपलब्ध संसाधन है. सवाल इस बात का न्ही है कि प्राकृतिक गैस कोयले की तुलना में कम प्रदूषणकारी है, सवाल यह है कि यह भी एक जीवाश्म ईंधन है और इससे उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन रोकने के रास्ते में रूकावट है.
ग्लासगो में COP26 ने जिस कोयले के फेज-डाउन का आह्वान किया था, उससे बहुत दूर, यह एक स्पष्ट फेज-अप है जिसे दुनिया ने इस साल देखा है. यूक्रेन युद्ध द्वारा पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति के बड़े व्यवधान ने जर्मनी को कोयले से चलने वाले संयंत्रों और चीन ने कोयला खनन रिकॉर्ड मात्रा में करने की तरफ जाता देखा है.
हालांकि एनर्जी थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर और इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस की रिपोर्ट में यह कहा है की सौर ऊर्जा का दायरा पूरी दुनिया में बढ़ता जा रहा है. भारत ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जनवरी से जून तक भारत ने सौर ऊर्जा से 4 बिलियन डालर की बचत की है. भारत ने 2022 की पहली छमाही में सौर ऊर्जा उत्पादन के जरिये ईंधन लागत में 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत की है. रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में 19.4 मिलियन टन कोयले की बचत हुई है. इससे पता चलता है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली 10 शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से पांच एशिया में हैं. एशिया में चीन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी बने हुए हैं.
एक तरफ जी 7 देशों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के अनुरूप काम के लिए 2021 के अंत तक गरीब देशों में कोयले से चलने वाले बिजली स्टेशनों के प्रत्यक्ष वित्त पोषण को रोकने के लिए भी सहमति व्यक्त की है. यह निर्णय गरीब देशों में कोयला बिजली में निवेश करने वाले बैंकों को एक स्पष्ट संदेश भी भेजेगा. वहीं दूसरी तरफ जापान ने भले ही G7 के सदस्य के रूप में, कोयले के लिए वित्त पोषण को रोकने का वचन दिया है, जापानी कंपनी सुमिटोमो के पास मोजाम्बिक में एक प्रस्तावित कोयला खदान में 33% हिस्सेदारी है. बात पड़ोसी देश चीन की करें तो वहां योजना में 157 mtpa- मिलियन टन प्रति वर्ष और निर्माणाधीन 452 एमटीपीए- मिलियन टन प्रति वर्ष की क्षमता की कोयला परियोजनाएं हैं.
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए कोयला उत्पादन में 2030 तक हर साल 11% गिरावट होने की आवश्यकता है. वहीं G7 देशों का कोयला आधारित बिजली से हाथ खींचना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगा .
ऐसे हालात में सिर्फ़ भारत पर निशाना साधना गलत है अगर सचमुच दुनिया को जलवायु परिवर्तन के दंश से बचाना है तो जैसा भारत ने प्रस्तावित किया था कुल जीवाश्म ईंधन के उपयोग चाहे वह कोयला हो या तेल या फिर गैस को रोकना होगा और अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो सिर्फ भारत की तरफ उँगली उठाने की जरूरत नहीं है.
लेखक : डॉ सीमा जावेद
(पर्यावरणविद एवं जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा की कम्युनिकेशन एक्सपर्ट)
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