पैसों की कमी से बॉक्सिंग छोड़ने को मजबूर जमशेदपुर के दो सगे भाई, झारखंड को दिला चुके हैं चार राष्ट्रीय पदक

जमशेदपुर के भालूबासा के बॉक्सर दो सगे भाई आर्यन मुखी और इशुनाथ मुखी (बाएं और दाएं). फोटो: प्रभात खबर
Jamshedpur Sports News: जमशेदपुर के भालूबासा के दो सगे भाई आर्यन मुखी और ईशुनाथ मुखी ने झारखंड को चार राष्ट्रीय बॉक्सिंग पदक दिलाए हैं. आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के कारण दोनों खिलाड़ी अब बॉक्सिंग छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं. परिवार मजदूरी पर निर्भर है और उन्हें अब तक कोई मदद नहीं मिली है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.
जमशेदपुर से निसार की रिपोर्ट
Jamshedpur Sports News: झारखंड में जमशेदपुर के भालूबासा इलाके के रहने वाले दो सगे भाई आर्यन मुखी और ईशुनाथ मुखी इन दिनों पैसों की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं. इन दोनों भाइयों ने अपनी प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड का नाम रोशन कर चुके हैं. पिछले एक साल में दोनों भाइयों ने मिलकर राज्य को चार राष्ट्रीय पदक दिलाए हैं. लेकिन, अब वे बॉक्सिंग छोड़ने को मजबूर हैं. इसका कारण यह है कि उन्हें अब तक किसी भी सरकारी संस्था या खेल संघ से आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया है. आर्थिक तंगी के कारण अब दोनों भाई बॉक्सिंग छोड़कर काम करने के बारे में सोच रहे हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर जीत चुके हैं चार पदक
करीब 16 साल के आर्यन मुखी ने वर्ष 2025 में जूनियर नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप और स्कूल नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीता. वहीं उनके छोटे भाई ईशुनाथ मुखी ने भी अपने खेल कौशल का प्रदर्शन करते हुए ओपन सब-जूनियर नेशनल और नेशनल जूनियर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया. इन उपलब्धियों के साथ दोनों भाइयों ने झारखंड को राष्ट्रीय स्तर पर चार पदक दिलाकर राज्य का गौरव बढ़ाया है.
आर्थिक तंगी से जूझ रहा है परिवार
दोनों खिलाड़ियों का परिवार बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर है. उनके पिता मंगलनाथ मुखी ठेका मजदूरी करते हैं और इसी कमाई से सात लोगों के परिवार का पालन-पोषण करते हैं. मां सुनीता देवी गृहिणी हैं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह पिता की मजदूरी पर ही निर्भर है. सीमित आय के कारण परिवार के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता है.
प्रैक्टिस के लिए भी नहीं हैं पर्याप्त संसाधन
आर्यन और ईशुनाथ की प्रतिभा के बावजूद उनके पास बॉक्सिंग की प्रैक्टिस के लिए जरूरी संसाधनों की भारी कमी है. दोनों खिलाड़ियों के पास अच्छे बॉक्सिंग किट तक उपलब्ध नहीं हैं. कई बार उन्हें अपने दोस्तों से किट उधार लेकर या कोच के सहयोग से अभ्यास करना पड़ता है. प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए भी उन्हें उधार लेकर तैयारी करनी पड़ती है.
कोच सूरज की निगरानी में करते हैं अभ्यास
दोनों भाई सीतारामडेरा कम्युनिटी सेंटर में कोच सूरज की निगरानी में नियमित अभ्यास करते हैं. कोच सूरज उनके खेल को बेहतर बनाने के लिए लगातार मार्गदर्शन देते हैं और जितना संभव हो सके उतना सहयोग भी करते हैं. कोच का कहना है कि आर्यन और ईशुनाथ दोनों बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं और अगर उन्हें उचित प्रशिक्षण और संसाधन मिलें तो वे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश के लिए पदक जीत सकते हैं.
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सहयोग नहीं मिलने से टूट रहा सपना
आर्यन और ईशुनाथ का सपना है कि वे देश के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतें और भारत का नाम रोशन करें. लेकिन लगातार आर्थिक संकट और सहयोग की कमी के कारण उनका यह सपना टूटता हुआ नजर आ रहा है. दोनों भाइयों ने बताया कि अगर उन्हें किसी तरह का आर्थिक सहयोग या सरकारी सहायता मिल जाए, तो वे पूरी मेहनत के साथ अपने खेल को आगे बढ़ा सकते हैं. फिलहाल परिवार की स्थिति को देखते हुए वे खेल छोड़कर कोई काम करने के बारे में सोच रहे हैं, ताकि घर की आर्थिक मदद कर सकें. यह कहानी न केवल दो प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले कई खिलाड़ी संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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