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कोरोना से ठीक होने के बाद भी हो रहीं नई बीमारियां, फेफड़ों पर सबसे ज्यादा खतरा

Updated at : 24 Jun 2020 3:51 PM (IST)
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कोरोना से ठीक होने के बाद भी हो रहीं नई बीमारियां, फेफड़ों पर सबसे ज्यादा खतरा

कोरोना के बाद भी लोगों को कई तरह की बीमारियां हो सकती है, जिसमें फेफड़ों से संबंधित बीमारियां प्रमुख हैं

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कोरोना के मामले विश्व में बढ़ते ही जा रहे हैं, लेकिन उतनी ही तेजी से इससे ठीक होने वाले लोगों की संख्या भी है लेकिन कोरोना से ठीक होने के बाद भी लोगों को चैन नहीं मिला है. क्योंकि बहुत लोग इसके बाद फेफड़ों की बीमारी से ज्यादा प्रभावित होते हैं

हेल्थ लाइन की रिपोर्ट के अनुसार इस तरह कोरोना के बाद आने वाले स्टेज को पोस्ट कोविड फाईब्रोसिस करार दिया गया है. जिसमें व्यक्ति फेफड़ों में छेद की समस्या से ज्यादा प्रभावित होता है. जिसे हम एडीआरएस के नाम से जानते हैं. यह तब होता है जब द्रव एल्वियोली नामक फेफड़ों में छोटे वायु थैली में बनता है. यह रक्त प्रवाह में ऑक्सीजन को कम करता है,

पोस्ट फाईब्रोसिस को फेफड़ों की क्षति के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें मरीजों को गंभीर प्रकार की बीमारियों से जूझना पड़ सकता है, इसमें खांसी, सांस की तकलीफ और ऑक्सीजन की आवश्यकता शामिल है. कभी कभी ये बीमारी इतनी घातक होती है कि इसमें मरीजों को किडनी ट्रांसपेलेंट की जरूरत पड़ जाती है.

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क्यों होती है ये बीमारी

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कोरोना वायरस इंसान की इम्यूनिटी सिस्टम को काफी प्रभावित करता है. इस वजह से फेफड़ों में छेद हो जाते हैं. जो केशिका-स्तरीय जहाजों में थक्के का कारण बनता है.

कौन हो सकते हैं इससे सबसे ज्यादा प्रभावित

रिपोर्ट में कहा गया है कि पोस्ट फाईब्रोसिस के बाद जिन लोगों की मौत होती है जिसकी उम्र अधिक होती है. एक रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि कोविड-19 से उन्हीं लोगों की मौत हुई है जिनकी उम्र 85 साल से अधिक है.

इसके अलावा आप इन बीमारी के हो सकते हैं शिकार

एआरडीएस

यानी कि एक्यूट रेसिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम यह एक बेहद तेजी से गंभीर स्थिति में पहुंचने वाली बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के भीतर तरल पदार्थ लीक हो जाता है जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है अथवा सांस लेना पूरी तरह से बंद हो जाता है.

पोस्ट-इन्टेसिव केयर सिंड्रोम’

इस बीमारी से ग्रस्त रोगी में मानसिक, वैचारिक और शारीरिक गिरावट देखने को मिलती है, ऐसे रोगियों को ‘न्यूरोमस्कुलर का भी सामना करना पड़ता है, अर्थात् उसे चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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