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Jharkhand news: गुमला के कुरूमगढ़ थाना से सटे 50 गांवों में मोबाइल नेटवर्क ठप, नक्सलियों का सेफ जोन बना इलाका

Updated at : 03 Dec 2021 9:47 PM (IST)
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Jharkhand news: गुमला के कुरूमगढ़ थाना से सटे 50 गांवों में मोबाइल नेटवर्क ठप, नक्सलियों का सेफ जोन बना इलाका

jharkhand news: गुमला के 50 ऐसे गांव हैं जहां आज भी मोबाइल सेवा ठप है. कारण है नेटवर्क का नहीं होना. इसके कारण जहां नक्सली इन इलाकों को सेफ जोन मानते हैं, वहीं पुलिस समेत ग्रामीणों की परेशानी बढ़ी रहती है. वहीं, छात्रों को ऑनलाइन क्लास से भी वंचित रहना पड़ता है.

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Jharkhand news: झारखंड के गुमला जिला अंतर्गत चैनपुर प्रखंड में कुरूमगढ़ थाना है जो गुमला व घाघरा प्रखंड के सीमावर्ती इलाके में है. लेकिन, कुरूमगढ़ थाना से सटे करीब 50 गांवों में मोबाइल नेटवर्क इनदिनों ठप पड़ गया है. जिससे पुलिस, सीआरपीएफ समेत 20 हजार आबादी प्रभावित है. नेटवर्क के नहीं होने कारण इस क्षेत्र में किसी प्रकार का सूचना आदान-प्रदान नहीं हो पाता है. यही वजह है कि यह क्षेत्र अभी भी भाकपा माओवादी का सेफ जोन बना हुआ है.

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नेटवर्क नहीं रहने से कुरूमगढ़ थाना का संपर्क जिला मुख्यालय व दूसरे थाना से कटा रहता है. अगर नक्सली हमला करे, तो सीनियर पुलिस अधिकारियों तक सूचना पहुंचाने में देरी होती है. यही वजह है कि गत 26 नवंबर को नक्सलियों ने कुरूमगढ़ के नये थाना भवन को बम विस्फोट कर उड़ा दिया था. मोबाइल नेटवर्क नहीं रहने के कारण रात को कुरूमगढ़ थाना को किसी प्रकार की मदद नहीं मिली. 12 घंटे बाद गुमला से अतिरिक्त फोर्स कुरूमगढ़ थाना पहुंची थी.

ग्रामीणों को हो रही अधिक परेशानी

करीब 20 किमी की रेंज में कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं है. पहाड़ पर चढ़कर नेटवर्क खोजना पड़ता है. एक-दो टावर मोबाइल में दिख गया, तो उससे किसी प्रकार बात करते हैं. अभी भी छात्रों का ऑनलाइन क्लास चल रही है. कुरूमगढ़ से सटे सभी 50 गांवों में मोबाइल नेटवर्क नहीं रहने के कारण छात्रों की ऑनलाइन पढ़ाई भी बंद है.

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वहीं मोबाइल नेटवर्क नहीं रहने का फायदा नक्सली उठाते रहते हैं. कुरूमगढ़ से सटे कुछ गांवों में नक्सली सेफ जोन बनाकर रह रहे हैं. कुरूमगढ़ के अलावा कुछ दूरी पर कोरकोटोली व बामदा पुलिस पिकेट भी है. वहां भी मोबाइल टावर नहीं रहने से जवानों को परेशानी होती है.

ऊंचाई पर एक-दो टावर मिलता है, तो बात होती है

थाना से तीन किमी दूरी पर तिगावल खंभनटोली है, जो ऊंचा जगह है. अगर किसी को कोई बात करनी रहती है, तो दिन के उजाले में लोग यहां आते हैं. मोबाइल टावर खोजकर रिश्तेदारों व दोस्तों से बात करते हैं. नक्सल इलाका के कारण रात को इस स्थान पर लोग नहीं आते. द्वारसेनी के पास भी कभी कभार नेटवर्क पकड़ता है.

लेकिन, द्वारसेनी भी खतरनाक जोन है. क्योंकि यहां 20 साल पहले आइइडी ब्लास्ट कर 8 पुलिसकर्मियों को उड़ा दिया गया था. हालांकि, ग्रामीणों की माने तो इस क्षेत्र में एक मोबाइल कंपनी द्वारा तार बिछाने का काम किया जा रहा है. लेकिन, अभी कंपनी ने भी काम बंद करके रखा है.

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ग्रामीण विष्णु लोहरा व विश्वनाथ उरांव ने कहा कि मोबाइल का टावर इस क्षेत्र में नहीं लगा है. इस कारण परेशानी होती है. अगर मोबाइल टावर लग जाये, तो कई काम आसान हो जायेंगे. क्यों टावर नहीं लग रहा है. इसकी जानकारी कोई नहीं देते हैं. प्रशासन व सरकार से अपील है. इस क्षेत्र में कम से कम पांच मोबाइल टावर स्थापित करे, ताकि 20 किमी की रेंज को मोबाइल टावर कवर कर सके और लोगों को परेशानी न हो.

पुलिस जवान : महीनों तक परिवार से नहीं होती बात

कुरूमगढ़ थाना में कार्यरत अधिकारी व पुलिस जवान महीनों तक परिवार व अपने दोस्तों से बात नहीं कर पाते. अगर कभी गुमला या फिर मोबाइल नेटवर्क के रेंज में आते हैं. तब फोन से बात करते हैं. जवानों ने कहा कि मोबाइल नेटवर्क नहीं रहने के कारण काम करने में काफी परेशानी होती है. यह पूरा इलाका जंगली है. पहाड़ों से घिरा है. दिनभर नक्सल के खिलाफ अभियान चलाते हैं. मन की शांति के लिए परिवार से बात करना चाहते हैं. लेकिन, नेटवर्क बाधा बनी हुई है.

गांव जहां नहीं लगता है मोबाइल नेटवर्क

कुरूमगढ़, मनातू, जिरमी, दरकाना, ओरामार, हर्रा, चांदगो, हेठजोरी, पीपी बामदा, कुटवां, सरगांव, लुरू, उरू, बारडीह, सेकराहातू, सिविल, रोरेद, मड़वा, कोचागानी, रोघाडीह, कोरकोटोली, केरागानी, कुइयो, केवना, कोलदा, ऊपर डुमरी, कुकरूंजा, तबेला, घुसरी, सकरा, कोटाम बहेराटोली, पीपी, ठाकुरझरिया, हरिनाखाड़, अंबाटोली, महुआटोली, देवीटोंगरी, कुसुमटोली, बरईकोना, हेंठटोला, ऊपरटोला, बरटोंगरी, असुर टोला व बरटोली सहित 50 गांव है.

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थाना प्रभारी कुरूमगढ़ रूपेश कुमार ने कहा कि मोबाइल नेटवर्क नहीं रहने के कारण काम करने में परेशानी होती है. सूचनाओं का आदान- प्रदान नहीं हो पाता है. उन्होंने कहा कि समस्या तो है, इसके बावजूद पुलिस सतर्कता के साथ मुस्तैद है.

रिपोर्ट: दुर्जय पासवान, गुमला.

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