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फिल्‍म रिव्‍यू : समलैंगिक संबंधों के दर्द को बखूबी बयां करती ''अलीगढ़''

Updated at : 26 Feb 2016 4:48 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू : समलैंगिक संबंधों के दर्द को बखूबी बयां करती ''अलीगढ़''

II उर्मिला कोरी II फिल्म : अलीगढ निर्माता : एरोस इंटरनेशनल ,कर्मा पिक्चर्स निर्देशक : हंसल मेहता कलाकार : मनोज बाजपेयी’, राजकुमार राव, आशीष विद्यार्थी और अन्य रेटिंग : साढ़े तीन निर्देशक हंसल मेहता शाहिद और सिटीलाइट्स के बाद एक बार फिर एक साहसिक विषय पर अपनी फिल्म की कहानी के लिए चुना है. समलैंगिक […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म : अलीगढ

निर्माता : एरोस इंटरनेशनल ,कर्मा पिक्चर्स

निर्देशक : हंसल मेहता

कलाकार : मनोज बाजपेयी’, राजकुमार राव, आशीष विद्यार्थी और अन्य

रेटिंग : साढ़े तीन

निर्देशक हंसल मेहता शाहिद और सिटीलाइट्स के बाद एक बार फिर एक साहसिक विषय पर अपनी फिल्म की कहानी के लिए चुना है. समलैंगिक संबंधों के इर्द गिर्द घूमती अलीगढ़ फ़िल्म की कहानी एक सत्य घटना से प्रेरित है. प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास जिन्हें साल 2010 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था क्योंकि एक रिक्शेवाले के साथ उनके शारीरिक सम्बन्ध थे. उन्हें न सिर्फ कॉलेज से निकाला जाता है बल्कि पूरे शहर में उनका रहना मुश्किल हो जाता है. कोई उनको मकान नहीं देना चाहता है.

एक निजी चैनल के स्टिंग ऑपेरशन के नाम पर उनकी निजता का हनन होता है और उनकी मूल पहचान उनकी सेक्सुअल प्राथमिकता बन जाती है. फिर कुछ लोगों की मदद से वह विश्वविद्यालय के खिलाफ क़ानूनी लड़ाई लड़ते हैं और जीत भी जाते हैं लेकिन एक दिन बाद ही वह अपने कमरे में मृत पाये जाते हैं. फ़िल्म आत्महत्या या हत्या के सवाल को उठाती हुई खत्म हो जाती है. फ़िल्म की कहानी यही है. हंसल की फिल्म समलैंगिक विषय से ज़्यादा इस बात पर फोकस करती है कि किसी की व्यक्तिगतता में हमें झाँकने का क्या अधिकार है?कोई अपने घर की चार दीवारी में क्या करता है?उसकी सेक्सुअल प्राथमिकता क्या है?क्या हमारे लिए वही बात सबसे अहम् है.

उस इंसान के अकेलेपन उसकी तन्हाई उसके साथ अमानवीय बर्ताव को हम क्यों अनदेखा कर जाते हैं. उसे क्यों मज़ाक का तो कभी हमारी नफरत का हम पात्र बनाना पसंद करते हैं. एलजीबीटी कम्यूनिटी के दर्द को हम क्यों नहीं समझते हैं कुलमिलाकर हंसल की यह फ़िल्म व्यक्तिगत निजता की वकालत करती है. हंसल मेहता ने इस फिल्म में भी अपनी सिग्नेचर स्टाइल को कायम रखा है. पूरी फिल्म का ट्रीटमेंट रीयलिस्टिक है.

एक बार फिर हंसल तारीफ के हकदार हैं. फिल्म में एक ही कमी है और वो है इसकी गति।जो बहुत धीमी है. अभिनय की बात करे तो फिल्म में मनोज बाजपेयी ने बहुत उम्दा अभिनय किया है, हर फ्रेम में उन्होंने अपने किरदार की परेशानी, बेबसी, अकेलेपन, दर्द , ख़ुशी को जिया है.

लता मंगेशकर के गानों को सुनते हुए वाले दृश्य हो या इरफ़ान के साथ अंतरंगता वाला साहसिक’सीन. मनोज बेजोड़ रहे हैं. शाहिद और सिटीलाइट के बाद राजकुमार राव और हंसल मेहता की यह तीसरी फ़िल्म है. साउथ इंडियन पत्रकार दीपू के रोल में उन्होंने लाजवाब काम किया है. राजकुमार ने दक्षिण भारतीय लोगों के अंदाज़ में हिंदी बोली को पूरे लहजे के साथ पकड़ा है’.फिल्म के क्लाइमेक्स में उन्होंने इमोशन सीन को बहुत प्रभावी ढंग से पेश किया है. राजकुमार और मनोज के बीच के दृश्य बहुत अच्छे बन पड़े हैं. आशीष विद्यार्थी ने भी अपने किरदार को बखूबी निभाया है.

फिल्म के संगीत की बात करे तो फिल्म में लता मंगेशकर के पुराने दो लोकप्रिय गीतों को प्रयोग में लाया गया है. जो कहानी और भाव को अच्छे से प्रकट करते हैं. बैकग्राउंड स्कोर भी अच्छा बन पड़ा है.फिल्म के सवांद भी कहानी के अनुपरुप प्रभावी हैं प्यार के तीन अक्षर कैसे किसी की भावनाओ को पूरी तरह से व्यक्त करते हैं. गे शब्द पर मनोज के किरदार का सवांद हम हर चीज़ क्यों किसी कैटेगरी में रखना चाहते हैं. फ़िल्म में कविता के माध्यम से भी कई बातें कहीं गयी है.

कुलमिलाकर यह फिल्म एलजीबीटी कम्युनिटी के दर्द को बखूबी बयां करती है और मनोज के बेहतरीन परफॉरमेंस की वजह से फिल्म को देखते हुए हर कोई उस दर्द को महसूस कर सकता है.

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