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#Newton से चुनाव प्रक्रिया को करीब से समझने का मौका मिला : राजकुमार राव

Updated at : 23 Sep 2017 5:58 PM (IST)
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#Newton से चुनाव प्रक्रिया को करीब से समझने का मौका मिला : राजकुमार राव

बॉलीवुड के युवा अभिनेता राजकुमार राव अपनी एक्ट‍िंग और रोल के चुनाव के लिए जाने जाते हैं. बरेली की बर्फी के बाद हालिया रिलीज हुई फिल्म न्यूटन में वह अलग अंदाज में हैं. उनकी यह फिल्म दुनियाभर के फिल्म फेस्टिवल्स में कई अंतराष्ट्रीय अवार्ड्स जीत चुकी हैं. अब यह फिल्म ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व […]

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बॉलीवुड के युवा अभिनेता राजकुमार राव अपनी एक्ट‍िंग और रोल के चुनाव के लिए जाने जाते हैं. बरेली की बर्फी के बाद हालिया रिलीज हुई फिल्म न्यूटन में वह अलग अंदाज में हैं. उनकी यह फिल्म दुनियाभर के फिल्म फेस्टिवल्स में कई अंतराष्ट्रीय अवार्ड्स जीत चुकी हैं. अब यह फिल्म ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी. पेश है राजकुमार राव से उर्मिला कोरी की हुई खास बातचीत के अंश-

न्यूटन फिल्म से किस तरह से जुड़ना हुआ ?
अमित (मसूरकर) को मैं काफी पहले से जानता हूं. वह लव सेक्स और धोखा की मेकिंग बना रहे थे, उस वक्त से मैं उनको जानता हूं. फिल्मों को लेकर उनका पैशन कमाल का है. हम बीच-बीच में कई बार मिलते रहते थे. वह जब फिल्म सुलेमानी कीड़ा से निर्देशक बने, तो भी मुझे पता था. उनकी फिल्म को काफी तारीफें मिली थी. वह फिल्म छोटी थी, लेकिन लोगों को पसंद आयी. न्यूटन की कहानी जब वो मेरे पास लेकर आये, तो उन्होंने कहा कि इस फिल्म की कहानी को उन्होंने मुझे सोच कर ही लिखी है. मुझे फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत पसंद आयी. जिस तरह से ह्यूमर और एक महत्वपूर्ण इश्यू को फिल्म में मिला कर कहा गया है, वह बहुत खास है. मेरे इस फिल्म से जुड़ने की वजह यही है.

यह फिल्म चुनाव पर है. आप इस फिल्म के जरिये उस प्रक्रिया को कितना समझ पाये?
यह बहुत ही बड़ा प्रॉसेस होता है. आसान नहीं है चुनाव कराना. जिस तरह से इलेक्शन कमिशन करवाता है, उनकी जितनी भी तारीफ की जाये, वह कम होगी. देश के कोने-कोने में जाकर वोटिंग करवाना. इस फिल्म के दौरान मुझे मालूम गिल्ड फाॅरेस्ट में एक वोटर के लिए पोलिंग बूथ पर लगाया गया है.

आपका लुक फिल्म में थोड़ा अलग लग रहा है?
हां. मैंने अपने बालों को कर्ली लुक दिया है. एक-एक बाल को करना पड़ता था. ढाई घंटे इस में जाते थे. यह फिल्म एक दिन की कहानी है, इसलिए सुबह छह बजे से शाम के छह बजे तक हम शूटिंग करते थे. अपने बालों को कर्ल करने के लिए मैं ढाई बजे सुबह ही उठ जाता था.

यह फिल्म डेमोक्रेसी की बात करती है. आपके लिए डेमोक्रेसी क्या है?
जो मैं करना चाहता हूं, उसे हां कहने की आजादी और जो नहीं करना चाहता, उसको ना कहने की आजादी. मेरे लिए डेमोक्रेसी का मतलब यही है.

आपने पहली बार कब वोट दिया था?
मैंने गुड़गांव में 18 साल की उम्र में अपना पहला मतदान किया था. अलग ही खुशी थी. एक पावर का एहसास था, क्योंकि आप किसी को चुनने जा रहे थे.

अक्सर यह बात सामने आती है कि आज का युवा बहुत समझदार है. क्या मतदान की उम्र 18 साल से 16 साल कर देनी चाहिए?
मैंने सोचा नहीं इस बारे में. वैसे 18 भी बुरा नहीं है. स्कूल खत्म हो जाता है. थोड़े मैच्योर हो जाते हैं.

फिल्म बरेली की बर्फी में आपने जम कर तारीफें बटोरी हैं. क्या आपको उम्मीद थी लोगों को आपका किरदार इतना पसंद आयेगा?
जब कर रहा था तो पता नहीं था कि लोग पर्दे पर मेरे किरदार को देखकर सीटियां बजायेंगे, तालियां बजायेंगे. हां, फिल्म की शूटिंग में मजा जरूर बहुत आया था. यह फिल्म मैंने आम दर्शकों के साथ मुंबई देखी. जिस तरह से लोग सीटियां बजा रहे थे, तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थी. वह सब देखना खास था.

क्या आपको लगता है कि निजी जिंदगी में भी जब अंडरडॉग विनर बनता है तो एक अलग ही खुशी मिलती है?
हां. यह होता है. मैं खुद एक अंडर डॉग रहा हूं. मेरी फैमिली में से कोई दूर-दूर तक नहीं था. फिल्मों में और आज में यहां पर हूं. काम कर रहा हूं. लोगों का प्यार मिल रहा है. लोग बहुत इंस्पायर होते हैं.

आपने उस फिल्म की सक्सेस को किस तरह से सेलिब्रेट किया?
मैं फिलहाल तो सिर्फ काम करना चाहता हूं. उसके अलावा कुछ और जेहन में नहीं होता है क्योंकि काम ही मुझे सबसे ज्यादा खुशी देता है.

अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म के लिए आपको एक खत भी भेजा है?
हां. हाथ से लिखित एक लेटर मेरे लिए बरेली की बर्फी के बाद उन्होंने भेजा था. वह उनका बड़प्पन है कि वह इस तरह से कलाकारों को मोटिवेट करते हैं. उन्होंने अपने उस लेटर में लिखा कि मेरा काम हमेशा से ही उन्हें पसंद आता रहा है, लेकिन बरेली की बर्फी में उन्हें मेरा काम अद्भुत लगा.

अपने अब तक की जर्नी को कैसे देखते हैं?
मैं खुश हूं कि मैं अपने सपने को जी रहा हूं. इस शहर में हर दिन हजारों लोग एक्टर बनने आते हैं. बहुत कम लोगों को यह मौका मिल पाता है. मैं लगातार फिल्में कर रहा हूं. मैं यह भी कहूंगा कि अभी स्क्रिप्ट ज्यादा आ रही है. बरेली की बर्फी से लोग अब कमर्शियल फिल्मों की भी स्क्रिप्ट लेकर आ रहे हैं. जब तक लोग देखते नहीं हैं, उन्हें विश्वास नहीं होता कि ये कमर्शियल फिल्म में न सिर्फ फिट है, बल्कि फिल्म को अपने कंधे पर उठा भी सकता है. कॉमेडी भी कर सकता है.

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