नुकसान से पहले तैयारी का नियम लागू, बैंकिंग सेक्टर में बदलाव, EMI पर असर संभव
RBI
RBI : आरबीआई के नए ECL फ्रेमवर्क से बैंकों के कैपिटल रेशियो पर 1.20% तक का असर पड़ सकता है. क्रिसिल के मुताबिक, प्रावधान (Provisioning) बढ़ने के बावजूद भारतीय बैंकों की स्थिति मजबूत बनी रहेगी.
RBI : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बैंकों के लिए कर्ज के बदले पैसे सुरक्षित रखने (Provisioning) के नियमों में बड़ा बदलाव करने जा रहा है. अब बैंक Incurred Loss (नुकसान होने के बाद) के बजाय Expected Credit Loss (ECL) यानी ‘अपेक्षित नुकसान’ के आधार पर प्रावधान करेंगे. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का कहना है कि इससे बैंकों के मुनाफे और पूंजी पर असर तो पड़ेगा, लेकिन उनके डूबने का खतरा कम हो जाएगा.
क्या है ECL फ्रेमवर्क और यह क्यों जरूरी है?
अब तक बैंक तब पैसा अलग रखते थे जब कोई लोन डिफॉल्ट हो जाता था. लेकिन नए ECL फ्रेमवर्क के तहत. बैंक को लोन देते समय ही यह अंदाजा लगाना होगा कि भविष्य में कितना नुकसान हो सकता है.
इसे ‘फॉरवर्ड लुकिंग’ मॉडल कहा जाता है, जिससे बैंक किसी भी आर्थिक संकट के लिए पहले से तैयार रहेंगे. यह भारतीय बैंकिंग नियमों को ग्लोबल मानकों (Global Standards) के बराबर लाएगा.
बैंकों की सेहत पर कितना पड़ेगा असर?
क्रिसिल रेटिंग्स के मुताबिक, इस बदलाव से बैंकों के CET-1 रेशियो (पूंजी की मजबूती मापने का पैमाना) पर 120 बेसिस पॉइंट्स (1.20%) तक का असर पड़ सकता है. आरबीआई ने इस झटके को सहने के लिए बैंकों को 4 साल का समय दिया है. यानी बैंक इस प्रभाव को धीरे-धीरे अपनी बैलेंस शीट में दिखा सकते हैं. भारतीय बैंकों के पास फिलहाल पर्याप्त पूंजी (करीब 14% CET-1 रेशियो) है, इसलिए वे इस बदलाव को आसानी से झेल लेंगे.
लोन लेने वालों और बैंकों के लिए चुनौतियां
क्रिसिल की डायरेक्टर शुभा श्री नारायणन और एसोसिएट डायरेक्टर वाणी ओजस्वी ने कुछ अहम बातें बताईं.
- क्रेडिट कॉस्ट बढ़ेगी: बैंकों को अब नए लोन के लिए ज्यादा पैसा रिजर्व में रखना होगा, जिससे उनकी लागत बढ़ सकती है.
- मुनाफे पर दबाव: बैंकों को अपना मुनाफा बनाए रखने के लिए ऑपरेटिंग खर्चों को कम करना होगा और ब्याज दरों (Net Interest Margins) पर ज्यादा ध्यान देना होगा.
- ऑफ-बैलेंस शीट पर भी नजर: अब बैंकों को उन क्रेडिट लिमिट्स के लिए भी प्रावधान करना होगा जो अभी तक ग्राहकों ने इस्तेमाल नहीं की हैं.
कब से लागू होंगे नियम?
आरबीआई के ये नए दिशा-निर्देश 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे. बैंकों को तीन चरणों (Stage I, II, III) में अपनी संपत्तियों का वर्गीकरण करना होगा, जो इस आधार पर होगा कि लोन के डूबने की कितनी संभावना है.
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