Kisan Diwas 2022: देश में दशक दर दशक घटते गये किसान, बढ़ते गये कृषि श्रमिक, क्या रही वजह?

Updated at : 23 Dec 2022 12:42 PM (IST)
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Kisan Diwas 2022: देश में दशक दर दशक घटते गये किसान, बढ़ते गये कृषि श्रमिक, क्या रही वजह?

कृषकों की बात करें, तो यह वर्ष 2001 की तुलना में 9.3% कम हुए. वहीं, कृषि श्रमिकों की संख्या में 9.3% की वृद्धि दर्ज की गयी. कृषि क्षेत्र में कुल श्रम बल में 3.6% की गिरावट आयी. इस तरह देखेंगे, तो हम पायेंगे कि वर्ष 1971 में कृषकों की संख्या 62.2 फीसदी थी, जो वर्ष 2011 में घटकर 45.1 फीसदी रह गयी.

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Kisan Diwas 2022: भारत 23 दिसंबर को राष्ट्रीय किसान दिवस मना रहा है. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और बड़े किसान नेता चौधरी चरण सिंह की जयंती (Chaudhary Charan Singh Birth Anniversary) को देश में हर साल राष्ट्रीय किसान दिवस (National Farmers Day) के रूप में मनाया जाता है. देश में खेती-किसानी और किसानों के बारे में बड़ी-बड़ी बातें होतीं हैं. हर राजनीतिक दल किसानों का हमदर्द होने का दावा करता है. लेकिन, किसानों की दशा में ज्यादा सुधार नहीं आया. चौधरी चरण सिंह के समय में किसानों की जो समस्याएं थीं, कमोबेश उनकी समस्याएं आज भी वही हैं. आजादी के बाद खेती-किसानी इतनी मुश्किल हो गयी कि कृषि प्रधान देश भारत के कृषकों ने खेती-बाड़ी छोड़कर कृषि श्रमिक बनना स्वीकार कर लिया.

1971 में भारत में थे 62.2 फीसदी किसान

भारत में आजादी के बाद किसानों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. वहीं, कृषि श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है. वर्ष 1971 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश की आबादी उस वक्त 54.82 करोड़ थी. उस वक्त 80.1 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती थी. 18.04 करोड़ कामगार देश में थे. इनमें से 7.82 करोड़ यानी 62.2 फीसदी कृषक थे. वहीं, 4.75 करोड़ कृषि श्रमिक थे, जो कुल वर्क फोर्स का 37.8 फीसदी था. इस तरह कृषि क्षेत्र में 69.7 फीसदी यानी 12.57 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे.

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2001 के बाद कृषकों की संख्या में आयी बड़ी गिरावट

नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (NITI) आयोग के सदस्य (कृषि) प्रो रमेश चंद ने एक लेक्चर में यह जानकारी दी. उन्होंने वर्ष 1971 से 2011 तक की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बताया कि वर्ष 2001 के बाद कृषकों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गयी, जबकि कृषि श्रमिकों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ.

1981: मामूली रूप से बढ़े कृषक, कृषि श्रमिकों में आयी गिरावट

वर्ष 1981 की जनगणना में भारत की आबादी 88.33 करोड़ हो चुकी थी. उस वक्त ग्रामीण आबादी घटकर 76.9 फीसदी (52.56 करोड़) रह गयी. कुल कामगारों का आंकड़ा बढ़कर 24.46 करोड़ हो गया. इनमें से 9.25 करोड़ (62.5 फीसदी) कृषक थे. कृषि श्रमिकों की संख्या बढ़कर 5.55 करोड़ (37.5 फीसदी) हो गयी. कुल मिलाकर कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की संख्या 14.8 करोड़ (60.5 फीसदी) हो गयी. इस दशक में कृषकों की संख्या में मामूली 0.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी, जबकि कृषि श्रमिकों की संख्या में 0.3 फीसदी की गिरावट आयी. हालांकि, कुल कृषि कामगारों की बात करें, तो इसमें 9.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी.

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गांवों की रहने वालों की संख्या में 2.4 फीसदी की गिरावट

प्रो रमेश चंद ने अपने लेक्चर में कहा था कि वर्ष 1991 में हमारे देश की आबादी 84.64 करोड़ हो गयी. इसमें गांवों की आबादी 63.06 करोड़ (74.5 फीसदी) थी. यह पिछले दशक की तुलना में 2.4 फीसदी कम थी. कुल कामगारों की संख्या बढ़कर 31.41 करोड़ हो गयी. इसमें कृषक 11.07 करोड़ (59.7 फीसदी) और कृषि श्रमिक 7.46 करोड़ (40.3 फीसदी) हो गये. कुल कृषि कामगारों (कृषि और कृषि श्रमिक दोनों) की बात करें, तो यह आंकड़ा 18.53 करोड़ (59 फीसदी) हो गया.

10 साल में 2.8 फीसदी घटे किसान

इस तरह 1981 और 1991 के बीच कृषकों की संख्या 2.8 फीसदी घट गयी, जबकि कृषि श्रमिकों की संख्या में 2.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी. वहीं कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या 60.5 फीसदी से घटकर 59 फीसदी रह गयी. यानी इस वर्ग के लोगों की संख्या में 1.5 फीसदी की गिरावट एक दशक में दर्ज की गयी.

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वर्ष 2001 में देश की आबादी हो गयी 100 करोड़ के पार

वर्ष 2001 में देश की आबादी पहली बार एक अरब के पार हुई. तब हमारी संख्या 102.87 करोड़ थी. इस दौरान गांवों की आबादी 74.26 करोड़ और कामगारों की संख्या 40.22 हो गयी. इनमें 12.73 करोड़ (54.4 फीसदी) कृषक और 10.68 करोड़ (45.6 फीसदी) कृषि श्रमिक थे. कुल कृषि कामगारों का आंकड़ा 23.41 करोड़ (58.2 फीसदी) हो चुका था. इस तरह कृषकों की संख्या में 5.3 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गयी, तो कृषि श्रमिकों की संख्या में इतनी ही वृद्धि देखी गयी. इसके आधार पर प्रो रमेश चंद ने कहा कि शायद 5.3 फीसदी किसान कृषि श्रमिक बन गये होेंगे. बहरहाल, 1991 और 2001 के बीच कृषि क्षेत्र में वर्क फोर्स में 0.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी.

क्या कहते हैं कि वर्ष 2011 के सर्वे के आंकड़े

देश में पिछली बार वर्ष 2011 में सर्वे हुआ था. तब हमारी आबादी 102.87 करोड़ से बढ़कर 121.08 करोड़ हो गयी. गांवों की आबादी 83.37 करोड़ (68.9 फीसदी) हो गयी. कामगारों की संख्या 48.17 करोड़ तक पहुंच गयी. इनमें 11.88 करोड़ (45.1 फीसदी) कृषक और 14.43 करोड़ (54.9 फीसदी) कृषि श्रमिक थे. इस तरह कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कुल लोगों की संख्या 26.31 करोड़ (54.6) फीसदी रह गयी.

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5 दशक में 17.1 फीसदी घटे किसान, इतने ही कृषि श्रमिक बढ़े

कृषकों की बात करें, तो यह वर्ष 2001 की तुलना में 9.3 फीसदी कम हुए. वहीं, कृषि श्रमिकों की संख्या में 9.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी. कृषि क्षेत्र में कुल श्रम बल में 3.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी. इस तरह देखेंगे, तो हम पायेंगे कि वर्ष 1971 में कृषकों की संख्या 62.2 फीसदी थी, जो वर्ष 2011 में घटकर 45.1 फीसदी रह गयी. यानी इसमें 17.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी. वहीं, कृषि श्रमिकों का आंकड़ा तब 37.8 फीसदी था, जो अब बढ़कर 54.9 फीसदी हो गया है. इसमें 17.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है. दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कुल लोगों की संख्या वर्ष 1971 में 69.7 फीसदी थी, जो वर्ष 2011 में 15.1 फीसदी घटकर 54.6 फीसदी रह गयी.

गैर-कृषि क्षेत्र के विकास ने किसानों को दिया रोजगार

प्रो रमेश चंद कहते हैं कि वर्ष 2001 के बाद कृषि क्षेत्र में चीजें बिगड़ने लगीं. बड़े पैमाने पर कृषक कृषि से मुंह मोड़ने लगे. खेती-किसानी में जब मुश्किलें बढ़ने लगीं, तो उन्होंने खेती-बाड़ी करना छोड़ दिया. जिन किसानों ने खेती करना छोड़ दिया, उन्हें मजबूरी में कृषि श्रमिक बनना पड़ा. यही वजह है कि वर्ष 2001 के बाद किसानों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गयी. दूसरी तरफ, उतनी ही तेजी से कृषि श्रमिकों की संख्या में इजाफा भी हुआ. उन्होंने कहा कि वर्ष 2001 से 2011 के बीच गैर-कृषि क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ. इसी क्षेत्र ने कृषि क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से लोगों को सहारा दिया. उन्हें खेती से इतर भी रोजगार मिला.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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