DoT ने ऑयल इंडिया से मांगा 48,000 करोड़ रुपये का बकाया, कंपनी टीडीसैट में देगी चुनौती

Updated at : 20 Jan 2020 6:57 PM (IST)
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DoT ने ऑयल इंडिया से मांगा 48,000 करोड़ रुपये का बकाया, कंपनी टीडीसैट में देगी चुनौती

नयी दिल्ली : दूरसंचार विभाग ने ऑयल इंडिया से पिछले वैधानिक बकाया के रूप में 48,000 करोड़ रुपये की मांग की है. हालांकि, देश की इस दूसरी सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी का मांग नोटिस को दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीसैट) में चुनौती देने की योजना है. सुप्रीम कोर्ट के सरकारी बकाये के […]

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नयी दिल्ली : दूरसंचार विभाग ने ऑयल इंडिया से पिछले वैधानिक बकाया के रूप में 48,000 करोड़ रुपये की मांग की है. हालांकि, देश की इस दूसरी सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी का मांग नोटिस को दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीसैट) में चुनौती देने की योजना है.

सुप्रीम कोर्ट के सरकारी बकाये के भुगतान में गैर-दूरसंचार आय को शामिल करने के आदेश के बाद दूरसंचार विभाग ने ऑयल इंडिया से ब्याज और जुर्माना समेत मूल बकाया 48,000 करोड़ रुपये का भुगतान करने को कहा है. कंपनी के आंतरिक संचार कार्य के लिए ऑप्टिक फाइबर के उपयोग को लेकर यह राशि मांगी गयी है. जो बकाया राशि मांगी गयी है, वह ऑयल इंडिया के शुद्ध नेटवर्थ की दोगुनी है.

ऑयल इंडिया के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक सुशील चंद्र मिश्रा ने यहां कहा कि हमें 23 जनवरी तक भुगतान करने के लिए नोटिस मिला है. हमारी इसे टीडीसैट में चुनौती देने की योजना है. गेल इंडिया के बाद ऑयल इंडिया सार्वजनिक क्षेत्र की दूसरी तेल एवं गैस कंपनी है, जिससे सांविधिक बकाया राशि को लेकर नोटिस दिया गया है. गैस कंपनी गेल से विभाग ने 1.72 लाख करोड़ रुपये की मांग की है.

मिश्रा ने कहा कि उनकी कंपनी का दूरसंचार विभाग के साथ अनुबंध है. उसके तहत कोई भी विवाद होने पर मामले को टीडीसैट में ले जाने की व्यवस्था है. इसलिए कंपनी मामले में न्यायाधिकरण से संपर्क करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा है कि जिन कंपनियों ने सरकार द्वारा आवंटित स्पेक्ट्रम या रेडियो तरंग का उपयोग करते हुए दूरसंचार कारोबार से इत्तर आय प्राप्त की है, उस पर वैधानिक बकाये का आकलन करते हुए विचार किया जाना चाहिए.
इस पर दूरसंचार विभाग ने पिछले 15 साल में संबंधित कंपनी की आय का आकलन कर उससे राशि की मांग की है. सूत्रों ने कहा कि ओआईएल जैसी कंपनियां तेल एवं गैस पर उत्पाद शुल्क, तेल विकास उपकर, पेट्रोलियम पर होने वाले लाभ तथा अन्य शुल्क सरकार को देती हैं. वे आय प्राप्त करने के लिए बाहरी पक्षों के साथ बैंडविद्थ का कारोबार नहीं करतीं. ऑप्टिक फाइबर का उपयोग केवल आंतरिक संचार में होता है. इसमें कुओं की निगरानी और उत्पादन नियंत्रण शामिल हैं.

हालांकि, ऑयल इंडिया इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट नहीं जा रही, क्योंकि कंपनी शीर्ष अदालत में चले इस मुकदमे में शामिल नहीं थी. साथ ही, अदालत से उसे कोई निर्देश भी नहीं मिला है. सूत्रों ने कहा कि विभाग ने गेल से 1,72,655 करोड़ रुपये की मांग की है, जो उसके नेटवर्थ का तीन गुना से अधिक है. भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसी दूरसंचार कंपनियों को सरकार के लाइसेंस और स्पेक्ट्रम से गैर-दूरसंसार राजस्व प्राप्त हुए हों, लेकिन गेल तथा ओआईएल के साथ ऐसा नहीं है.

दूरसंचार विभाग ने पिछला वैधानिक बकाये के रूप में दूरसंचार कंपनियों से 1.47 लाख करोड़ रुपये की मांग की है. गेल तथा ओआईएल के अलावा विभाग ने 40,000 करोड़ रुपये पावर ग्रिड से भी मांगे हैं. कंपनी के पास राष्ट्रीय लंबी दूरी के साथ-साथ इंटरनेट लाइसेंस हैं.

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