जीएसटी को लेकर उठने लगे सवाल, सरकार ने GST के प्रोपेगेंडा पर खर्च किये करोड़ों, मगर नहीं की तैयारी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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नयी दिल्लीः भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू होने के करीब पांच दिन बाद ही इसे लेकर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किये जाने लगे हैं. देसी-विदेशी अर्थशास्त्रियों, मीडिया आैर विपक्ष के नेता के अलावा आम आदमी में भी इस बात की चर्चा जोरों पर है कि सरकार ने जीएसटी को लागू करने के पहले उसके प्रचार-प्रसार पर लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिया, लेकिन उसे लागू करने के पहले सरकार की आेर से माकूल तैयारी नहीं की गयी. इतना ही नहीं, जीएसटी लागू होने के पहले देश में काम कर रही र्इ-काॅमर्स कंपनियों ने जीएसटी के नाम पर अपने गोदामों में पड़ी पुरानी चीजों को निकालने के लिए ग्राहकों को भारी छूट देने का आॅफर भी जमकर दिया. आलम यह कि देश के विभिन्न शहरों के माॅल्स आदि में तो कर्इ चीजों पर अब भी छूट का भारी आॅफर दिया जा रहा है.

कंपनियों ने छूट के नाम पर जीएसटी को जमकर भुनाया

इसके साथ ही, छूट का आॅफर देने के मामले में वाहन निर्माण उद्योग से जुड़ी कंपनियों ने भी कोर्इ कसर बाकी नहीं रखी. उन्होंने भी जीएसटी लागू होने के ठीक दो-तीन पहले से अपने पुराने माॅडलों को निकालने के लिए ग्राहकों को छूट का आॅफर देना शुरू कर दिया था. कर्इ कंपनियों ने तो जीएसटी परिषद की आेर से इसकी दरों की घोषणा करने के बाद से ही छूट देना शुरू कर दिया था. मजे की बात यह है कि इन कंपनियों ने हर साल बरसात के मौसम में गोदाम में पड़े सामानों को छूट पर निकालने की प्रक्रिया भी जीएसटी के नाम पर जमकर भुनाया.

इसके अलावा, सरकारी स्तर पर जीएसटी को लागू करने के पहले देश के विभिन्न प्रचार माध्यमों से पूरे जोर-शोर के साथ इसका प्रचार-प्रसार किया गया. सरकार आैर सरकार समर्थित उद्योग जगत की आेर से जीएसटी को लेकर पहले से प्रचारित प्रोपेगेंडा के बावजूद इसे लागू करने के पहले तैयारियां पूरी नहीं की गयीं.

अभी तक विकसित नहीं हुआ है साॅफ्टवेयर

इस बात की चर्चा जोरों पर है कि सरकार ने जीएसटी को लागू कर तो दिया, लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए अभी तक माकूल तरीके से इसके साॅफ्टवेयर को विकसित ही नहीं किया गया है. कहा यह जा रहा है कि इसका साॅफ्टवेयर आगामी 15 जुलार्इ से पहले विकसित नहीं किया जा सकता है. हालांकि, इसके विकसित किये जाने को लेकर काम जोरों पर है. इसके साथ ही, चर्चा इस बात की भी है कि जीएसटी लागू होने के बाद देश के बाजारों आैर कारोबारियों को अपने-अपने व्यवसाय को व्यवस्थित करने में करीब तीन महीने से अधिक का समय लगेगा.

सरकार की मंशा पर ही उठ रहे सवाल

इन सबके अतिरिक्त देसी-विदेशी मीडिया, अर्थशास्त्रियों आैर नेताआें की आेर से जो सबसे अहम सवाल खड़े किये जा रहे हैं, वह यह कि भारत सरकार ने जीएसटी के रूप में एक बेहतरीन आर्थिक सुधार को जटिल तरीके से पेश किया है. बीती एक जुलार्इ को देश में जीएसटी लागू होने के साथ ही विदेशी मीडिया में शुमार बीबीसी हिंदी ने इसकी जटिलता आैर सरकार की मंशा को लेकर कहा था कि भारत में सरकार की आेर से लागू किया गया जीएसटी वहां के आम गरीब आदमी के लिए जजिया टैक्स से कम नहीं है. इसके अलावा, बुधवार को चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भी टिप्पणी की है कि भारत सरकार को जीएसटी के क्रियान्वयन के लिए चीन जैसे सशक्त नेतृत्व आैर दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है.

बेहतरीन आर्थिक सुधार को जटिल बनाकर किया गया लागू

इतना ही नहीं, दुनिया के एक प्रमुख अर्थशास्त्रियों में शुमार गाय सोरमन ने कहा है कि भारत ने जीएसटी के रूप में एक अच्छा आर्थिक सुधार जटिल तरीके से लागू किया है, जिससे गड़बड़ियां और धोखाधड़ी बढ़ेंगी. उन्होंने कहा कि ज्यादातर देश जो इस तरह की कराधान व्यवस्था को लागू करते हैं, वे मुख्य रूप से तीन दर आम जरूरत के उत्पाद, लग्जरी और अन्य उत्पादों के लिए इनके बीच की दर रखते हैं. फ्रांस के इस अर्थशास्त्री ने कहा कि भारत में जीएसटी की कई दरों की वजह से गड़बड़ियां और धोखाधड़ी बढेंगी.

जीएसटी की निचली दर से नहीं बढ़ेगी उत्पादकता आैर आर्थिक वृद्धि

सोरमन ने कहा कि एक निचली जीएसटी दर से उत्पादक कुछ ऐसे उत्पादों तथा सेवाओं की ओर जायेंगे, जिनसे उत्पादकता और वृद्धि नहीं आयेगी. निचली कर दर का लाभ लेने के लिए किसी उत्पाद को गलत नाम से लाने की आशंका भी पैदा होगी. उन्होंने कहा कि यह मेरी समझ से बाहर है कि क्यों भारत में इतना अच्छा सुधार जटिल तरीके से लागू किया गया है. सोरमन ने कहा कि बाजार का एकीकरण एक सकारात्मक कदम है और इससे वृद्धि दर में एक साल में एक से दो प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी. हालांकि, उन्होंने कहा कि इसे समझने और ठीक तरीके से लागू करने में कई वर्ष लग जायेंगे.

जीएसटी के सरलीकरण पर ध्यान देने की दरकार

दुनिया के एक अन्य अर्थशास्त्री जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र और कारोबार के प्रोफेसर प्रवीण कृष्णा ने कहा कि भारत के कुल आर्थिक विकास की दृष्टि से जीएसटी काफी महत्वपूर्ण है. कृष्णा ने कहा कि वस्तु की आवाजाही में सीमा जांच चौकियां एक प्रमुख अड़चन थीं. अब दिल्ली, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सहित 22 राज्यों ने इन जांच चौकियों को हटा दिया है. इसी तरह की राय जताते हुए वित्त मंत्रालय में पूर्व प्रमुख आथर्कि सलाहकार इला पटनायक ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर जीएसटी की समान दरें और समान कानून देश के लिए एक बड़ा कदम है, लेकिन सरकार दीर्घावधि में जीएसटी परिषद कर प्रणाली के सरलीकरण पर काम करेगी.

लागू करने के तरीके पर भी उठे थे सवाल

इसके पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने जीएसटी पर दिये अपने बयान में कहा था कि वह जीएसटी के विरोध में नहीं है, लेकिन वे इसे लागू करने के लिए सरकार की आेर से आजमाये जा रहे प्रोपेगेंडा के खिलाफ हैं. उन्होंने अपने बयान में कहा था कि सरकार जीएसटी को आजादी की घोषणा की तरह जो पेश कर रही है, वह गलत है. आजादी के 25, 50 या 70 साल बीत जाने के बाद इस तरह का प्रोपेगेंडा खड़ा करना समझ से परे है.

क्रियान्वयन की अब कर रही तैयारी

जहां तक सरकार की तैयारियों की बात है, तो सरकार ने पहले आनन-फानन में जीएसटी लागू करने का काम किया है, उसके बाद वह इसके क्रियान्वयन को लेकर तैयारी करने में जुटी है. इसी का नतीजा है कि सरकार की आेर से मंगलवार को देश के मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से जोड़ने तथा किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड को जारी करने की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा करने के लिए प्रदेशों के कृषि मंत्रियों की बैठक बुलायी थी.

अभी तक ढंग से र्इ-नाम के साथ जुड़ भी नहीं पायी हैं देश की मंडिया

सरकारी आंकड़ों पर यदि गौर करें, तो अप्रैल, 2016 में शुरू किये गये ई-नाम के राष्ट्रीय वेब पोर्टल के साथ अब तक केवल 13 राज्यों की 455 मंडियों को ही जोड़ा गया है. इसमें करीब 47 लाख किसानों और 91,000 व्यापारियों का पंजीकरण है. गौर करने वाली बात यह भी है कि सरकार ने इस ई-नाम के साथ 31 मार्च, 2018 तक देश के करीब 585 मंडियों को जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इतना ही नहीं, देश भर में 14 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड को जारी करने के लक्ष्य के मुकाबले अभी तक देश के करीब नौ करोड़ किसानों को ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये गये हैं, जबकि इस योजना की शुरुआत फरवरी, 2015 में ही कर दी गयी थी.

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