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एक ही बोतल में...

Updated at : 01 Jul 2019 6:07 AM (IST)
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एक ही बोतल में...

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranika@gmail.com चालू विश्वविद्यालय में एक देश, एक वोट विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इस प्रतियोगिता में विजयी निबंध इस प्रकार है- एक देश, एक वोट नामक योजना देश के लिए, देश के टीवी चैनलों के लिए, टेंट हाउस वालों के लिए, शराब कारोबार के लिए, चाय कारोबार के […]

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
चालू विश्वविद्यालय में एक देश, एक वोट विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इस प्रतियोगिता में विजयी निबंध इस प्रकार है- एक देश, एक वोट नामक योजना देश के लिए, देश के टीवी चैनलों के लिए, टेंट हाउस वालों के लिए, शराब कारोबार के लिए, चाय कारोबार के लिए, पत्रकारों के लिए, एक्सपर्ट लोगों के लिए और रोजगार अवसरों के लिए घणी ही घातक योजना है.
वोट होता है, तो मुल्क में तो कई तरह से रौनक लगती है. स्थानीय निकाय का चुनाव हो, तो कैंडीडेट कतिपय लोगों को खुश करने का प्रयास करता है, कई लोग मदिरा से खुश होते हैं, तो उन्हें बोतल मुहैया करायी जाती है.
स्थानीय चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव आते हैं, तो फिर बोतल मिलती है. फिर लोकसभा चुनाव आ गये, तो फिर बोतल. एक चुनाव एक बोतल, तीन चुनाव तीन बोतल- बहुत सिंपल गणित है यह. एक ही बार में सारे चुनाव हो जाएं, तो बोतल वितरण में व्यवधान हो जायेगा.
जैसे एक देश एक वोट के फंडे के तहत अगर सारे राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव और लोकसभा के चुनाव एक साथ करा लिये गये, तो एक ही बोतल में विधानसभा और लोकसभा चुनाव निबट जायेंगे. चुनाव दो, बोतल एक? बहुत नाइंसाफी है, यह बात शोले फिल्म के वीरू स्टाइल में बोली जा सकती है, पर बात सिर्फ इतनी नहीं है.
विधानसभा के चुनाव में भाषण रैली के लिए टेंट गड़ते हैं, उनसे रोजगार पैदा होता है. फिर लोकसभा चुनावों में टेंट गड़ते हैं, उनसे रोजगार पैदा होता है.
हर चुनाव के लिए अलग-अलग बोतल हो, तो शराब निर्माता कंपनियों को धंधा मिलता है. अगर शराब कारोबारी विजय माल्या न हो, तो शराब कारोबार भारतवर्ष में ही रहने, खाने और पीने के अच्छे अवसर दिला सकता है. बहुत संभव है कि विजय माल्या लंदन से यह बयान जारी कर दें कि एक देश एक वोट के खिलाफ ही वह विदेश चले गये हैं!
चुनावी डिबेट में घणे एक्सपर्ट लोगों की जरूरत होती है. आम तौर पर तमाम टीवी एक्सपर्ट लोगों को ऐसी खबरों पर बोलना होता है- मुर्दे की गिरफ्तारी या मुर्गा बाइसवीं मंजिल से कूदा. चुनावी दिनों में एक्सपर्ट लोगों के पास इस किस्म की सार्थक बहस के मौके रहते हैं- वह कैंडीडेट तो उदार ही माना जायेगा, जिसने अफसरों को बैट से पीटा या वह कैंडीडेट ज्यादा वीर माना जाये, जिस पर बीस हत्याओं के आरोप हैं?
एक्सपर्ट लोग चुनावी दिनों में मुर्गे और मुर्दे, भूत और नागिनों पर नहीं, बल्कि नेताओं पर डिबेट करते हैं. हालांकि, भूतों और नेताओं में कई मामलों में कम-से-कम एक तो समानता है, दोनों दिखायी कम ही लोगों को पड़ते हैं. तो कुल मिला कर, टीवी एक्सपर्ट लोगों को सार्थक विमर्श के मौके मिलते हैं, अलग-अलग चुनाव होने पर.
इसलिए एक बोतल एक चुनाव का सिद्धांत ही समीचीन है, अर्थव्यवस्था के सम्यक विकास के लिए सारे चुनाव एक बार में न हों, उन्हें अलग-अलग ही आयोजित किये जाएं.
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