अगर ट्रंप ने ईरान पर हमला किया, तो पूरी दुनिया में मचेगा हाहाकार, विशेषज्ञों की अल्टीमेट वार्निंग

ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से क्षेत्रीय और वैश्विक परमाणु प्रतिक्रिया का खतरा.
US military Attack on Iran: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को धमकी दे रहे हैं. अमेरिकी नेवी का जहाज यूएसएस अब्राहम लिंकन पर्शियन गल्फ के पास पहुंच चुका है. लेकिन अमेरिका की ईरान पर हमला करने की गलती पूरी दुनिया में परमाणु हथियारों की रेस शुरू कर सकता है.
US military Attack on Iran: आज की वैश्विक राजनीति में ईरान को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के रुख ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का एक नया संकट खड़ा कर दिया है. खासकर जब अमेरिका ईरान पर सैन्य हमले की तैयारी कर रहा है, तो इसके असर सिर्फ पश्चिम एशिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में नजर आ सकते हैं. खासकर परमाणु हथियारों के प्रसार (nuclear proliferation) को लेकर. 28 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी कि अगर तेहरान अमेरिका की शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तो उस पर ‘तेजी से’ हमला किया जा सकता है.
इस खतरे को जाहिर करने के लिए अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और कई युद्धपोत, बमवर्षक तथा लड़ाकू विमान ईरान के पास तैनात कर दिए हैं. अमेरिका की मुख्य मांगों में शामिल हैं- ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना, बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास पर रोक लगाना और ईरान द्वारा हमास, हिज्बुल्लाह तथा हूती जैसे चरमपंथी समूहों को समर्थन देना बंद करना.
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर अर्थव्यवस्था और सरकार विरोधी प्रदर्शनों से जूझ रहा ईरान इन दबावों से गंभीर परिणामों का सामना कर सकता है. ईरान के पास परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता मौजूद है, लेकिन उसने अब तक ऐसा कदम नहीं उठाया है. अगर उस पर हमला होता है, तो यह संदेश जाएगा कि संयम बरतना और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना भी सुरक्षा का पक्का तरीका नहीं है.
ईरान एक मजबूत राष्ट्र है. वहाँ की संस्थाएं 47 साल से ज्यादा समय से गहराई से स्थापित हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 28 जनवरी को स्वीकार किया कि अगर ईरानी सरकार गिरती भी है, तो आगे क्या होगा, ‘इसका कोई आसान जवाब नहीं है.’
ईरान कमजोर या जल्दी ढहने वाला देश नहीं है. लगभग 9.3 करोड़ (93 मिलियन) लोग वहाँ रहते हैं. उसकी सुरक्षा व्यवस्था में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स जैसी सेनाएं बहुत प्रभावशाली हैं. सत्ता परिवर्तन से न केवल राजनीतिक हालात अनिश्चित होंगे, बल्कि परमाणु सामग्री और विशेषज्ञों पर नियंत्रण कमजोर होने, तकनीक के फैलने और हथियार कार्यक्रम को तेज करने का जोखिम भी बढ़ जाएगा.
इतिहास में ऐसे उदाहरण कई हैं. 2003 में लीबिया ने अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ दिया, फिर भी बाद में उस पर सैन्य कार्रवाई हुई. 1994 में यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार त्याग दिए, मगर उसके बावजूद उसे विदेशी आक्रमण का सामना करना पड़ा. जून 2025 में ईरान पर हुए हमलों ने यह धारणा मजबूत की कि सिर्फ एक सीमित स्थिति में बने रहना भी पूरी सुरक्षा नहीं देता.
यदि सैन्य कार्रवाई होती है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय परमाणु निगरानी संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ेगा. निरीक्षण और निगरानी का काम बाधित होगा, जिससे यह संदेश जाएगा कि नियमों का पालन करना भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है.
इसका असर सिर्फ क्षेत्र तक नहीं रहेगा; इसके वैश्विक प्रभाव भी हो सकते हैं. सऊदी अरब पहले ही कह चुका है कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो वह भी ऐसा करेगा. तुर्की ने भी अपनी अलग परमाणु क्षमता पाने में दिलचस्पी दिखाई है. एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर फिर से विचार कर सकते हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो इससे अमेरिका का क्षेत्र में प्रभाव बढ़ने की बजाय घट सकता है. सबसे बड़ा खतरा यह है कि दुनिया के कई देश यह मान सकते हैं कि असली सुरक्षा केवल परमाणु हथियारों के पास होने से ही संभव है. ऐसे में परमाणु हथियारों का फैलाव और तेज हो सकता है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा संकट साबित हो सकता है.
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लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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