नेपाली रुद्राक्ष के शौकीन, हो जाएं सावधान! धड़ाधड़ हो रहा केमिकल का यूज, चीन के लालच ने आस्था के रंग में डाला भंग
भारत में भगवान शिव के प्रति आस्था के कारण रुद्राक्ष की भारी मांग रहती है. फोटो- कैनवा.
Nepal Rudraksha: नेपाल में रुद्राक्ष का कारोबार चीन की बढ़ती मांग के कारण अरबों रुपये के उद्योग में बदल गया है. लेकिन आकर्षक रुद्राक्ष उगाने के लिए किसानों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे रसायन अब पेड़ों और बीजों की गुणवत्ता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं.
Nepal Rudraksha: नेपाल के पूर्वी पहाड़ी इलाकों में उगने वाला रुद्राक्ष मुख्य रूप से भारतीय श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के बीच लोकप्रिय है. लेकिन पिछले एक दशक में चीन से बढ़ी मांग ने इस पारंपरिक उत्पाद को अरबों रुपये के कारोबार में बदल दिया है. हालांकि इस आर्थिक उछाल के साथ एक नई चिंता भी सामने आई है. किसानों पर अब ऐसे रसायनों के इस्तेमाल का दबाव बढ़ रहा है, जिनकी मदद से रुद्राक्ष को अधिक आकर्षक बनाया जाता है ताकि वह चीनी खरीदारों की पसंद पर खरा उतर सके.
तीन पीढ़ियों से रुद्राक्ष की खेती कर रहा है कार्की परिवार
मकालू हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले अशोक कार्की का परिवार करीब 30 वर्षों से रुद्राक्ष के पेड़ों की देखभाल और खेती करता आ रहा है. एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति के ये विशाल वृक्ष इस इलाके की पहचान बन चुके हैं. अशोक कार्की बताते हैं कि बचपन से ही उनकी आय का प्रमुख स्रोत रुद्राक्ष के बगीचे रहे हैं. एक परिपक्व पेड़ से सालाना 4,000 से अधिक बीज प्राप्त हो सकते हैं. जहां एकमुखी रुद्राक्ष बेहद दुर्लभ माना जाता है और उससे चमत्कारी लाभ जुड़े होने की मान्यता है, वहीं पंचमुखी रुद्राक्ष सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है और बाजार में इसकी मांग भी सबसे ज्यादा रहती है.
भारतीय बाजार से चीन तक पहुंचा कारोबार
पहले रुद्राक्ष का बड़ा बाजार भारत था, जहां इसे भगवान शिव का प्रतीक मानकर खरीदा जाता था. लेकिन समय के साथ चीन के व्यापारी भी इस कारोबार में शामिल हो गए. फर्क सिर्फ इतना था कि भारतीय खरीदार रुद्राक्ष को धार्मिक दृष्टि से देखते थे, जबकि चीन में इसे आभूषण और सजावटी वस्तु के रूप में पसंद किया जाने लगा.
चीनी खरीदारों की बढ़ती दिलचस्पी ने कीमतों में जबरदस्त उछाल ला दिया. कुछ साल पहले तक पंचमुखी रुद्राक्ष करीब 30 नेपाली रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकता था. अब सामान्य बीज की कीमत भी 2,000 नेपाली रुपये प्रति दाना तक पहुंच सकती है. वहीं दुर्लभ और अधिक मुख वाले रुद्राक्ष लाखों-करोड़ों रुपये में बिक रहे हैं.

नेपाल का ‘रुद्राक्ष कैपिटल’ बना सदानंद
नेपाल के सदानंद नगरपालिक क्षेत्र में एक लाख से अधिक रुद्राक्ष के पेड़ हैं. यही वजह है कि इसे अब नेपाल की ‘रुद्राक्ष राजधानी’ कहा जाने लगा है. नगरपालिका प्रमुख सुरेन्द्र कुमार उदास के अनुसार, केवल इसी क्षेत्र से हर साल लगभग 100 करोड़ नेपाली रुपये का रुद्राक्ष निर्यात किया जाता है. उन्होंने कहा, ‘यहां रुद्राक्ष की खेती किसानों और स्थानीय लोगों की आय का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है. कई लोग पारंपरिक फसलों की जगह रुद्राक्ष के पेड़ लगा रहे हैं.’
रुद्राक्ष का पेड़ तैयार होने में लगते हैं 7 साल
रुद्राक्ष सिर्फ धार्मिक महत्व वाला बीज नहीं है, बल्कि इसकी खेती भी काफी धैर्य मांगती है. एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति का यह सदाबहार पेड़ समुद्र तल से लेकर करीब 2,000 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाकों में उग सकता है. इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बीजों का अंकुरण धीमा होता है और पेड़ को फल देने लायक बनने में करीब सात साल का समय लग जाता है.
आकर्षक बीजों के लिए बढ़ा रसायनों का इस्तेमाल
चीन के खरीदार आकार, बनावट और चमकदार दिखने वाले रुद्राक्ष को प्राथमिकता देते हैं. इसी मांग को पूरा करने के लिए कई किसान और व्यापारी प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) नामक रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अशोक कार्की के मुताबिक, कली बनने के शुरुआती चरण से ही इन रसायनों को इंजेक्शन के रूप में पेड़ों में डाला जाता है. कई मामलों में यह प्रक्रिया चार बार तक दोहराई जाती है.
कार्की कहते हैं कि प्राकृतिक रूप से उगने वाले रुद्राक्ष इतने आकर्षक नहीं दिखते. अगर हमें चीनी व्यापारियों का ध्यान खींचना है तो इन दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है. अब यह हमारी मजबूरी बन चुकी है. उन्होंने बताया कि पहले जब ऐसी दवाएं नहीं थीं, तब रुद्राक्ष पूरी तरह प्राकृतिक रूप में बेचे जाते थे. लेकिन अब अगर दवा का उपयोग न करें तो बीज कम कीमत पर बिकते हैं और किसानों को कोई खास मुनाफा नहीं मिलता.

सरकार की मंजूरी नहीं, फिर भी हो रहा इस्तेमाल ग्रोथ रेगुलेटर
सबसे बड़ी समस्या यह है कि नेपाल सरकार ने रुद्राक्ष के लिए इन विशेष ग्रोथ रेगुलेटर के इस्तेमाल या आयात को मंजूरी नहीं दी है. किसानों का कहना है कि लगातार रसायनों के उपयोग से पेड़ों की सेहत प्रभावित हो रही है. कई पेड़ समय से पहले सूखने लगे हैं और बीजों की प्राकृतिक संरचना में भी बदलाव आ रहा है.
कार्की ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर चार-पांच साल तक लगातार इन दवाओं का इस्तेमाल किया जाए तो पेड़ पहले जैसी पैदावार देना बंद कर सकते हैं. बीजों की बनावट बदल जाती है और उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. एक समय ऐसा आ सकता है जब दवाएं भी असर करना बंद कर दें.
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक रुद्राक्ष की सतह पर नुकीले उभार दिखाई देते हैं, लेकिन हार्मोन आधारित दवाओं के इस्तेमाल से उनकी संरचना बदल जाती है और वे ज्यादा मजबूत व आकर्षक दिखने लगते हैं. ऐसे अधिकांश बीज चीन भेज दिए जाते हैं.
मेयर बोले- समस्या रसायन नहीं, गलत मात्रा है
सदानंद नगरपालिका के मेयर सुरेन्द्र कुमार उदास ने रसायनों के इस्तेमाल को स्वीकार किया, लेकिन इसे कृषि क्षेत्र में सामान्य प्रक्रिया बताया. उन्होंने कहा कि किसान पीजीआर का उपयोग कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल अन्य फसलों और फलों में भी किया जाता है. चीन और दूसरे देशों से आने वाले सेबों में भी ऐसे रसायनों का उपयोग होता है. समस्या तब पैदा होती है जब किसान अधिक मात्रा में इसका प्रयोग करते हैं.
धार्मिक आस्था और फैशन, दोनों बढ़ा रहे मांग
मेयर उदास ने बताया कि रुद्राक्ष की मांग दो प्रमुख कारणों से बनी हुई है. पहला, धार्मिक आस्था. भारतीय श्रद्धालु रुद्राक्ष को भगवान शिव का प्रतीक मानकर खरीदते हैं, जिसके चलते भारत में इसकी बड़ी खपत है. दूसरा, इसकी सजावटी और फैशन से जुड़ी उपयोगिता, जिसकी वजह से चीन में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. वहां खरीदार ऐसे बीजों को पसंद करते हैं जो देखने में अधिक सुंदर और आकर्षक हों.’
ये भी पढ़ें:- बालेन सरकार का कैबिनेट विस्तार: सुदन गुरुंग फिर बनेंगे नेपाल के गृह मंत्री, पहली बार अलग से बनेगी साइंस एंड टेक मिनिस्ट्री
ये भी पढ़ें:- भारत और नेपाल के बीच चाय पर कलह, क्या दार्जिलिंग ब्रांड पर खड़ा हुआ संकट? जानें पूरा मामला
सीधे गांव पहुंच रहे हैं चीनी व्यापारी
पिछले दस वर्षों में चीन के व्यापारी सीधे नेपाल के ग्रामीण इलाकों और स्थानीय बाजारों तक पहुंचने लगे हैं. इससे रुद्राक्ष की कीमत और मांग दोनों में भारी वृद्धि हुई है. किसान अब केवल खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फल के आकार को नियंत्रित करने के लिए क्लैंप जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. बड़े आकार और आकर्षक दिखने वाले बीजों को अलग करके विशेष रूप से चीनी खरीदारों के लिए तैयार किया जाता है.
यानी, रुद्राक्ष को धार्मिक वस्तु से कहीं आगे बढ़ाकर एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक उत्पाद बना दिया गया है. हालांकि, बढ़ती कमाई के साथ सवाल यह भी है कि कहीं तात्कालिक मुनाफे की दौड़ में नेपाल अपनी इस अनमोल प्राकृतिक विरासत की गुणवत्ता और भविष्य को खतरे में तो नहीं डाल रहा. और कहीं रसायन से कोई स्किन डिजीज जैसा खतरा न पैदा हो जाए. इसलिए रुद्राक्ष के शौकीनों को सावधान रहने की जरूरत होगी.
ANI के इनपुट के साथ.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में
By अनन्त नारायण शुक्ल
अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. अनन्त राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर खबरें करते हैं. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यमात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं.
अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं.
इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं.
अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने झारखंड विधान सभा 2024, दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 चुनाव और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है.
अनन्त कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं.
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.
तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










