नेपाली रुद्राक्ष के शौकीन, हो जाएं सावधान! धड़ाधड़ हो रहा केमिकल का यूज, चीन के लालच ने आस्था के रंग में डाला भंग

Published by : Anant Narayan Shukla Updated At : 12 Jun 2026 11:14 AM

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भारत में भगवान शिव के प्रति आस्था के कारण रुद्राक्ष की भारी मांग रहती है. फोटो- कैनवा.

Nepal Rudraksha: नेपाल में रुद्राक्ष का कारोबार चीन की बढ़ती मांग के कारण अरबों रुपये के उद्योग में बदल गया है. लेकिन आकर्षक रुद्राक्ष उगाने के लिए किसानों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे रसायन अब पेड़ों और बीजों की गुणवत्ता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं.

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Nepal Rudraksha: नेपाल के पूर्वी पहाड़ी इलाकों में उगने वाला रुद्राक्ष मुख्य रूप से भारतीय श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के बीच लोकप्रिय है. लेकिन पिछले एक दशक में चीन से बढ़ी मांग ने इस पारंपरिक उत्पाद को अरबों रुपये के कारोबार में बदल दिया है. हालांकि इस आर्थिक उछाल के साथ एक नई चिंता भी सामने आई है. किसानों पर अब ऐसे रसायनों के इस्तेमाल का दबाव बढ़ रहा है, जिनकी मदद से रुद्राक्ष को अधिक आकर्षक बनाया जाता है ताकि वह चीनी खरीदारों की पसंद पर खरा उतर सके.

तीन पीढ़ियों से रुद्राक्ष की खेती कर रहा है कार्की परिवार

मकालू हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले अशोक कार्की का परिवार करीब 30 वर्षों से रुद्राक्ष के पेड़ों की देखभाल और खेती करता आ रहा है. एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति के ये विशाल वृक्ष इस इलाके की पहचान बन चुके हैं. अशोक कार्की बताते हैं कि बचपन से ही उनकी आय का प्रमुख स्रोत रुद्राक्ष के बगीचे रहे हैं. एक परिपक्व पेड़ से सालाना 4,000 से अधिक बीज प्राप्त हो सकते हैं. जहां एकमुखी रुद्राक्ष बेहद दुर्लभ माना जाता है और उससे चमत्कारी लाभ जुड़े होने की मान्यता है, वहीं पंचमुखी रुद्राक्ष सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है और बाजार में इसकी मांग भी सबसे ज्यादा रहती है.

भारतीय बाजार से चीन तक पहुंचा कारोबार

पहले रुद्राक्ष का बड़ा बाजार भारत था, जहां इसे भगवान शिव का प्रतीक मानकर खरीदा जाता था. लेकिन समय के साथ चीन के व्यापारी भी इस कारोबार में शामिल हो गए. फर्क सिर्फ इतना था कि भारतीय खरीदार रुद्राक्ष को धार्मिक दृष्टि से देखते थे, जबकि चीन में इसे आभूषण और सजावटी वस्तु के रूप में पसंद किया जाने लगा.

चीनी खरीदारों की बढ़ती दिलचस्पी ने कीमतों में जबरदस्त उछाल ला दिया. कुछ साल पहले तक पंचमुखी रुद्राक्ष करीब 30 नेपाली रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकता था. अब सामान्य बीज की कीमत भी 2,000 नेपाली रुपये प्रति दाना तक पहुंच सकती है. वहीं दुर्लभ और अधिक मुख वाले रुद्राक्ष लाखों-करोड़ों रुपये में बिक रहे हैं.

भारतीय बाजार में रुद्राक्ष की मालाएं. फोटो- कैनवा.

नेपाल का ‘रुद्राक्ष कैपिटल’ बना सदानंद

नेपाल के सदानंद नगरपालिक क्षेत्र में एक लाख से अधिक रुद्राक्ष के पेड़ हैं. यही वजह है कि इसे अब नेपाल की ‘रुद्राक्ष राजधानी’ कहा जाने लगा है. नगरपालिका प्रमुख सुरेन्द्र कुमार उदास के अनुसार, केवल इसी क्षेत्र से हर साल लगभग 100 करोड़ नेपाली रुपये का रुद्राक्ष निर्यात किया जाता है. उन्होंने कहा, ‘यहां रुद्राक्ष की खेती किसानों और स्थानीय लोगों की आय का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है. कई लोग पारंपरिक फसलों की जगह रुद्राक्ष के पेड़ लगा रहे हैं.’

रुद्राक्ष का पेड़ तैयार होने में लगते हैं 7 साल

रुद्राक्ष सिर्फ धार्मिक महत्व वाला बीज नहीं है, बल्कि इसकी खेती भी काफी धैर्य मांगती है. एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति का यह सदाबहार पेड़ समुद्र तल से लेकर करीब 2,000 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाकों में उग सकता है. इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बीजों का अंकुरण धीमा होता है और पेड़ को फल देने लायक बनने में करीब सात साल का समय लग जाता है.

आकर्षक बीजों के लिए बढ़ा रसायनों का इस्तेमाल

चीन के खरीदार आकार, बनावट और चमकदार दिखने वाले रुद्राक्ष को प्राथमिकता देते हैं. इसी मांग को पूरा करने के लिए कई किसान और व्यापारी प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) नामक रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अशोक कार्की के मुताबिक, कली बनने के शुरुआती चरण से ही इन रसायनों को इंजेक्शन के रूप में पेड़ों में डाला जाता है. कई मामलों में यह प्रक्रिया चार बार तक दोहराई जाती है.

कार्की कहते हैं कि प्राकृतिक रूप से उगने वाले रुद्राक्ष इतने आकर्षक नहीं दिखते. अगर हमें चीनी व्यापारियों का ध्यान खींचना है तो इन दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है. अब यह हमारी मजबूरी बन चुकी है. उन्होंने बताया कि पहले जब ऐसी दवाएं नहीं थीं, तब रुद्राक्ष पूरी तरह प्राकृतिक रूप में बेचे जाते थे. लेकिन अब अगर दवा का उपयोग न करें तो बीज कम कीमत पर बिकते हैं और किसानों को कोई खास मुनाफा नहीं मिलता. 

सीधा पेड़ों में यूज हो रहा केमिकल. फोटो- एआई जेनरेटेड.

सरकार की मंजूरी नहीं, फिर भी हो रहा इस्तेमाल ग्रोथ रेगुलेटर

सबसे बड़ी समस्या यह है कि नेपाल सरकार ने रुद्राक्ष के लिए इन विशेष ग्रोथ रेगुलेटर के इस्तेमाल या आयात को मंजूरी नहीं दी है. किसानों का कहना है कि लगातार रसायनों के उपयोग से पेड़ों की सेहत प्रभावित हो रही है. कई पेड़ समय से पहले सूखने लगे हैं और बीजों की प्राकृतिक संरचना में भी बदलाव आ रहा है.

कार्की ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर चार-पांच साल तक लगातार इन दवाओं का इस्तेमाल किया जाए तो पेड़ पहले जैसी पैदावार देना बंद कर सकते हैं. बीजों की बनावट बदल जाती है और उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. एक समय ऐसा आ सकता है जब दवाएं भी असर करना बंद कर दें.

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक रुद्राक्ष की सतह पर नुकीले उभार दिखाई देते हैं, लेकिन हार्मोन आधारित दवाओं के इस्तेमाल से उनकी संरचना बदल जाती है और वे ज्यादा मजबूत व आकर्षक दिखने लगते हैं. ऐसे अधिकांश बीज चीन भेज दिए जाते हैं.

मेयर बोले- समस्या रसायन नहीं, गलत मात्रा है

सदानंद नगरपालिका के मेयर सुरेन्द्र कुमार उदास ने रसायनों के इस्तेमाल को स्वीकार किया, लेकिन इसे कृषि क्षेत्र में सामान्य प्रक्रिया बताया. उन्होंने कहा कि किसान पीजीआर का उपयोग कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल अन्य फसलों और फलों में भी किया जाता है. चीन और दूसरे देशों से आने वाले सेबों में भी ऐसे रसायनों का उपयोग होता है. समस्या तब पैदा होती है जब किसान अधिक मात्रा में इसका प्रयोग करते हैं.

धार्मिक आस्था और फैशन, दोनों बढ़ा रहे मांग

मेयर उदास ने बताया कि रुद्राक्ष की मांग दो प्रमुख कारणों से बनी हुई है. पहला, धार्मिक आस्था. भारतीय श्रद्धालु रुद्राक्ष को भगवान शिव का प्रतीक मानकर खरीदते हैं, जिसके चलते भारत में इसकी बड़ी खपत है. दूसरा, इसकी सजावटी और फैशन से जुड़ी उपयोगिता, जिसकी वजह से चीन में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. वहां खरीदार ऐसे बीजों को पसंद करते हैं जो देखने में अधिक सुंदर और आकर्षक हों.’

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सीधे गांव पहुंच रहे हैं चीनी व्यापारी

पिछले दस वर्षों में चीन के व्यापारी सीधे नेपाल के ग्रामीण इलाकों और स्थानीय बाजारों तक पहुंचने लगे हैं. इससे रुद्राक्ष की कीमत और मांग दोनों में भारी वृद्धि हुई है. किसान अब केवल खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फल के आकार को नियंत्रित करने के लिए क्लैंप जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. बड़े आकार और आकर्षक दिखने वाले बीजों को अलग करके विशेष रूप से चीनी खरीदारों के लिए तैयार किया जाता है.

यानी, रुद्राक्ष को धार्मिक वस्तु से कहीं आगे बढ़ाकर एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक उत्पाद बना दिया गया है. हालांकि, बढ़ती कमाई के साथ सवाल यह भी है कि कहीं तात्कालिक मुनाफे की दौड़ में नेपाल अपनी इस अनमोल प्राकृतिक विरासत की गुणवत्ता और भविष्य को खतरे में तो नहीं डाल रहा. और कहीं रसायन से कोई स्किन डिजीज जैसा खतरा न पैदा हो जाए. इसलिए रुद्राक्ष के शौकीनों को सावधान रहने की जरूरत होगी.

ANI के इनपुट के साथ.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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