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समंदर में 6 किलोमीटर नीचे तक खुदाई कर कीचड़ क्यों निकालेगा जापान? दावा; चीन की हेकड़ी निकल जाएगी

Updated at : 23 Dec 2025 1:59 PM (IST)
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Japan races for rare earths turns to deep-sea mud resources to reduce reliance on China

जापान दुर्लभ खनिजों के लिए दौड़ में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए गहरे समुद्र कीचड़ संसाधनों की ओर रुख कर रहा है. फोटो- कैनवा.

Japan races for rare earths to counter China: चीन पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन को मजबूती देने के उद्देश्य से जापान ने 2027 तक गहरे समुद्र की मिट्टी यानी डीप-सी मड से रेयर अर्थ तत्वों के निष्कर्षण की योजना बनाई है. जापान समुद्र की सतह से लगभग 6,000 मीटर नीचे मौजूद समुद्र तल की मिट्टी से रेयर अर्थ तत्व निकालने की तैयारी कर रहा है. इस प्रक्रिया में समुद्र तल से कीचड़ निकाली जाएगी और उसे आगे की प्रोसेसिंग के लिए जापान की मुख्य भूमि तक पहुंचाया जाएगा.

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Japan races for rare earths to counter China: आधुनिक तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों और सेमीकंडक्टर उद्योग में रेयर अर्थ मैटेरियल की अहमियत लगातार बढ़ती जा रही है. इन्हीं खनिजों की वजह से आज वैश्विक आपूर्ति शृंखला और जियोपॉलिटिक्स में नए तनाव उभर रहे हैं. चीन की इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ के चलते कई देश वैकल्पिक स्रोत तलाशने में जुटे हैं. इसी कड़ी में जापान ने रेयर अर्थ तत्वों को लेकर एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है. चीन पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन को मजबूती देने के उद्देश्य से जापान ने 2027 तक गहरे समुद्र की मिट्टी यानी डीप-सी मड से रेयर अर्थ तत्वों के निष्कर्षण की योजना बनाई है. 

जापान की नजर खास तौर पर डिस्प्रोसियम जैसे महत्वपूर्ण रेयर अर्थ तत्वों पर है, जिनका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़े पैमाने पर होता है. निक्केई एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जापान समुद्र की सतह से लगभग 6,000 मीटर नीचे मौजूद समुद्र तल की मिट्टी से रेयर अर्थ तत्व निकालने की तैयारी कर रहा है. इस प्रक्रिया में समुद्र तल से कीचड़ निकाली जाएगी और उसे आगे की प्रोसेसिंग के लिए जापान की मुख्य भूमि तक पहुंचाया जाएगा. जापान का यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि उसका ऑटोमोबाइल उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में शुमार है. टोयोटा, होंडा, सुजुकी और निसान जैसे ब्रांड वैश्विक बाजार में बड़ी भूमिका निभाते हैं और इन कंपनियों के लिए रेयर अर्थ तत्वों की स्थिर आपूर्ति बेहद जरूरी है.

विवाद के बाद चीन ने रोकी आपूर्ति

दरअसल, 2010 में सेनकाकू द्वीप विवाद के दौरान चीन द्वारा रेयर अर्थ तत्वों की आपूर्ति रोके जाने के बाद जापान को अपनी निर्भरता का अहसास हुआ था. इसके बाद से टोक्यो ने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई. बीते एक दशक में जापान चीन पर अपनी निर्भरता को करीब एक-तिहाई तक घटाने में सफल रहा है.

जापान ने ऑस्ट्रेलिया में लगाया जुगाड़

फिलहाल वैश्विक स्तर पर चीन रेयर अर्थ तत्वों की लगभग 70 प्रतिशत आपूर्ति और करीब 90 प्रतिशत रिफाइनिंग क्षमता को नियंत्रित करता है. इसी दबदबे को चुनौती देने के लिए जापान ने ऑस्ट्रेलियाई खनन कंपनी लिनास (Lynas) में हिस्सेदारी ली और चीन से अलग रहते हुए रेयर अर्थ की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित की. इस व्यवस्था के तहत लिनास ऑस्ट्रेलिया में खनन करती है और मलेशिया स्थित संयंत्र में अयस्कों का परिष्करण किया जाता है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, हाल तक यह संयंत्र चीन के बाहर काम करने वाला एकमात्र बड़ा रेयर अर्थ सेपरेशन प्लांट था.

समुद्र तल से रेयर अर्थ निकालने की योजना

निक्केई एशिया के मुताबिक, जापान अपने स्ट्रैटेजिक इनोवेशन प्रमोशन प्रोग्राम (SIP) के तहत ओगासावारा द्वीप समूह के दूरस्थ मिनामीतोरिशिमा द्वीप पर एक विशेष सुविधा स्थापित करेगा. यहां समुद्र तल से निकाली गई कीचड़ को अलग किया जाएगा और फिर अंतिम परिष्करण के लिए उसे मुख्य भूमि भेजा जाएगा. रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी-फरवरी 2026 में परीक्षण खनन की शुरुआत हो सकती है. इस दौरान जापान एजेंसी फॉर मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी एक गहरे समुद्र के अनुसंधान पोत की मदद से पाइपों के जरिए सीमित मात्रा में समुद्री कीचड़ निकालेगी.

2027 में प्रस्तावित; 16.4 अरब येन का बजट

इस परियोजना का पूर्ण पैमाने पर प्रदर्शन फरवरी 2027 में प्रस्तावित है. योजना के तहत मिनामीतोरिशिमा पर समुद्री कीचड़ से लगभग 80 प्रतिशत पानी अलग कर दिया जाएगा, जबकि बची हुई मिट्टी को जहाज के जरिए जापान की मुख्य भूमि तक ले जाकर रेयर अर्थ धातुओं का उत्पादन किया जाएगा. SIP के कार्यक्रम निदेशक शोइची इशी के मुताबिक, इस परियोजना का अंतिम उद्देश्य पूरी निष्कर्षण प्रक्रिया को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करना और यह आंकलन करना है कि यह आर्थिक रूप से कितनी व्यवहारिक है. निक्केई एशिया के अनुसार, जापान ने इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए करीब 16.4 अरब येन (लगभग 105 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का बजट तय किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना सफल होती है, तो यह न केवल जापान की रणनीतिक आत्मनिर्भरता बढ़ाएगी, बल्कि वैश्विक रेयर अर्थ बाजार में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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