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स्कूल की राह बनी आसान, जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त साइकिल दिला रहा ''साइकिल रीसाइकिल'' प्रोजेक्ट

Updated at : 27 Sep 2016 6:04 AM (IST)
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स्कूल की राह बनी आसान, जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त साइकिल दिला रहा ''साइकिल रीसाइकिल'' प्रोजेक्ट

हमारे देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है, जिसके लिए साइकिल आज भी एक शान की सवारी है. और कई लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए सवारी का यह सबसे सस्ता माध्यम भी मयस्सर नहीं है. ऐसे ही लोगों के लिए शुरू किया गया है ‘साइकिल रीसाइकिल’ प्रोजेक्ट. महाराष्ट्र के रहनेवाले एक खेल पत्रकार के […]

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हमारे देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है, जिसके लिए साइकिल आज भी एक शान की सवारी है. और कई लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए सवारी का यह सबसे सस्ता माध्यम भी मयस्सर नहीं है. ऐसे ही लोगों के लिए शुरू किया गया है ‘साइकिल रीसाइकिल’ प्रोजेक्ट. महाराष्ट्र के रहनेवाले एक खेल पत्रकार के दिमाग की यह उपज, शहरों में रहनेवाले संपन्न तबकों के पास बेकार पड़ी साइकिलों की मरम्मत करा कर, उन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचाने की एक अनूठी पहल है.

कुछ साल पहले की बात है. वरिष्ठ खेल पत्रकार सुनंदन लेले महाराष्ट्र के पुणे जिले के विंझर गांव के दौरे पर थे. वहां उन्होंने देखा कि स्कूल में पढ़ने के लिए आनेवाले बच्चे अपने घर से कई किलोमीटर दूर स्कूल नंगे पैर चल कर आते थे.

गर्मी, जाड़ा हो या बरसात, वे बच्चे पैदल ही घर से स्कूल की दूरी तय करते थे. तब उन्होंने सोचा कि अगर इन बच्चों को साइकिल मिल जाये, तो इनकी जिंदगी कितनी आसान बन जायेगी! गांव में कुछ समय रहने के बाद जब सुनंदन अपने शहर पुणे के कोथरूड इलाके की स्प्रिंग फील्ड सोसायटी में वापस आये, तो वहां पर उन्होंने उन बच्चों की परेशानी का जिक्र दूसरे लोगों से किया. इसके बाद सोसायटी में रहने वाले दूसरे लोग भी उनके इस काम से प्रभावित होकर इस काम में उनका साथ देने के लिए तैयार हो गये.

सुनंदन को साथ मिला अपनी ही सोसायटी के हेमंत काय का, जो तुरंत ही यह जानने के लिए जुट गये कि उनकी सोसाइटी में कितनी बेकार साइकिलें खड़ीं हैं.

वहां रहने वाले हर परिवार से मिलने के बाद उन्हें पता चला कि 40 साइकिलें वहां पर यूं ही बेकार खड़ी हैं. इन्हें वहां रहनेवाले परिवार, उन गरीब बच्चों को दान में देने के लिए तैयार थे. तब हेमंत ने अपने साथियों की मदद से उन साइकिलों को उठाकर उन्हें ठीक कराया, जिसमें 50 हजार का खर्च आया. हर साइकिल में तीन सौ से एक हजार रुपये तक का खर्च आया, जिसके बाद उन साइकिलों को मार्च 2016 को विंझर गांव के बच्चों को दान दे दिया गया. सुनंदन ने अपने काम को विस्तार देने के लिए इस मुहिम को ‘साइकिल रीसाइकिल’ का नाम दिया. धीरे-धीरे उनके इस काम से आसपास की सोसाइटी के दूसरे लोग भी जुड़ने लगे. तब सुनंदन ने अलग-अलग सोसाइटीज में जाकर 90 साइकिलें इकट्ठा कीं और उन्हें ठीक कराकर पुणे से लगभग 90 किलोमीटर दूर गांव के बच्चों में बांट दी. फिर तो एक सिलसिला सा चल पड़ा. बताया जाता है कि सुनंदन ने ‘साइकिल रीसाइकिल’ प्रोजेक्ट के तहत पांच सौ से ज्यादा साइकिलें जरूरतमंदों को उपलब्ध करायी हैं.

सुनंदन कहते हैं कि हेमंत के साथ मिलकर जब हमने इस काम को शुरू किया था तो हमने सोचा था कि हम अपनी सोसाइटी से ही साइकिलें इकाट्ठी कर जरूरतमंद बच्चों को देंगे, लेकिन जब इस काम में लोगों का इतना सहयोग मिला तो हमने इसे फेसबुक के जरिये और फैलाने के बारे में सोचा. उन्होंने ‘साइकिल रीसाइकिल’ नाम से फेसबुक पेज बनाया. इसमें लोगों से इन बच्चों की मदद के लिए पुरानी साइकिलें दान देने की अपील की गयी, इसके बाद देश-विदेश से कई लोग इनसे जुड़ कर गांव के बच्चों की मदद को आगे आये.

सुनंदन बताते हैं कि जिन बच्चों को भी साइकिल दी जाती है, उन्हें गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में अपनी साइकिलें स्कूल में जमा करनी होती हैं. इसकी वजह यह है कि घर पर रहने पर उनकी साइकिल का दूसरे कामों में भी इस्तेमाल हो सकता है जिससे साइकिल जल्दी खराब हो सकती है. साथ ही, साइकिल देने के पीछे उनका मकसद हर बच्चे को स्कूल लाना भी है, ताकि वे बीच में अपनी पढाई न छोड़ सकें. अगर कोई बच्चा बीच में ही स्कूली पढाई छोड़ देता है तो उस बच्चे को अपनी साइकिल स्कूल में जमा करनी होती है, ताकि स्कूल जानेवाले दूसरे बच्चे को ये साइकिलें दी जा सकें.

सुनंदन और उनकी टीम ने साइकिल बांटने के साथ उन गांवों में बच्चों को साइकिल के कुछ कलपुर्जे और हवा भरने का पंप भी मुहैया कराया है, ताकि साइकिल में कुछ खराबी होने पर वो उसे खुद ही ठीक कर सकें. इसके साथ ही उनकी योजना गांव के कुछ युवाओं को साइकिल रिपेयरिंग का काम सिखाने की भी है, जिससे वो लोग इन बच्चों की साइकिल को खराब होने पर ठीक कर सकें. सुनंदन, हेमंत और उनकी टीम पांच से ज्यादा स्कूलों में साइकिल बांट कर सैकड़ों बच्चों की राह आसान बना चुकी है. उनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक पहुंचने की है.

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