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बादशाहत पर भारी पड़ा सच्चा प्रेम

Updated at : 24 Apr 2016 5:55 AM (IST)
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बादशाहत पर भारी पड़ा सच्चा प्रेम

यह कहानी है मारवाड़ की एक तवायफ की बेटी कंवल की, जिसने एक अदने-से जागीरदार केहर से अपने प्रेम के लिए गुजरात के बादशाह महमूद शाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया़ कंवल को पाने और केहर को रास्ते से हटाने के लिए बादशाह ने कई प्रपंच रचे, लेकिन अंत में उसे कंवल-केहर के प्रेम के आगे […]

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यह कहानी है मारवाड़ की एक तवायफ की बेटी कंवल की, जिसने एक अदने-से जागीरदार केहर से अपने प्रेम के लिए गुजरात के बादशाह महमूद शाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया़ कंवल को पाने और केहर को रास्ते से हटाने के लिए बादशाह ने कई प्रपंच रचे, लेकिन अंत में उसे कंवल-केहर के प्रेम के आगे मुंह की खानी पड़ी़
गुजरात के बादशाह महमूद शाह का दिल मारवाड़ से आयी तवायफ जवाहर पातुर की बेटी कंवल पर आ गया था़ उसने कंवल को अपनी बात मनवाने के लिए पैसों और हीरे-जवाहरात का लालच देते हुए उसके गले में हीरे का हार पहनाने की कोशिश की़ बादशाह के इस बरताव पर नाराजगी दर्ज करते हुए कंवल ने हीरों का हार तोड़ कर फेंक दिया़
उसकी मां जवाहर ने बेटी की हरकत पर बादशाह से माफी मांगी और बेटी को समझाया कि बादशाह की बात मान ले, तू पूरे गुजरात पर राज करेगी़ पर कंवल ने मां से कहा कि वह केहर को प्यार करती है और कोई भी राजा उसके किसी काम का नहीं.
केहर सिंह चौहान महमूद शाह के अधीन एक छोटी-सी जागीर ‘बारिया’ का जागीरदार था और कंवल उसे ही प्यार करती थी़ उसकी मां ने खूब समझाया कि तू एक तवायफ की बेटी है, तू किसी एक की घरवाली नहीं बन सकती़ लेकिन कंवल को अपने प्यार पर पूरा भरोसा था़ लिहाजा, बादशाह ने केहर को कैद करने के आदेश दे दिये़
बादशाह ने यह भी एलान किया कि केहर को कैद करने वाले को उसकी जागीर जब्त कर दे दी जायेगी, पर केहर जैसे राजपूत योद्धा से कौन टक्कर ले! बादशाह के सामंतों में से एक, जलाल, छोटी-सी जागीर का मालिक था़
उसने लालच में यह बीड़ा उठा लिया़ होली खेलने के बहाने से उसने केहर को महल में बुलाकर उसे धोख से कैद कर, बादशाह को भिजवा दिया़ कंवल रोज पिंजरे में कैद केहर को खाना खिलाने आती़ एक दिन उसने एक कटारी व एक छोटी आरी केहर को लाकर दी़
उसी समय केहर की दासी टुन्ना ने वहां के पहरेदारों को जहर मिली भांग पिला कर बेहोश कर दिया़ इस बीच मौका पाकर केहर पिंजरे का दरवाजा काट आजाद हो गया और अपने साथियों के साथ से बाहर निकल आया़ इसके बाद केहर ने मेवाड़ के एक सीमावर्ती साठ गांवों के मुखिया गंगो भील को अपने साथ मिला लिया़
केहर के जाने के बाद बादशाह ने केहर को मारने के लिए कई योद्धा भेजे, लेकिन सब मारे गये़ इसी बीच बादशाह को समाचार मिला कि केहर की तलवार के एक वार से जलाल के टुकड़े-टुकड़े हो गये़
कंवल केहर के जितनी किस्से सुनती, उतनी ही खुश होती और उसे खुश देख बादशाह को उतना ही गुस्सा आता़ इसी बीच कंवल ने अपनी एक नौकरानी के हाथों यह संदेश भिजवाया कि मारवाड़ के व्यापारी मुंधड़ा की बारात अजमेर से अहमदाबाद आ रही है़
उस बारात के साथ भेष बदल कर अहमदाबाद आ जाये़ केहर ने ऐसा ही किया़ केहर और उसके चार साथी जोगी के वेश में बारात में शामिल हो गये़ अपनी योजना के तहत कंवल ने बादशाह के प्रति अपना रवैया थोड़ा नरम किया और अपनी दासी को भेज केहर को सारी योजना समझा दी़
बारात के अहमदाबाद पहुंचने से पहले ही कंवल ने राजा से कहा, हजरत! केहर का तो कोई अता-पता नहीं. आखिर आपसे कहां बच पाया होगा? उसका इंतजार करते-करते मैं भी थक गयी हूं. अब तो मेरी जगह आपके चरणों में ही है़ लेकिन मैं आपकी बांदी नहीं, रानी बन कर रहूंगी़
अगर आप मुझे वाकई चाहते हैं, तो आपको मुझसे विवाह करना होगा और विवाह के बारे में मेरी कुछ शर्तें हैं, जो आपको माननी होंगी़ अपनी योजना के तहत कंवल ने बादशाह को शर्तें सुना दीं, जो कुछ इस तरह थीं – शादी मुंधड़ा जी की बारात के दिन ही हो, विवाह हिंदू रीति-रिवाज से हो जिसमें पूजा-पाठ के अलावा मंगल गीत और गाजे-बाजे हों, शादी के दिन मेरा डेरा बुलंद गुंबज में हो, आप बुलंद गुंबज पधारें तो आतिशबाजी हो और तोप के गोले छूटें, मेरी शादी देखने वालों के लिए कोई रोक-टोक न हो और मेरी मां जवाहर पातुर पालकी में बैठ कर बुलंद गुंबज के अंदर आ सके़.
कंवल की खूबसूरती में पागल राजा ने उसकी सारी शर्तें मान ली़ शादीवाले दिन शाम के समय कंवल की दासी टुन्ना पालकी लेकर जवाहर पातुर को लेने उसके डेरे पर पहुंची, जहां योजनानुसार केहर शस्त्रों से सुसज्जित हो पहले ही तैयार बैठा था़ टुन्ना ने पालकी के कहारों का ध्यान भटका कर उसमें चुपके से केहर को बिठा, पालकी के परदे लगा दिये़ पालकी के बुलंद गुंबज पहुंचने पर सारे मर्दों को वहां से हटवाकर कंवल ने केहर को वहां छिपा दिया़
थोड़ी ही देर में बादशाह हाथी पर बैठ सज-धज कर बुलंद गुंबज पहुंचा़ महमूद शाह के बुलंद गुंबज में प्रवेश करते ही आतिशबाजी और ढोल के थाप से बुलंद गुंबज गूंज उठा़ तभी केहर बाहर निकल आया और उसने बादशाह को ललकारा, आज देखते हैं शेर कौन है और गीदड़ कौन? तूने मेरे साथ बहुत छल-कपट किया़ आज तुझे मार कर मैं अपना हिसाब चुकता करूंगा़
दोनों योद्धा भिड़ गये, उनके बीच मल्लयुद्ध होने लगा़ उनके पैरों की धमक से बुलंद गुंबज थरथराने लगा, लेकिन बाहर हो रही आतिशबाजी से अंदर की हलचल का किसी को पता न चल सका़ चूंकि केहर मल्ल युद्ध में भी प्रवीण था, इसलिए महमूद शाह को उसने थोड़ी देर में अपने मजबूत घुटनों से कुचल दिया़
बादशाह के मुंह से खून का फव्वारा छूट पड़ा और कुछ ही देर में उसकी जीवन लीला समाप्त हो गयी़ दासी टुन्ना ने केहर और कंवल को पालकी में बिठा कर परदा लगाया और कहारों और सैनिकों को हुक्म दिया-जवाहर बाई की पालकी तैयार है, उसे उनके डेरे पर पहुंचा दो़ बादशाह आज की रात यहीं बुलंद गुंबज में कंवल के साथ बितायेंगे़
कहार और सैनिक पालकी लेकर जवाहर बाई के डेरे पहुंचे़ वहां केहर का साथी सांगजी घोड़ों पर जीन कस कर तैयार था़ केहर ने कंवल को और सांगजी ने टुन्ना को अपने साथ घोड़ों पर बिठा कर अपनेगंतव्य की ओर चल पड़े और उधर जवाहर बाई को छोड़ने आये कहार और शाही सिपाहियों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं.
…..और आखिर में
कंवल और केहर की प्रेम कहानी पर राजस्थान और गुजरात में कई किस्से और कहानियां कही-सुनी जाती हैं. स्थानीय भाषा में इस पर किताबें भी लिखी जा चुकी हैं, लेकिन इस कड़ी में लक्ष्मी कुमारी चुंडावत की लिखी ‘कंवल ऐंड केहर’ सबसे मानक कृति मानी जाती है़
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